मई 12, 2018. जयसियाराम: ये बंधन बस के यात्रा से आगे की है!

तस्वीर पुरानी है। पिछले साल की, 23 जुलाई 2017। चेहरों को देखेंगे तो थकान का अंदाजा भी हो जाएगा। उस दिन हमने कार या बाइक के बजाय बस से जाने का तय किया था। रास्ते का हमे पता था, बरसात के दिन थें, इसलिए अपनी गाड़ी ले जाना बेहतर विकल्प नही होता। बस से जाने का एक फायदा ये भी होता है कि आप अपने आस-पास से रूबरू होते चलते हैं।
नेपाल, खासकर उसके मैदानी मिथिला क्षेत्र, मधेश को मैंने जितना पढ़-सुनकर जाना था, इस एक दिन ने उसका कहीं बेहतर साक्षात्कार कराया था। आज ये जगह अचानक से चर्चा में है। मगर इसके पीछे का मर्म आज भी अनछुआ न रह जाए इसलिए मुझे ये तस्वीर निकाल लेना जरूरी लगा। हमने जनकपुर जाने के लिए सीतामढ़ी के भिट्ठामोड़ वाले रास्ते को चुना था। जनकपुर को भारत से जोड़ने वाले तीन रास्तों में ये अलग इसलिए है क्योंकि ये ही जनकपुर और माँ वैदेही(जानकी) के जन्मभूमि पुनौरा के बीच का सबसे सरल रास्ता है।
आज प्रधानमंत्री मोदी जब वहां गए तब सबने इसको भारत-नेपाल, मिथिला-मधेश जैसे न जाने कितने पैमानों से देखा। दोनों तरफ एक अलग कौतूहल था, कौतूहल स्वाभाविक भी थी क्योंकि जाने-अनजाने आज का दिन इस जगह के लिए विशिष्ठ है। एक बड़ी आवाज जो दोनों तरफ से लगातार आ रही थी, उसे आज मोदी ने लयबद्ध कर दिया।
तस्वीर लगानी मुझे इसलिए भी जरूरी लगी। उस दिन बस के आगे की सीट पर बैठ के मैंने जो अनुभव किया था वो मैं शायद ही भूल पाऊँ। मेरे साथ खड़े मेरे छोटे भाई को देखिए, उसका चेहरा देखिए। अमूमन इस उम्र के बच्चे किसी नई जगह को देखकर खिल जाते हैं। उनमें एक अलग उत्साह होता है। लेकिन इसे देखिए, ये फ्रेम में भी मुश्किल से आया है।
सुरेश महतो, एक लड़का जो बस खुलने के कोई दस किलोमीटर बाद चढ़ा था। शायद जलेश्वर के आस-पास। दस-ग्यारह साल उम्र रही होगी बमुश्किल। मेरे पास खड़ा था, बस अपनी क्षमता के ढाई गुणा भरी हुई थी। मैंने उससे बात करना शुरू कर दिया। उसी से इसलिए क्योंकि कंडक्टर को पैसे देते हुए मैंने उसके चेहरे पर एक अजीब मासूमियत देखी थी। वो स्कूल ड्रेस में था। अपनी बड़ी बहन के यहां जा रहा था। शायद उसके पास वही सबसे बेहतर कपड़ा था। पॉकेट में में 50 रुपए(नेपाली, भारतीय 31 रुपए लगभग) से भी कम थें। उसने बताया था कि वो अक्सर अपने बहन के यहां चला जाता था। वहाँ के कस्बे में वो एक फ़िल्म(भोजपुरी) भी देखता था हर बार। सरकारी स्कूल में पढ़ता था सुरेश। सीमा को भूल जाए तो बहुत फर्क नही है इसपार और उस पार। मगर लोगों के जीवन में सदियों का फर्क है मानो। मैथिली फिल्में बहुत चलती नही और हिन्दी वहाँ के लोग देखते नहीं। घर मानो ये बताने के लिए थें उधर जैसे बरसों के किसी उम्मीद में हों वे, किसी चमत्कार के उम्मीद में। जर्जर बाजार, मकान, दुकान, अस्थाई से पुलिस स्टेशन। सब मानो वर्षों से रुका हुआ हो।
