जून 6, 2018. कल्पना हमारा आदर्श तो हो सकती है, हकीकत कत्तई नही है!

बिहार देश के बाकी राज्यों से अलग है। अलग इसलिए नही कि हम देखने-सुनने में उनसे अलग हैं। असल में हमारा मुँह खोलना हमें उनसे अलग कर देता है। अपनी अस्मिता को लेकर बेवजह इतना ऑब्सेस्ड देश में शायद ही कोई जमात है। दोनों ही तरफ से, आधे बिहारी आपको बिहार को गाली देते मिल जाएंगे। बचे हुए आधे अपने इतिहास को लेकर बेवजह गौरव ढोते रहते हैं। जो बच जाते हैं उन्हें ही अपने वर्तमान की समझ होती है। वो कितने हैं? हमारे साथ की समस्या है कि हम बाकी लोगों के साथ एसिमिलेट हो ही नही पाते। यूँ ही चलते रहते हैं, अपने भीतर का बोध लिए। अफसोस! बाद में हम इल्जाम दूसरों पर लगाते हैं हमसे भेद के लिए।
पिछले तीन दिनों से आ रहे आपके संदेशों ने मेरे अस्मिता को भयानक तरीके से जगा दिया है। मिनट-मिनट पर आ रहे आपके मैसेजेज और स्टेटस से मेरे भीतर के बिहारी को अचानक से ऐसा महसूस होने लगा है कि मानो रातों-रात हम शिक्षा के क्षेत्र में देश का नेतृत्व करने लगे हैं। तीन दिनों से मैं इस मसले पर बात कर नही पाया था। लेकिन आज समझ नही पा रहा कि किससे बात करूं? कैसे बात करूँ? क्या बात करूँ? मैं उन्हें कैसे संबोधित करूँ जो खुद की ही नही सुनना चाहते?
कैसे बताऊँ कि बिहार जैसे कौम जश्न नही मनाया करते, उन्हें आत्ममंथन करना होता है। हर साल देश में मेडिकल टॉपर होता है, हर साल कोई सीबीएसई टॉप करता है, हर साल किसी न किसी राज्य से यूपीएससी का टॉपर आता है। कितने राज्यों को आपने यूँ जश्न मनाते देखा है। यकीन मानिए आप जब ऐसा कर रहे होते हैं तब आप अपने हकीकत से भाग रहे होते हैं। दूसरे राज्यों को ऐसी चीजों से फर्क नही पड़ता। उनके लिए ऐसी चीजें आम है। ऐसा नही है कि कल्पना ने जो हासिल किया है वो साधारण है। लेकिन करोड़ों की आबादी वाले राज्य के लिए तो ये आम ही होना चाहिए न? फिर बिहार मार्स पर तो है नही कि इंडिया टॉपर यहाँ से नही हो सकता!
आपके संदेश मुझे बता रहे थे कि शिवहर की बेटी कल्पना कुमारी ने नीट में इंडिया टॉप किया है। ये खबर बहुत विशेष नही थी जबतक मैंने उसमे नरवारा गांव का नाम नही पढ़ा था। नरवारा हमारे स्कूल डीएवी नरहाँ से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित गाँव है। इस नाम पर ध्यान इसलिए चला जाता है क्योंकि नरहाँ जाने के लिए आपको नरवारा से ही होकर जाना होता है।
ये वो क्षेत्र है जहाँ ढंग की स्कूलें मुश्किल से मिलती हैं। सरकारी भूल जाइए, मैं पब्लिक स्कूलों की बात कर रहा। नीतीश कुमार के शिक्षा नीति में 'शिक्षा की बर्बादी' पॉइंट वन पर आती है, इसलिए सरकारी स्कूलों की बात फिजूल है। वहाँ उम्मीद नही है। समस्या ये है कि जो प्राइवेट स्कूल हैं, वो भी ठीक से चल नही पा रहें। आलम ये है कि दसवीं तक का उनका टॉपर जब शहर जाता है तो औसत से भी नीचे का विद्यार्थी हो जाता है। ये समाज की जिम्मेवारी है। जो समाज अपने संस्थाओं का संचालन सुनिश्चित न कर पाए उसे व्यवस्था को कोसने का कितना हक है? उस समाज को ऐसी उपलब्धियों पर खुश होने का कितना हक है?
उसमें भी जब वो सफलता आपकी है ही नही। उस सफलता में आपका कोई योगदान नही। सचमुच कल्पना के इस उपलब्धि में बिहार का योगदान उसके  बिहार में जन्म लेने के इत्तेफाक से अधिक तो कुछ है नही। बिहार ने क्या दिया है उसे, चादर से ढकी हुई बजबजाती शिक्षा व्यवस्था के अलावा। पिछले तीन सालों में तो वो चादर भी हट गया है खैर। भला किस बात पर खुश हो शिवहर। क्या इस बात पर कि मेडिकल टॉपर देने वाले जिले के पास एक ढंग का डिग्री कॉलेज नही है। उसपर बात करिए न आप?
कल्पना ने दिल्ली में रहकर मेडिकल की तैयारी की थी। आकाश इंस्टिट्यूट में पढ़ती थी वो। आकाश मेडिकल की तैयारी कराने वाले देश के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में है। माना कि वो दसवीं तक शिवहर के नवोदय विद्यालय से पढ़ी थी। लेकिन एडमिशन से लेकर पढ़ाई तक के मामले में, नवोदय पर राज्य सरकार या समाज का कितना हस्तक्षेप होता है ये तो आप जानते ही हैं।
