मई 31, 2018. नीतीश जी को खुला खत।

आदरणीय नीतीश जी,
नमस्कार।
मैं जानता हूँ इसबार आप कुशल नही हैं। ईश्वर से आपके कुशलता की कामना करता हूँ। मैंने पिछली चिट्ठी आपको 31 मई 2017 को लिखी थी, बिहार बोर्ड के परिणाम आने के बाद। तब आपको मुख्यमंत्री जी के नाम से संबोधित किया था। आज नीतीश जी लिख रहा हूँ।
मैं जानता हूँ कि आपकी और आपके राज्य की बेहतरी आपके नीतीश जी बने रहने में ही है। आपको और आपके स्थिति को समझने के लिए आपके सफर को समझना आवश्यक है। याद करिए अपने पहले कार्यकाल को, 2005 वाले कार्यकाल को। आप जब जीतकर आए थे। हर बिहारी ने आपको सर-आंखों पर बिठाया था। तब आप नीतीश जी ही हुआ करते थें उनके लिए। इन 13 सालों में आपने उसके आगे लंबा रास्ता तय कर लिया है। आपकी जिस जनता ने आपको नीतीश जी बनाया था उसी ने आपको चन्दन कुमार बनाया, नीतीशे बनाया और अब तो आपके ही राज्य में लोग आपको तुगलक कुमार के नाम से जानने लगे हैं। आप पढ़े-लिखे हैं, ये तो जानते ही होंगे कि तुगलक को इतिहास किस लिए याद करता है?
इतने सालों में अनेकों मौके आए होंगे जब आपको तीन परसेंट का मुख्यमंत्री कहा गया। आपकी सेहत को फर्क नही पड़ा लेकिन। इसलिए क्योंकि आप जनता के मुख्यमंत्री थे। जनता को विशेषज्ञों के उन विभाजनों से सरोकार नही था। विकास आपकी यूएसपी थी। बड़ा से बड़ा विरोधी भी थोड़े इफ-बट के बाद ये स्वीकार कर लेता है कि आपके कार्यकाल के पहले सात साल बिहार के राजनीति के सबसे बेहतर साल थे।
सोशल इंजीनियरिंग कभी आपका फ़ीचर नही रहा। आपकी मिसालें इस बात के लिए दी जाती थीं कि बिहार जैसे राज्य में भी आप बिना समीकरणों के जीतते थें। जब आप पहली बार जीते थे तब मैं आठ-नौ साल का रहा होऊंगा। लेकिन बिहार के जनता का वो उत्साह मैं भुलाए नही भूलता। मैं नही भूल पाता बूटा सिंह को, जो बिहार के राज्यपाल होते हुए लोगों के नजरों में सिर्फ राष्ट्रपति शासन लगाने के कारण विलेन हो गए थे। लोगों की वो बेचैनी अद्भुत थी। आपको जो प्रेम मिला था वो किसी पैमाने, किसी समीकरण पर नही तोला जा सकता था। इसलिए भी आप छह महीने बाद हुए चुनावों में कहीं अधिक मजबूत होकर आए थें।
हम भारतीय भुल्लकड़ होते हैं, ये बात मैं बचपन से मानता आया हूँ। उनके यादों में नीतीश जी के तुगलक हो जाने के बीच की कई कड़ियाँ धूमिल पड़ गई हैं। आप भी उस दौर वाले नीतीश नही ही रहे हैं अब। जितनी पलटियां आपने मारी है इन वर्षों में, उसमें आपके विरोधियों ने आपका नाम पलटूराम भी रख ही दिया। आप एक वक्त में देश के सबसे विज़नरी नेता कहे जाने लगे थे, आज आलम ये है कि कोई आप पर रत्ती भर विश्वास नही करता। न नेता, न आपकी जनता। अपनी ये छवि आपने अपने फैसलों से बनाई है।
जरा गौर करिए अपने आस-पास के शूरमाओं पर! सलाहकारों के नाम पर आपने नाकारों को नही भर लिया है क्या? सड़कें जो आपके नाम का पर्याय हो गईं थीं, आज वापस अपने असली सूरत में पहुंच गई हैं। कानून व्यवस्था और प्रशासन का अगर कुछ सुनने को मिलता है, तो बस उगाही ही खबरों में होती है। अपराध पर आपका नियंत्रण रहा नही। सोचिए जरा, नीतीश कुमार क्या पहले ऐसे ही कारणों से चर्चा में होते थे? ऐसा क्या हुआ कि आपके एक बयान से देश के सारे खेमे-सारे मोर्चें हिल जाते थे और आज आप रोज बोलते हैं, लेकिन आपके राज्य के छुटभैय्या नेताओं तक को भी फर्क नही पड़ता। बिहार में ब्यूरोक्रेसी को उसका सम्मान-आवाज दिलाने वाले आप ही थे, तब एक राजनेता नही बोला था। आज क्या हो गया कि अपने दल में भी आप भीतर ही भीतर अप्रासंगिक से हो चले हैं?