सुरेश मुझे इसलिए पसंद आया क्योंकि उसके चेहरे पर आनन्द था। उसे फर्क नही पड़ता था कि उसने कहाँ जन्म लिया है, शायद उसे पता नही था। गर रहा भी होगा तो वो इसके निश्छलता और उत्साह के आगे फीका था। स्कूल के नाम पर मैंने बस दो सीबीएसई स्कूल देखा था उस 25 किलोमीटर के रास्ते में। पता नही नेपाल के अपने स्कूल क्यों नही दिखे, जो दिखे भी वो गिरते हुए से लगें। सुरेश के स्कूल की तरह, जहाँ वो जाता भी तो बस बैठ कर वापस आने।
जीवन सचमुच अलग था वहां। रास्ते गड्ढों में बने थे, जबकि पर्यटन के दृष्टि से उस कॉरिडोर का महत्व जगजाहिर है। बरसात में बसें साइकिल वालों को बिना कुछ समझें दो मंजिले जितने ऊंचाई के छींटे उड़ाते हुए चल रही थीं, फिर भी रफ्तार ऐसी धीमी कि 2 घण्टे लग गए उस छोटी सी यात्रा में। मैं गर्मी के मारे ऊंघ गया था, बस से आने के अपने फैसले पर अफसोस कर रहा था। बस से क्या, रविवार को वहां जाने के ही फैसले पर अफसोस हो रहा था। तभी रौनक ने मुझे जगाया, लगभग झुलाते हुए, ऐसा जैसे शायद वो दो-तीन बार भाईजी कहकर निश्चिंत हो चुका था कि मैं सो गया हूँ। जर्जर उस बस में ऐसा सो गया था मैं ध्यान भी नही रहा। 17 सीट वाले बस में 50 से अधिक लोग जो थें। मैंने रौनक से पूछा, 'पहुंच गए क्या?' जागते हुए के साथ चौड़ी सड़कों को देख इतना अंदाजा तो हो गया था कि हम किसी बड़े शहर में आए हैं।
उतरने के साथ ई-रिक्शा खड़ी देख यह भ्रम और पुख्ता हुआ। पर शहर में घुसते ही असलियत वहां भी वैसी ही थी। पुराने बेतरतीब बसे उस सभ्यता को उपेक्षा की आदत हो चली है शायद। इतना की वहां ठहरना मुश्किल था। हम जाने के साथ ही लौटने की हड़बड़ी में थे। क्योंकि मैं वापसी के बस के हालात की कल्पना कर पा रहा था।
सीमा के अलावा उस क्षेत्र से हमें कुछ नही बांटती। मोदीजी ने ठीक कहा। हम एक ही हैं। पर जाने किस खेल ने हमें ऐसा दूर किया है कि उस पार वाले सदियों पीछे जीने को अभिशप्त हैं। हालांकि उसका अपना मज़ा भी है। सुरेश जो जीवन जी रहा था, वो हम आज चाह कर भी नही जी सकते। मुझे पांच साल से अधिक हो गए अपने घर के लीची खाए, अपने आम के खेत मे टिकोला चुने। लेकिन उस जीवन के दर्द-दंश अधिक हैं। जो आज सुरेश के खेतिहर मजदूर-किसान पिता बेहतर जानते हैं। जब पूरी मेहनत के बाद अगर कुछ उनके हिस्से आती है तो वो बाढ़ की विभीषिका होती है।
आज सुनने से अधिक वो कार्यक्रम पढ़ने लायक था, वहां के लोगों के चेहरे को, मेयर को, मुख्यमंत्री को, प्रधानमंत्री मोदी के हाव-भाव को... विस्तृत बात करने का मन था इस मसले पर। लेकिन कल परीक्षा भी है मेरी। गर अभी लिखने बैठ गया तो कल वहां लिखने के लिए जग नही पाऊंगा। कल शाम मुखातिब होता हूँ। तबतक आप समझने की कोशिश करिए, सीमाओं के परे इंसानियत को, जीवन को, प्रेम को... निश्छलता को,  उन मासूम निश्छल आंखों को, जो राजनीति से कोसों दूर हैं!
