अगस्त 12, 2018: पर्सनल पोस्ट: व्यवस्था गर चाह ले तो कुछ भी संभव है।
कई दिन ऐसे आते हैं जब आपको एकांत की जरूरत होती है। ऐसे एकांत की जहाँ आपका खुद से साक्षात्कार हो सके। तब बात करने की भी जरूरत नही होती, बस इतना देखना होता है कि हम अकेले में रो सकें, खुद को थाम सकें। बोझ हल्का हो जाता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विदा होते समय मैंने कहा था कि ये चैप्टर अभी खत्म नही हुआ है, अभी काफी कुछ है इसमें। आज जब आपसे मुखातिब हो रहा तो ये बताते हुए कि वो चैप्टर अब अपने अंजाम को पहुँच चुका जाने कैसा महसूस कर रहा ये मुझे खुद भी नही पता।
पिछले कुछ महीने त्रासद रहे मेरे लिए। आपसे जितनी बार भी हँसते हुए मिलता था, भीतर से उतना ही खोखला होता जाता था। जाहिर है, वो हंसी मेरी नही थी, हर बार एक बनावट ओढ़ना पड़ता था। आदत है, मिले हैं तो मुस्काना तो होगा ही। अफसोस कि हाल में वो बनावट भी चली गई थी। मैं अवसाद के मुहाने पर खड़ा था। अब गिरा कि तब गिरा। दूसरों को लाख समझा लेने के बाद भी अपने मामले में हम वही चीजें नही समझ पाते। हर आते हुए रिजल्ट के साथ मेरा दुख और गहरा होता जाता था। ऐसे कम लोग होते होंगे जो अपने ही रिजल्ट से दुखी होते हों। मैं होता था, क्योंकि रिजल्ट न होने के सूरत में साल बर्बाद हो जाए तो समझ आता है। लेकिन कई एंट्रेंस में रिजल्ट होने के बाद भी आप रह जाएं तो...
पिछले महीने इन्ही बातों में डूबा, उहापोह में फंसा हैदराबाद चला गया था एडमिशन लेने। लेकिन भीतर की एक आवाज थी जो आखिरी वक्त तक संशय बनाए रखे थी। कहीं से कुछ नही सुझा तो मैं हाँ-ना के बीच काउंसलिंग हॉल में घुस गया। वहाँ इस उम्मीद से कि वो सच जानकर मुझे बाहर कर देंगे,मैंने उन्हें बता दिया कि बीए में मेरे पेपर्स छूटे हैं और मैं 31 जुलाई तक रिजल्ट नही दे पाऊंगा। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वहां के अद्मिशन अफसर(डिप्टी रजिस्ट्रार) ने मुझे स्पेशल केस कंसीडर करके एडमिशन दे दिया। फिर 25 जुलाई को डीयू में मेरी पहले राउंड की काउंसलिंग थी। वहाँ 16 अगस्त तक डॉक्यूमेंट जमा करने का समय दिया गया। एडमिशन पेंडिंग में रखा गया जो कि उसके बाद कैंसिल कर दिया जाता।
मैंने कई स्तर के कई लोगों से बात की। कहीं से सकारात्मक जवाब नही मिला। कई लोग तो ये तक लिखकर देने को तैयार थे कि मेरा रिजल्ट किसी कीमत पर नही आएगा। आता भी कैसे! तीन पेपर्स बाकी थे, फिर इवैल्यूएशन, फिर रिजल्ट, फिर उसके बाद डॉक्यूमेंट। और दिन बचे बीस से भी कम। उसमें भी मेरा डिपार्टमेंट- पोलिटिकल साइंस।
मेरा हौसला तो टूट ही चुका था। मुझे सामने वाले से बात करने तक में समस्या होने लगी थी। कई आफिस में यहाँ तक मुझे अपने दोस्त को ले जाना पड़ा मेरे बदले मेरी बात रखने के लिए। उम्मीद अब भी नही बंध रही थी। सब न कहने वाले, मगर मेरे भीतर का इंट्यूशन... वहाँ से एक बार भी न नही आया था। अगर आ जाता तो मैं भी छोड़ देता। ऊपर-ऊपर ना कहने भी लगा था फिर भी। जाने मेरा स्वभाव कैसा हो गया था कि मेरे इस भरोसे पर कि मेरा रिजल्ट आ जाएगा, हाल के दिनों में मुझे सबसे अधिक जानने वाले मेरे मित्र(Shukdev) ने कह दिया था कि मैं विक्टिम प्ले करने लगा हूँ। खुद से विक्टिम प्ले करने लगा हूँ... अपने आप से भागने लगा हूँ।