आपको पता है ऐसा क्यों हुआ है? क्योंकि वो जानते हैं कि कल को आप अपने कहे पर काबिज नही रहेंगे। सत्रह साल तक एक नाव पर चलने वाला हर छह माह पर कूदने-फांदने लगे, एक गंभीर राजनेता की ऐसी अस्थिरता-उच्छऋंखलता कौन जनता पसंद करेगी भला? जिसे जनता ही नही पसंद करेगी वैसे राजनेता का पार्टी और कार्यकर्ताओं में क्या महत्व होगा फिर? वो तो शुक्र मनाइए कि आप एक दल के सुप्रीमो हैं वर्ना... हाँ ये परिवर्तन भी नया है। पहले आपकी पार्टी क्षेत्रीय दलों में सबसे अधिक लोकतांत्रिक हुआ करती थी।
आज की स्थिति ये है कि ढंग का पत्रकार आपके सामने बैठ जाए तो आप अपने अतीत को लेकर दस मिनट भी जवाब नही दे पाएंगे। आप जानते हैं कि दिखावटी आदर्शों ने आपकी ऐसी स्थिति बनाई कि आपके लिए, 'सांप-छुछुन्दर का पर' हो गया। आपको न खुदा ही मिला न... आज आप पीएम की सोचना तो छोड़िए, सीएम होने के लिए भी संघर्षरत हैं।
अपने सबसे प्रिय नेता का ऐसा हो जाना हमें अखरता है लेकिन। ये क्या कर लिया आपने अपना नीतीश जी। आपने अपने विश्वविद्यालयों में सेना के मेजरों को वाईस-चांसलर बना कर बिठा दिया है। सेना वाले अनुशासन के लिए जाने जाते हैं, और वहां स्थिति ऐसी है कि एक सेशन के परीक्षा के लिए तीन साल लगते हैं। क्लास तो छोड़िए, आप परीक्षा तक नही करवा पा रहें। हताश लोगों और छात्रों ने उसे अपनी नियति मां ऐसी बातों पर बात करना भी छोड़ दिया है।
बिहार बोर्ड हाल के वर्षों में हमारा कोढ़ हो गया है। हालांकि वो लाइलाज पहले से था, लेकिन अब उभरकर आ गया है। आप हर साल बात करते हैं, लेकिन समाधान की पहल रत्ती भर नही होती। इसबार तो आपने उसमें भी गजब का दिमाग लगाया है। विवाद न हो इसलिए रिजल्ट ही रुकवा दिया। टॉपर्स की कॉपी का रिजल्ट के पहले ही स्क्रूटिनी होगा। ऐसे सुधार लाएंगे आप।
बीपीएससी, एसएससी की कहानी जगजाहिर है। सोने पर सुहागा आपके शराबबंदी कानून ने किया है। इतने अच्छे पहल को आपके जिद ने बर्बाद कर दिया। अब आलम ये है कि पंद्रह साल के बच्चें पी-पिला रहें, तस्करी कर रहें और प्रशासन अलग-अलग भूमिकाओं में है। अलग-अलग वो भूमिका अधिकतर मामलों में नेक तो नही ही है। सच मे तुगलक ऐसा ही रहा होगा ना?
ऐसे तो नही ही थे आप। उसमें हर छह महीने में आपका मन डोलने लग रहा। दिल्ली से दौलताबाद वाली कहावत तुगलक के लिए ही कही जाती है ना... यकीन मानिए, कहीं के रह नही जाएंगे ऐसे में आप। किस मुंह से आप फिर से विशेष पैकेज और दर्जा मांग रहें। जनता इतनी भी बेवकूफ नही है। उन एक लाख पैसठ हज़ार करोड़ का क्या हुआ, जिसकी घोषणा पीएम करके गए थे। ये मत कहिएगा कि आप उसके लिए जवाबदेह नही हैं।
आपके राजनीतिक सूझ को भी क्या हो गया है पता नही। आप कब से वर्ग विशेष के लिए रैलियों का आयोजन कराने लगे। और तो और उनका आयोजन करने वालों को आप मुखर तौर पर नवाजने भी लगें हैं। फिर जनता तीन परसेंट के मुख्यमंत्री को औकात क्यों न दिखाए भला। नही मानिएगा तो विकल्प भी नही उनके पास दूसरा। ऐसे और उपचुनाव और चुनाव पाइपलाइन में हैं अभी। आप जनता के सीएम ही अच्छे लगते हैं। वही करिए, जाति-धर्म और फर्जी मुद्दों की राजनीति आपके लिए नही है। बड़े मुश्किल से पहचान मिलती है यहाँ लोगों को। उस पहचान को यूं नष्ट न करिए।
उम्मीद है आपको सद्बुद्धि मिलेगी, आप नीतीश जी बनेंगे। आप कोशिश करेंगे कि आपके विश्वविद्यालय तय समय से अपने कैलेंडर को पूरा करें। वर्ना सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा रेवड़ी तो है नही कि केंद्र यूँ ही बांटता चले।पैकेज फ्री में तो आते नही कि यूँ ही लुटाता चले। सो वो तो होने से रहा। कहीं ऐसा न हो कि जनता सेशन लंबा करने के एवज में आपका कार्यकाल छोटा कर दे। वो तो आप मजबूरी हैं इसलिए अबतक टिके हैं या आगे भी रहेंगे, विकल्पहीनता की स्थिति है। वर्ना आपकी सुन तो कोई वैसे भी नही रहा। ऐसे में उम्मीद है आप कहीं हमारी सुन लें...
आशा है आप समझेंगे....
आपका,
एक नागरिक.

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