जून 17, 2018. पटना: वापस अपने शहर में...
शहर के भीतर अपने हिस्से का शहर ढूंढना रोचक होता है। हालांकि ये चुनौतीपूर्ण भी होता है। चुनौतीपूर्ण इस लिए क्योंकि हम सबका शहर अलग है। हम सब अपने भीतर शहर को अलग-अलग जीते हैं। लगातार फैलते हुए होने के बावजूद ये शहर खुद में पूर्ण हैं। हम इन्हें टुकड़ों में जीते हैं मगर। तब अगर हमने अपने वाले शहर को समझने में जरा सी भी चूक की तो वो शहर बदल जाता है, उसके मायने बदल जाते हैं।
आप अगर मुझसे मेरे बनारस का पूछेंगे तो अन्य लोगों की तरह मेरे पास बनारस के सुबह के बजाय वहाँ के रात के किस्से अधिक होंगे। बनारस को मैंने रात में ही सबसे अधिक जीया है इसलिए। पटना अलग था इस मामले में। मेरे हिस्से का पटना सूर्योदय के पहले शुरू हो जाता था। कल सुबह उठने के बाद एक जानी-पहचानी सी हवा किचन से होकर मुझ तक आ रही थी। हाँ, वो हवा पटना की हवा ही थी। लम्बे अरसे बाद इसबार पटना आना हुआ। तीन साल पहले जब हम पटना छोड़कर गए थे, तब से अबतक काफी बदल गया है हमारा पटना। इस बीच कई बार यहाँ आना तो हुआ, लेकिन इस शहर को समय नही दे सके हम, या तो बाबा के साथ उनके बीमारी में उलझे रह गए, या रात को पहुँचे और सुबह ट्रेन पकड़ कर अगले मुकाम को चल पड़े।
उन दिनों डीएवी बीएसईबी में एलेवेंथ-ट्वेल्फ़्थ वालों की क्लासेज सुबह साढ़े छह से बारह चला करती थी। हमें छह बजे तक स्कूल पहुंच जाना होता था। यादों में डूबने पर मैं पाता हूँ कि तब मैं सूर्योदय के पहले ही जग जाया करता था। पूरा पटना जगमग कर रहा होता था। हर मौसम में सुबह की ठंडक लिए सुबह की पानी से स्नान करके मैं सवा पाँच तक स्कूल के लिए निकल जाया करता था। तब बेली रोड, माफ करिएगा जवाहर लाल नेहरू मार्ग पर एकदम भीड़ नही होती थी। अमूमन दिन भर ये सड़क जाम, धूल, धूप, शोर और न जाने क्या-क्या झेलती है। मगर सुबह के उस वक़्त कुछ अमीर-वीआईपी टाइप लोग ही उस सड़क पर टहलते हुए मिलते थे। अमीर इसलिए क्योंकि उस क्षेत्र में आम लोग कम ही रहते हैं। तब हाई-कोर्ट के आगे कई बंगले हुआ करते थे। नीतीश कुमार ने न जाने क्यों उसी दौरान उन्हें तुड़वा कर नया म्यूजियम बनाने का अजीबोगरीब फैसला किया था। जब मैं गया था तब वो आवास तोड़े जा रहे थे। इस बार लौटा तो देखा कि वहाँ एक शानदार म्यूजियम तैयार है। पहले नजर में वो नालंदा के खंडहरों सा बनाया गया है।
परसो पापा को पटना आना था। पब्लिक ट्रांसपोर्ट और जाम के परेशानियों से बचने के लिए हम भी उनके साथ ही आ गए। रास्ते में दो जगहों पर छोटे-छोटे जाम में फंसने के बावजूद हम रात 11 बजे तक पटना पहुंच गए थे। 4 घण्टे से कम समय लगा था हमें। नीतीश कुमार कई बार सड़कों के संदर्भ में ये कहते आए हैं कि वो चाहते हैं कि लोग बिहार के हर कोने से 6 घण्टे में पटना पहुँच जाए। दीघा वाले पुल के बन जाने से उस रूट के छोटे गाड़ी वाले गांधी सेतु के जाम से बच जाते हैं।
खैर, बेली रोड पर साईकिल चलाते हुए हड़ताली मोड़ से गुजर कर राजवंशी नगर तक जाते थे हम। इस बीच सचिवालय के आलीशान बिल्डिंग, कई बड़े-बड़े ऑफिस और आवासीय कॉम्प्लेक्स हमें पटना में ही मेट्रो टाइप शहरों वाली फील देते थे। राजवंशी नगर से भीतर 800 मीटर की दूरी पर हमारा स्कूल था। शहर का एक बड़ा हिस्सा मेरे लिए स्कूल में भी बसता है। उस दौर में पढ़ाई मेरे हिस्से कम ही आई थी। लेकिन राजवंशी नगर पार करते ही मेरे भीतर के भाव बदल जाते थे। एक अजीब सी ऊर्जा का संचार होता था। फिर क्लास में जाते ही अपने पढ़ाई को लेकर चिंता स्वाभाविक होती थी। हम क्लास में अपने बीच अपने फील्ड के बेस्ट ब्रेन्स के साथ बैठे होते थे। टीचर के सवाल पूछने से पहले आया उनका जवाब हमें हर रोज सोचने को मजबूर करता था। जो थोड़ा-बहुत पढ़ पाए हम तब, बस इसी कारण पढ़ पाए।