बहरहाल अचानक क्या हुआ! कैसे हुआ! लेकिन आश्चर्यजनक हुआ। मेरे एग्जाम के शेड्यूल आ गए। 3 अगस्त से होने वाले एग्जाम आखिर 6 से शुरू हो गए। आठ तक मेरे पेपर हो चुके थे। 9 तक सारी कॉपी चेक हो गए थे और नौ को ही शाम में मेरा रिजल्ट भी आ गया था। 10 को फाइनल मार्कशीट में सुधार के लिए मैंने जमा किया और एक दिन बाद मुझे वो भी मिल गया था। उसी दिन मुझे मेरे सारे डॉक्यूमेंट मिल गए थे और आज जो तारीख मुझे मिली थी उससे काफी पहले ही मैं अपना रिजल्ट जमा करने के स्थिति में हूँ।
सब काम बड़ी आसानी से हो गया जैसे। लेकिन जो लोग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को जानते हैं, वो जानते हैं कि ये कत्तई आसान नही था। इसलिए संशय मेरे भीतर भी था, वह भी ऐसा कि पांचवे सेमेस्टर में एग्जाम छोड़ने के फैसले पर, जो मेरे जीवन के चंद अच्छे फैसलों में होगा, मुझे अफसोस होने लगा था। लेकिन जाने कैसे सब हो गया।
मैं कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन आफिस में जॉइंट रजिस्ट्रार सर से मिला था। मेरी स्थिति जानने के बाद उन्होंने मुझ से कहा था कि वो कोशिश करेंगे कि एग्जाम वक़्त पर हो जाए। लेकिन रिजल्ट आ पाएगा, इस पर वो भी सशंकित थे। लगभग ना ही कहा था उन्होंने भी। फिर मैं पाठक सर(डीन, सोशल साइंस) के पास गया था। उन्होंने भरोसा दिया कि वो कॉपी चेक करवा देंगे। टलते-बचते पेपर्स हो गए। वो चेक भी हो गए और मुझे रिजल्ट भी मिल गया। दो डाक्यूमेंट्स मैं बाद के भरोसे छोड़कर आ रहा था, वो भी मुझे जॉइंट रजिस्ट्रार सर ने खुद कहा कि आज ही ले लो, और बनवा कर उपलब्ध करा दिया।
मेरे सीनियर प्रशांत भैया ने मेरी काफी मदद की थी इस दौरान, जब कई लोग फोन उठाना बंद कर चुके थे, उस वक़्त में उन्होंने हर बार मेरा फोन उठाना सुनिश्चित किया। आखिर में जब मैंने उन्हें सूचित करने के लिए फ़ोन किया तो वो कह रहे थे कि तुम्हारे ऊपर कोई दैवी कृपा थी। सच कह रहे थे वो, मैं मानता हूं कि असम्भव का सम्भव हो जाना दैवी कृपा से ही हुआ। दो जगह मेरा काम फंसा भी तो दोनों ही बार अचानक से वहाँ अवधेश सर पहुँच गए थे, ये स्वाभाविक तो नही ही था। लेकिन मैं इसके पीछे उन प्रयासों को नकार नही सकता जो इस छोटे से काम में लगे थे। काम छोटा ही था, तीस हजार के भीड़ में एक बच्चे का रिजल्ट न ही हो तो क्या फर्क पड़ता है। वो भी तब जब परीक्षा छोड़ने की गलती उसने खुद की हो। लेकिन छोटे प्रयासों से ही इरादे पता चलते हैं। व्यक्तिगत अनुभवों से ही धारणाएं बनती हैं।
इसलिए मैं कहना चाहूँगा ये दरअसल इसके पीछे लगे उन अधिकारियों-कर्मचारियों का प्रयास था, मेरे प्रोफेसर्स का प्रयास था। वर्ना ऐसी छोटी बातों पर कोई ध्यान ही क्यों दे कि कई डिपार्टमेंट में अभी एग्जाम भी शुरू नही हुए और मुझे मेरा रिजल्ट भी मिल गया। पाठक सर ने आखिर में मुझ से कहा कि आज तक कभी ऐसा हुआ था आज के पहले कि जिस दिन परीक्षा हो उसी दिन रिजल्ट आ जाए? सर, उस संस्था का इतिहास आप मुझ से कहीं बेहतर जानते हैं। लेकिन जितना मैंने जाना है उतने में तो ये भरोसे से कह सकता हूँ कि नही सर, ऐसा नही हुआ था। आप लोगों ने जो कर दिखाया है उसपर शायद पहली बार सुनकर विश्वास न हो।