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पार्ट:2| मई 13, 2018.
परसो का दिन विशिष्ठ था। इसलिए क्योंकि उस दिन जन ने तन्त्र को, राजनीति को आभासी सीमा के पार एक बड़ा संदेश दिया है। जनकपुर में उस दिन जो दिखा उससे अधिक जरूरी वो देखना था जो सीधा दृष्टिगोचर नही था। संदेशों को पढ़ने के लिए परोक्ष को समझना अधिक जरूरी होता है।
नेपाल के रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री मोदी के भाषण विशेष नही थे। सुनने लायक भाषण जनकपुर के मेयर ओर प्रान्त नम्बर 2 के मुख्यमंत्री के थे। रक्षा मंत्री महोदय तो बार-बार मित्र राष्ट्र भारत ही करते रह गए। लेकिन जब मेयर लालकिशोर साह बोलने आए तो उन्होंने शुरुआत कुछ ऐसी की थी, 'समारोह के मुख्य-आकर्षण, हमारे दिल के धड़कन भारत के प्रधानमंत्री, संघ सरकार के तरफ से आए हुए माननीय रक्षा मंत्री।' अपने सरकार के मंत्री के लिए उन्होंने 'आए हुए' का प्रयोग किया, जबकि भारतीय प्रधानमंत्री को आकर्षण कहा। 'जबतक सूर्य का उदय नही हुआ था, जबतक लैंडिंग नही हुई थी, तबतक उनका आगमन अपने पूण्य भूमि, अपने ननिहाल में हो पाएगा इसकी हमें उम्मीद नही थी।' ये शब्द थें उनके मोदीजी के लिए, भाव का अंदाजा आप लगा सकते हैं। इन शब्दों में छिपी बेचैनी सहज व्यक्त है। ऐसे में अगर मोदीजी ने कह दिया कि वो वहां जाने वाले पहले पीएम हैं, तो उसको दूसरे अर्थों में लेने के बजाय उसके आवृत्तियों को समझने की कोशिश करिए।
मेयर साहब का कहना था, 'बीस वर्षों से हमारा कोई निर्वाचन नही है, जर्जर अवस्था है, अगर हम पीएम का अभिनन्दन कर पाए हैं उसके लिए किशोरी जी, माँ जानकी को धन्यवाद देते हैं।'
दुर्दशा जाहिर भी है। आपने अगर ध्यान दिया होगा तो आपकी नजर जगदीश साउंड, बीरगंज पर निश्चित गई होगी। जिसे हम रामायण सर्किट के नाम पर विकसित करना चाहते हैं वहाँ चुनौतियाँ कितनी गहरी है उसे समझने की ये सबसे प्रत्यक्ष कड़ी थी। ये प्रधानमंत्री मोदी का कार्यक्रम तो नही ही था। देश-विदेश में उनके कार्यक्रम की भव्यता अलग होती है। जबकि वहाँ उद्घोषक से लेकर 'स्वागत-गान' गाने वालों तक कोई पेशेवर नही लग रहा था। 'मंगलमय दिन आजु हो, पाहुन छथि आएल...' गाने के लिए आपको कहीं बेहतर गायक मिल जाएंगे मिथिला में, सीमा के दोनों ही तरफ। लेकिन यहाँ तो ऐतिहासिक रूप से इतने महत्वपूर्ण शहर में एक ढंग का साउंड सिस्टम भी नही मिला।  जबकि बहुत बड़ी व्यवस्था भी नही करनी थी। 150 किलोमीटर दूर से मंगाया गया साउंड सिस्टम ही कहानी कहने को काफी है। वहां भाव और दिल के अलावा शायद ही कुछ था।
मधेसियों का संघर्ष छुपा नही है। इस क्षेत्र में नेपाल की लगभग आधी आबादी रहती है, जबकि इसका क्षेत्रफल नेपाल के कुल क्षेत्रफल के 23 प्रतिशत के करीब हैं। इस आबादी का अधिकतर हिस्सा भारत से पलायन करने वालों का है। वो दूसरे दर्जे के नागरिक होने को अभिशप्त हैं और लंबे समय से मुक्ति-बेहतरी के लिए संघर्षरत हैं।