बाद में मैं दूसरे एरिया में रहने चला गया था। अब साइकिल एग्जीबिशन रोड और डाकबंगला के बजाय शहर के एक कम जाने हिस्से पोस्टल पार्क से खुला करती थी। तब आधे बने चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी और विधानसभा होते हुए मैं पुनाईचक पर बेली रोड पहुँचता था। ट्वेल्थ के दिनों में मैं कभी बाइक से तो कभी बस से स्कूल जाने लगा था। तब मैं शहर का द्वंद्व देखता था। एक तरफ ओवरब्रिज के नीचे बेतरतीब ठूंसे हुए से लोग होते थे तो दूसरी तरफ गवर्नर हाउस के सामने उसके भव्यता के साथ पसरी हुई शांति। सर्कुलर रोड पर हम सरपट चला करते थे। ये पटना वाकई बाकी के पटना से अलग था।
गाँव से दूर पटना मेरा पहला शहर था। गाँव और शहर में एक फर्क है। गाँव शहर होने को बेताब हैं और गाँव के लोग शहर को भागने को। जबकि शहर बेवजह ही गाँवो के किस्मत पर चिढ़ते रहते हैं। ये सच है कि दोनों की अपनी खूबियां-खामियां हैं, मगर संक्रमण के शिकार सबसे अधिक हमारे गाँव ही हुए हैं और आज का सच यह है कि हमारे गाँव, गाँव रहे ही नही। फिर भी गाँव शहर को लेकर एक अजीब ऑबसेशन के शिकार होते हैं। मेरी नजर में ये उनकी हताशा अधिक होती है।
शहर अपने सही अर्थों में शालीनता और व्यवस्था के प्रतीक हैं। ये बात अलग है कि भारत के शहर बेतरतीबी में ज्यादा जीते हैं। फिर भी इसबार का पटना अधिक शालीन लगा मुझे। कई आधे बने ब्रिज इसबार पूरे हो चुके थे। स्टेशन के सामने का जाम अब नही था। वहाँ भी आधा बना बड़ा सा ब्रिज पूरा हो चुका था। सड़क पर खड़े होने वाले ऑटो के लिए भी स्टैंड बन गए थे। पुराना खटारा सिटी बसों की जगह नए-चमचमाते बस दिख रहे थें। बेली रोड पर बनने वाले रिंग ब्रिज पर भी काम काफी तेजी से चल रहा था। अगली बार लौटने पर ये शहर थोड़ा और बदला मिले शायद!
हर शहर का अपना मिजाज होता है। पटना का वो मिजाज इसके मस्ती में मिलता है, इसके बेतकल्लुफी, इसके अव्यवस्थित होने में मिलता है। यहाँ के लोग अब भी वैसे ही थे जैसे पहले थे, शहर का चेहरा-मोहरा भले बदल गया था, चरित्र नही बदला था।
शाम के नाम पर इस शहर के पास दौड़ भर होता है। कभी स्टेशन से फ्रेजर रोड होते हुए गांधी मैदान जाइए तो इसे बेहतर समझ पाएंगे। चारों तरफ हॉर्न-लाइट-जाम पटना के जैसे अन्य शहरों में नही होती। गर होती भी हैं तो इसकी सी खुशबू नही होती। तब इस शहर में पैदल चलना कहीं बेहतर होता है। कल राजवंशी नगर में ऑटो से उतरकर अपने यादों को ढूंढते हुए बनारस हो गया था मैं। पैदल चलने की लत बनारस की ही लगाई हुई है। मैं पैदल ही अपने स्कूल होते हुए उन गलियों की ओर बढ़ गया जहाँ से इस शहर को छोड़कर गया था। घण्टे भर से अधिक अकेले घूमता रहा मैं। इस बीच कई बदलाव दिखे, कई जरूरी-अच्छे से, जबकि कई शासन-सत्ता में बैठे लोगों का पागलपन मात्र थे।
अब इस शहर में ई-रिक्शा भी खूब चलने लगे हैं। कल दोपहर घर से निकलकर ई-रिक्शा पर बैठा ही था कि एक अंकल, आंटी और उनकी छोटी बेटी आ गए। पूरे रास्ते वो पिछली पीढ़ी से अबतक के हुए बदलावों पर चिन्ता कर रहे थे। मोबाइल, सेल्फी को कोस रहे थे। मैं भी उनके चिन्ता में सहभागी तो था, लेकिन साथ ही ये भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा था कि ये वक़्त की गति भर है, जो थोड़ी तेज दिखने लगी है। उन्हें ये उम्मीद दिलाने में लगा था कि उम्मीद अब भी बाकी है। मेरे बारे में जानने के बाद वो बताने लगे थे कि वो अपनी बड़ी बेटी को मेडिकल की तैयारी करा रहे। अपने फैसले पर मुझ से सकारात्मक प्रतिक्रिया पाकर संतुष्ट होना चाहते थे शायद। बातों ही बातों में पता चला कि इसबार वह भी उसी स्कूल से पास हुई थी जहाँ तीन साल पहले मैं था। तबतक हम अपने गंतव्य तक पहुँच गए थे। चलते हुए मैंने उन्हें नमस्ते किया था। आंटी अंकल से कह रहीं थीं, 'पढ़े-लिखे लोग कितने नरम होते हैं न।' अब शायद इतने सामान्य शिष्टाचार के भी आदी नही रहे हम। वर्ना ऐसी प्रतिक्रिया तो नही ही होनी चाहिए थी। खैर, मेरे लिए वही हासिल था, इसके पहले कि हम भीड़ में खो जाते... शहर का ये पक्ष संजोने के लिए कहीं बेहतर था। इसलिए भी क्योंकि अगली बार शहर में डूबने-खोने के लिए इससे बेहतर ईंधन शायद ही मिल सकता था...
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