सबसे मजेदार ये कि इन सभी लोगों में से कोई मुझे पहले से नही जानता था। किसी ने मेरा नाम भी नही पूछा। किसी को ये मतलब नही था कि मैं कौन हूँ। वो बस इतना जानते थे कि मैं उस संस्था का एक छात्र था, मेरी कुछ समस्याएं थी, वक़्त की बंदिशें थीं, जो नासूर बन गई थी। और उन्होंने मेरा एक साल बर्बाद होने से बचा लिया। मुझे कई वर्षों के अवसाद और अफसोस से बचा लिया। ये दर्शाता है कि अपने व्यस्तता में भी वो एक-एक चीज को कितनी गंभीरता से लेते हैं। अवधेश सर, अजय सर और उनसे जुड़े अन्य लोगों ने शुरू से अंत तक तमाम प्रक्रियाओं को सुनिश्चित कराया। बवेजा सर ने सबको बोल-बोलकर मेरे पेपर्स इवैल्यूएट कराए। और हमारे डीन पाठक सर बार-बार मुझ से पूछते रहें। जहाँ जरूरत हुई वहाँ खड़े हुए।
अपने आदत के विपरीत आज मैं सबको धन्यवाद देना चाहता हूँ। Anshu Mohan भैया उन चंद लोगों में थे जो शुरू से आखिर तक कहते रहें कि मेरे एग्जाम हो जाएंगे। मेरे तमाम टीचर्स जो लगातार मेरे साथ रहे। Rupesh Ranjan भैया को मैं विशेष रूप से धन्यवाद देना चाहूंगा। मुझे नही जानते हुए भी उन्होंने मुझे हैदराबाद में एक बड़े भाई की कमी नही खलने दी। Vagish Mishra भैया मुझे बस इतना भर जानते थे कि मैं मनीषा मैम और बीएचयू का स्टूडेंट हूँ, इतने भर से ही उन्होंने उस दिन से लेकर आज तक ये सुनिश्चित किया कि मुझे कोई असुविधा न हो और मेरा मार्गदर्शन किया। हैदराबाद यूनिवर्सिटी छोड़कर मुझे दुख हो रहा कि मैं उस शानदार वातावरण का हिस्सा नही हो पाऊंगा। लेकिन... Rameshwar Mishra सर और Kailash Nath Vishwakarma सर का भी धन्यवाद कि उन्होंने हर कदम मेरा भरोसा बनाए रखा। उन तमाम अनाम लोगों का भी शुक्रिया जिन्हें न मैं जान पाया और जो न मुझे जान पाए लेकिन उन्होंने मुझे निराश नही किया। सबसे आखिर में सबसे महत्वपूर्ण नाम Manisha मैम, इस बार शब्द नही बचे मेरे पास, शब्द अगर होंगे तो बेईमान होंगे।
(कुछ महत्वपूर्ण नाम छूट भी गए हैं, मैं उनसे क्षमाप्रार्थी हूँ। व्यक्तिगत तौर पर मैंने सबसे बात कर ली है। कुछ नाम इसलिए भी मेंशन नही कर पाया क्योंकि वो फेसबुक सूची में नही हैं।
(कुछ महत्वपूर्ण नाम छूट भी गए हैं, मैं उनसे क्षमाप्रार्थी हूँ। व्यक्तिगत तौर पर मैंने सबसे बात कर ली है। कुछ नाम इसलिए भी मेंशन नही कर पाया क्योंकि वो फेसबुक सूची में नही हैं।
अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की कमी तो ताउम्र खलेगी। लेकिन आज और अधिक दावे के साथ के साथ कह सकता हूँ कि इतने गहरे जड़ों वाला विश्वविद्यालय और ऐसे लोग आपको कहीं नही मिलेंगे। पता नही भविष्य में ऐसे किसी संस्था का हिस्सा हो भी पाऊंगा या नही! बाकी पिछले एक हफ्ते में असम्भव तो हुआ ही है। क्योंकि इतने 'नही' के बीच से गुजरकर सब हो जाने के बाद मुझे अब भी विश्वास नही हो रहा कि ये हो चुका। मुझे अपने एकांत की तलाश है जहाँ सिर्फ मैं होऊँ, तब शायद खुद को विश्वास दिला पाऊँ।
बहरहाल जो अच्छाई हमारे बीच है उसपर बात तो होनी ही चाहिए। मैं कोशिश करूंगा कि इन प्रयासों को मैं दूर तक पहुंचा पाऊं और इन्हें अपने भीतर हमेशा सहेज पाऊँ! इन तमाम लोगों से उनके गुण अगर थोड़ा भी सीख पाऊँ तो धन्य हो जाऊंगा!
बहरहाल जो अच्छाई हमारे बीच है उसपर बात तो होनी ही चाहिए। मैं कोशिश करूंगा कि इन प्रयासों को मैं दूर तक पहुंचा पाऊं और इन्हें अपने भीतर हमेशा सहेज पाऊँ! इन तमाम लोगों से उनके गुण अगर थोड़ा भी सीख पाऊँ तो धन्य हो जाऊंगा!
Comments
Post a Comment