मेयर ने भारतीय दर्शन में उस क्षेत्र के योगदान को भी गिनाया। उन्होंने जैमिनी, कणाद, गौतम, कपिल से लेकर यागवल्क तक का नाम लिया। उन्होंने शस्त्र की निरर्थकता और शास्त्र के बोधकता की बात की।
जब प्रधानमंत्री जी का सम्मान हो रहा था तब वहां के रक्षामंत्री मूक खड़े थे जबकि उनसे कहीं नीचे के प्रतिनिधि जनकपुर की चाभी भारत के प्रधानमंत्री को सौंप रहे थे। जनता अलग-अलग बैनरों के साथ खड़ी थी, जिसमें आजाद मधेस की बातें भी थीं। जरा समझने की कोशिश करिए जनता छटपटाहट को।
मुख्यमंत्री लालबाबू राउत ने नेपाल के बजाय मैथिली अस्मिता की बात की। उन्होंने मैथिली सम्मान, भारत के साथ खुले सीमा, दोनों देशों के बीच होने वाले वैवाहिक संबंधों की बात की। जब उन्होंने अपने ही राज्य(संघ सरकार) के विभाजनकारी नीतियों की बात की तब वहां मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया देखने लायक थी।
उद्घोषक ने विदेह को लोकतांत्रिक आंदोलन की अगुवाई करने वाली भूमि कहा। बीच-बीच में मोदी की मुस्कान भी देखने लायक थी।
मोदी जी बहुत विशेष भाषण नही दिया पर छुपे संदेशों को पढ़ना जरूरी था। उनके भाषण कला पर बात करने की जरूरत नही है। जिस स्पष्टता के साथ बिना देखे उन्होंने मैथिली बोली वो स्पर्शी था। वैसे मोदी जी, कहावत पग-पग पोखर माछ-मखान की नही, पान-मखान की है। हम समझ सकते हैं, मैथिलों के शूरता(!) की कहानियों ने आपको माछ-मखान कहने को मजबूर किया होगा! वैसे वहां मौजूद लोगों के कसमसाहट पढ़ने लायक थी। परसों ही भाजपा से निष्कासित दरभंगा सांसद कीर्ति आजाद ने ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने मोदी सरकार से अपील करते हुए अंग्रेजी सरकार और नेपाल के गोरखा राजा के मध्य हुए उस समझौते की बात की जिसमे मिथिला के एक बड़े हिस्से को नेपाल को दे दिया गया।
दोनों देशों के तमाम घोषणाओं के मध्य जो सबसे अधिक ध्यान देने लायक है वो उस क्षेत्र का पिछड़ापन है, गरीबी है, मजबूरी है, उस पर वहां की सरकार ने ध्यान नही दिया है। उल्टे उनके साथ भेदभाव की नीतियां बनाई गईं। जबकि वहां के लोग भारत को अपना समझ अक्सर इधर को ताकते हैं। लेकिन यहां की सरकारों ने भी शायद ही कुछ विशेष किया है। उनकी संस्कृति, उनका इतिहास, उनकी बोली, उनकी भाषा, सचमुच उनका सबकुछ तो हमारा ही है, फिर वो मदद के लिए हमारी ओर नही देखेंगे तो कहां जाएंगे?
परसों वहां के नेता से लेकर लोग तक अगर फूट पड़े थें तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें लगा था कि उनका कोई अभिभावक उनके बीच आ गया है। उन्हें बड़ा संबल मिल गया है।
सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, व्यापारिक संबंधों के इतर एक ये क्षेत्र भी है जो भारत-नेपाल संबंधों में उच्च वरीयता की होनी चाहिए। हम बस चलाएं, ट्रेन चलाएं। ठीक हैं। लेकिन कुछ क्षेत्र वो भी हैं जो बस-ट्रेन की यात्रा से आगे के हैं। उनपर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। हानि-लाभ के लिए नही, इंसानियत के लिए। इंसान के कल्याण के लिए।

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