मई 21, 2018. मेरी पुरानी मुहब्बत और भविष्य के सवाल!
पुरानी मुहब्बत और पुरानी शराब से जुड़े कई मुहावरे हिन्दी में हैं। बात पुराने के साथ की हो तो ज़ख्म और मर्ज़ भी कई बार उपमा के रूप में प्रयुक्त होते हैं। वैसे मुहब्बत और शराब जितने हिन्दी के हैं, उतने ही अन्य देशी भाषाओं और बोलियों के तथा उतने ही अंग्रेजी और अन्य जुबानों के। लब्बोलुआब ये है कि भाव सार्वभौमिक होते हैं। भाषाओं के बंधन के परे। अब शराब में भाव कितना है ये तो मुझे नही पता। लेकिन मुहब्बत के गहराई का अंदाजा मुझे है।
इस खेल में पक्का कितना हूँ इसका अंदाजा तो नही है,लेकिन पका खूब हूँ मैं! खेल इसलिए क्योंकि ये पूरा सृजन एक खेल ही तो है। हालांकि यहाँ मुहब्बत भी वो नही है जो हम अक्सर समझने की भूल कर बैठते हैं। काँटो से बचकर भी हम कई बार राह में गिरे सुबह के खूबसूरत से फूलों पर फिसल जाते हैं। वहाँ गिरना अधिक खतरनाक होता है, चोट शरीर से अधिक मन को लगता है। इसलिए वैसी स्थिति से बचना बेहतर है। युगलों-तरुणों का प्रेम उन फूलों पर फिसलने के समान ही है, अक्सर जाने से अधिक अनजाना होता है। मगर मैं फिर भी रोज मुहब्बत में पड़ता हूँ।
लोग वो भी हैं जो मानते हैं कि प्रेम के लिए कारण की जरूरत नही होती। (आशा करता हूँ कि प्रेम और मुहब्बत के महीन अंतर को दरकिनार कर आप यहाँ दोनों को एक सा ही पढ़ेंगे) लेकिन मुझे रोज प्रेम होता है, कारण से... आसपास के अच्छाइयों से। वो लोग भी हो सकते हैं, जीव भी, निर्जीव भी, साकार भी, निराकार भी। यहाँ तक कि वो बातें भी हो सकती हैं जिनके प्रेम में हम उतरते चले जाएं। तात्पर्य ये कि चित्त में आनन्द लाने वाला एक भाव होना चाहिए। फिर वो एक कारण प्रेम करने के अलग-अलग कारण भी दे जाता है। मूल छोटा हो और उससे जुड़े प्रभाव अधिक, तो ऐसी ही परिस्थिति में हम मानने लगते हैं कि प्रेम को कारण की आवश्यकता नही होती।
आकाश छोड़ने का मेरा फैसला अजीब था। अजीब इसलिए क्योंकि मैंने आकाश इंस्टिट्यूट के जनकपुरी ब्रांच में मेडिकल में एडमिशन कराकर, फी जमा करवाकर, टिकट बुक होने के बाद जाने से मना कर दिया था। कारण ये कि स्कूल के आखिरी दिनों में मुझे मैथ्स से मुहब्बत हो गई थी और मैंने फैसला किया था कि अब मैथ्स ही लूंगा। उन्होंने पैकेज को बदलकर इंजीनियरिंग वाला करने का ऑफर भी दिया था, खैर...