कल्पना उस राज्य की हकीकत नही हो सकती जिसका हर दूसरा बच्चा मैट्रिक भी पास नही कर पाता। जो पास कर भी जाते हैं उनमें से आधे इंटर में फेल हो जाते हैं। हाँ, जो यहाँ भी बच जाते हैं वो थोड़े बेहतर स्थिति में हैं। खींच-खांच कर कैसे भी सात-आठ साल में ग्रेजुएट हो जाते हैं। मगर फिर उसके बाद वो बेरोजगारी के लिए व्यवस्था को कोसने से अधिक कुछ कर नही पाते। उन्हें कोई नौकरी क्यों दे भला? होता ही क्या है उनमें? अब ऐसा राज्य इन बातों पर सोचने के बजाय किसी लड़की के व्यक्तिगत उपलब्धि पर गौरवान्वित होने लगे तो उसे तो भगवान ही बचाएँ।
आज इस मुद्दे पर बात करने की सोच ही रहा था तबतक खबर आई कि कल्पना बिहार बोर्ड इण्टर की भी टॉपर घोषित की गई है। गौर करिएगा कि मैंने टॉपर घोषित की गई है लिखा है। क्योंकि ये परिणाम एक ऐसी व्यवस्था से आया है जहाँ टॉप के सौ बच्चों की कॉपी की स्क्रूटिनी रिजल्ट से पहले ही करा ली गई ताकि उसे टॉपर घोटालों जैसे शर्म का सामना न करना पड़े। अब स्क्रूटिनी के बाद कल्पना का ही नाम आना इत्तेफाक तो हो नही सकता। उसके नाम पर अपना चेहरा बचाने की कवायद भले हो जाए। मुझे कल्पना की प्रतिभा पर संदेह नही लेकिन ऐसे परिणामों पर कितना भरोसा किया जाए जिसे जारी करने वालों को ही उसपर भरोसा नही? बिहार बोर्ड के परिणामों के आधार पर आप किसी बच्चे को जज नही कर सकते। टॉपर कैसे होते हैं उसकी बानगी तो आपने  रूबी राय और गणेश जैसो में देखी ही है। साथ ही आपने ये भी देखा होगा कि जेईई में टॉप करने वाले बच्चे बिहार बोर्ड में कैसे फैल कर दिए जाते हैं। इसलिए चाहे नीतीश कुमार की व्यवस्था जितना दावा कर ले, मुझे अपने सिस्टम पर पूरा भरोसा है। इंतजार कीजिए, इसबार भी रिजल्ट ने अपने गोद मे गुदड़ी के लाल जरूर छुपाए होंगे।
बात रही अटेंडेंस की तो बिहार में वो मुद्दा ही नही होता। यहाँ सब जानते हैं कि पहली से लेकर यूनिवर्सिटी तक, यहाँ क्लास नही चलती। कॉलेज वाले एडमिशन लेते वक्त ही ये समझ रहे होते हैं कि आप बाहर रहकर तैयारी करेंगे, तैयारी किसकी होगी, क्या होगी उससे कोई मतलब नही। बस तैयारी करेंगे आप। यहाँ के रेग्यूलर कोर्स हर स्तर पर अघोषित रूप से ओपन ही होते हैं। इसलिए भी कल्पना के उपलब्धि पर दावा कर रहे कॉलेज का वो दावा मजाक से अधिक कुछ नही है। हालाँकि मजाक तो वो लोग भी हैं जो इस उपलब्धि को अलग-अलग तरीके से भुनाने में लग गए हैं।
परसो तक साधारण रहा कल्पना का परिवार अचानक से असाधारण हो गया होगा। होना भी चाहिए, इतनी असाधारण बच्ची को जन्म देने वाले अभिभावक विशेष तो हैं ही। लेकिन सोचिए जरा, कितने अभिभावक अपने बच्ची को दिल्ली में रखकर आकाश में पढ़ा सकते हैं? कौन अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा बिहार बोर्ड में पढ़े? क्यों चाहेगा वो भला जब वर्षों मेहनत करने के बाद भी रिजल्ट आने के दूसरे तो छोड़िए, बच्चा खुद ही खुद पर संदेह करने लगता है? जरूर मजबूर होते होंगे वो लोग? हमारा सच बस इतना ही है। बाकी मुगालते पालने को हम स्वतंत्र हैं।
ऐसे मजबूर लोगों को कल्पना जैसे एकाध अपवादों से वाकई फर्क पड़ना चाहिए क्या?

Comments

  1. ज्यादातर मौकों पर तो हम ख़ुद को बिहारी बताने में संकोच करते हैं, और कभी ऐसा दर्शाने की कोशिश करते हैं कि हम से बेहतर कोई नहीं है।
    बहुत बढ़िया लिखा है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. तीन वर्ष बीत जाने के बाद तुम्हारा लिखा हुआ संदेश आज भी प्रासंगिक हैं।
      यूपीएससी के टॉपर होना एक असाधारण विषय तो नही ही है परंतु उसी को अपने व्हाट्स ऐप में स्टेटस लगा कर बधाई देने का सिलसिला फिर शुरू हो गया ।

      Delete
  2. बहुत खूब....👌

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

'विद्ययामृतमश्नुते'

नकारात्मक पोस्ट: कोरोना और बिहार, मुख्यमंत्री को पत्र!

Pulwama & Valentine: This Vasant, shed your binaries like the dry leaves!

(Open) letter to my friend.