ये मोह इसलिए भी था क्योंकि 12 साल स्कूल में बिताने के बाद अचानक से एलेवेंथ में एक नए सेटअप में जाना कुछ ठीक नही लग रहा था। दुबारा जब नए स्कूल में एडमिशन हो गया, मैथ्स में, तब घर पर एक दिन छुट्टियों में पापा और प्रिंसिपल सर बैठे हुए थे। उन्होंने मुझे बुलाया, पूछा, 'सब ठीक ह, अब आगे का करे के बा?' यही शब्द थे उनके। मैंने कहा, 'सर लॉ की सोच रहा था।' ऐसे किसी जवाब की अपेक्षा उन्होंने नही की थी। स्कूल जिन चन्द बच्चों पर दांव खेल सकता था उनमें से एक का यूँ बिदकना उन्हें ठीक नही लगा शायद। मैं भी उन्हें कैसे बताता कि सर अबतक मैं मन की बोल ही कहाँ पाया हूँ, इतने फैसले बदल लिए फिर भी? वैसे उन दोनों लोगों का रुख भांप कर मैंने लॉ का प्लान ड्राप कर दिया।
ट्वेल्फ़्थ के बाद एक बार फिर मेरे पास विकल्प था कि कहीं एडमिशन लेकर अपने पसन्द के हिसाब से तैयारी करता। लेकिन फिर वही मोह सामने आ पड़ा था। स्कूल और क्लास ही मेरी ज़िंदगी थे मानों। तब ऊहापोह भी थी। मेरे पास विकल्प भी कम थे। ये वाला विकल्प मैंने इसलिए चुना क्योंकि यहाँ मेरे पास आज़ादी थी, अपने मन से पढ़ने की, अपने मन की करने की। सफल भी रहा, आज हम ये दावे से कह सकते हैं कि जितने विभाग, आफिस, इंस्टिट्यूट, लाइब्रेरी हमने छान दिए हैं, उतना कम ही लोगों ने किया होगा। जो मन आया, पढ़ा, किया। दिन-रात टहलते हुए तो सैकड़ो लोगों के गाइड बने होंगे हम लोग। चुन-चुन कर डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट्स भी उठाए हैं हमने। मगर फालतू एक प्रोग्राम, एक मीटिंग में नही गए जबतक बुलाने वाला कोई वो शिक्षक न रहा हो जो वाकई प्रेरित करते हों।
आज फिर बीते हुए वो दौर सामने हैं। आज समझ आता है कि क्यों सालों एक आफिस में टिके लोग जाने के बाद भी उसे छोड़ना नही चाहते। अबतक 17 साल से अधिक हो गए, 26 जनवरी 2001 से करीब-करीब साढ़े 17, स्कूल-यूनिवर्सिटी में रहते हुए। अब लगता है कि हम इसी के लिए बने हैं। बाहर दुनिया अलग है।
बात शुरू मैंने पुराने प्रेम से की थी। कहाँ आपको इस घिसे-पिटे कहानी में उलझा दिया। वैसे बात प्रेम की ही तो कर रहा था मैं इसमे भी। अब जब फैसले लेने का वक़्त है तब अपने विषय से मास्टर्स करने के बजाय लॉ मुझे अधिक आकर्षित कर रहा। बनारस के बजाय मैं अन्य शहरों के विकल्पों पर अधिक गंभीर हूँ। शायद पुराने प्रेम का नशा हो, शायद वो दबी सी पुरानी कसक हो, शायद वो लगाव हो जो काले कोट वालों से अनजाने रहा है। शायद कानून के पेंचों को समझने की वो आदत हो। जो हो, मगर है। कई बार हम सब समझते हुए भी फैसले के वक़्त में अनिर्णय की स्थिति में पहुंच जाते हैं। तय करना मुश्किल होता है। इसलिए भी मैं मानता हूँ कि फैसले ईश्वर करता है। क्योंकि जब हमारे कर्म भी किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित होने लगें, तब निश्चित ही दूर कहीं रास्ते तय किए जा रहे होते हैं। वैसे रास्ते, जो हमारे समझ से कहीं बेहतर होते हैं।
आप जब आगे के विषय में मुझ से पूछते हैं, तब अनिर्णय की ये स्थिति मेरे आंखों से घूम जाती है। सब जानकर भी कुछ तय न कर पाना ही जीवन है। इसकी खूबसूरती इसके अनिश्चितता में ही है। प्लीज अभी मुझ से ऐसे सवाल मत पूछिए। शायद एक महीने बाद मैं बेहतर बता पाऊँ। वैसे भी मुहब्बत अपना रास्ता ढूंढ ही लेगी। उसे कसौटियों की दरकार तो है नही...
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