जून 11, 2018. मुख्यमंत्री, बिहार के नाम खुला खत।

आदरणीय मुख्यमंत्री जी,
नमस्कार।
उम्मीद करता हूँ कि आप ये भूले नही हैं कि आप एक प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। दायरों में सिमट जाना त्रासद होता है। अपने उन दायरों को छाँटने के क्रम में मैंने बिहार पर बात करना कम कर दिया था। यहाँ से नाउम्मीद हो जाना भी एक कारण था। लेकिन हाल कि परिस्थितियां ऐसी बनी है कि बार-बार अलग-अलग कारणों से बिहार पर बात करना ही पड़ा है। कल फिर वैसी ही खबर आई है।
आपने बिहार मे खैनी को प्रतिबंधित करने का फैसला किया है। प्रतिबंधित करना हमेशा से आपका पार्ट टाइम शौक रहा है। पहले गुटखा, फिर दारू, दहेज और अब तम्बाकू। हालाँकि ये सभी ही अच्छे कदम हैं, लेकिन बात प्राथमिकताओं की है। ये पार्ट-टाइम शौक कब आपका फुल टाइम बिजनेस बन गया ये आप भी नही जान पाए शायद। मुझे उस दृश्य की कल्पना रोमांचित कर रही जब राज्य के पुलिस वाले दीवारों के दरारों में, घर के कोनों में और न जाने कितने ही ऐसे जगहों पर नए तकनीक के माध्यम से तम्बाकू खोजेंगे। आपने तकनीक को भी बड़ा मजेदार आयाम दिया है। दारू वाला मामला ही देख लीजिए, मुंह सूंघकर ब्रेथ-एनालाइजर टेस्ट हमारे यहाँ ही सम्भव है।
बात सच में प्राथमिकताओं की है। आपको तय करना पड़ेगा कि सरकार क्या सिर्फ मोरल-पुलिसिंग के लिए है? क्या प्रशासन बस उन्हीं लोगों के लिए है जो दरअसल समाज के अवांछित हिस्सा है? आप उन्हें सुधारने पर इतना जोर देने लगिए कि आम लोगों का जीना ही मुहाल हो जाए। पुलिस का काम जब शराब और तंबाकू पकड़ना ही हो जाए, तब उसके मुख्य कार्यों पर ध्यान कौन देगा?
कल मुजफ्फरपुर से भी एक खबर आई साहब। उत्तर बिहार का सबसे बड़ा शहर है ये। उस लिहाज से प्रशासन और राजनीति के सबसे प्रमुख लोग यहां से ताल्लुक रखते हैं। कल ही की खबर है कि यहाँ सामाजिक कल्याण मंत्रालय के एक केंद्र में रहने वाली 8-14 साल की लड़कियां रसूखदार लोगों को सप्लाई की जाती थीं। जी, सप्लाई की जाती थीं, यही शब्द थें। उनमें से कई लड़कियां गर्भवती पाई गई हैं। सोचिए कितनी संवेदनहीन स्थिति है। अपने शहर के ऐसे हालात विचलित करते हैं। ऐसे में और अधिक जब ऐसे अपराधों पर भी आरोप-प्रत्यारोप और लीपापोती का खेल होता है।
ये सच है कि इसमें व्यवस्था के अलावा समाज का दोष भी है। समाज के रूप में हम भीषण रूप से नीरस, हीन और अधोगामी हो गए हैं। लेकिन इसका फायदा आपको तो नही उठाना चाहिए न? गर उठाते हैं तो आपको खुद को आदर्शवादी कहने का कितना हक है।
नीतीश जी, आज फिर से आपका राज्य बोर्ड परिणामों के बाद चर्चा में है। मैंने कहा था कि चेहरा बचाने कि आपके कोशिश के बावजूद भी दरार दिख ही जाएंगे। साल दर साल यही होता है। आप कितना सीखते हैं? जमीन के बजाय दिखावे के लिए काम करेंगे तो यही होगा। परिणाम इसीलिए सिफर होता है। हर बार पिछला साल दुहराया जाता है। हाँ हर बार आप नया शिगूफा जरूर छेड़ देते हैं। इतने पलायनवादी कब से हो गए आप?
आप भाग रहे हैं... बच रहे हैं... ये आपकी प्रवृत्ति नही है। देखिए तो, जिन शिक्षकों के ऊपर पहले ही सारे राज्य का बोझ था, उन्हें आपने एक और नया काम दे दिया। सुबह होने से पहले ही उन्हें खेतों और सड़कों की रखवाली के लिए निकलना पड़ता है। खुले में शौच रोकने के लिए।
खुले में शौच ठीक नही है। लेकिन क्या शिक्षकों का यही काम है? ठीक है कि आपने कुछ अयोग्य लोगों की भर्ती की है। लेकिन उस गलती को सुधारिये न। उन्हें ट्रेन करिए। पढ़ाने योग्य बनाइए। उनका असली काम तो वही है। बाकी काम तो आप असली वाले से भटकाने के लिए कर रहे हैं। सच है, बात प्राथमिकताओं की ही तो है।
एक ही बात दुहराते बुरा लगता है। इसलिए हम बोलना भी छोड़ देते हैं। आप जैसे घाघ उसी का फायदा उठाते हैं। अब पूरे घाघ हो चले हैं आप। लेकिन याद दिलाता चलूँ, हमारे साथ जिन लोगों ने एडमिशन लिया था, बिहार यूनिवर्सिटी में उनका सेकंड ईयर का पेपर अब भी नही हो पाया है।
ये भी याद दिलाना जरूरी है कि बरसात शुरू होने को हैं। एकाध महीने बाद आधा बिहार बाढ़, आधा सुखाड़ के कहर से जूझेगा, पिछले साल भी वही हुआ था। पिछले साल से अबतक आपने कितना काम किया है? इसबार कहर कम हो उसके लिए आपने कुछ किया है क्या? नही, आपको गंगा के गाद से अधिक कुछ पता ही नही। जो उससे भी बच जाए तो बालू से अधिक तो आप सच मे कुछ नही जानते। इसलिए हम भी रोते हैं। क्या रोते रहना ही हमारी नियति है? आप ऐसे में पैकेज मांगने के अलावा सचमुच कुछ नही करेंगे क्या?
कल सीतामढ़ी में था तो नेपाल बॉर्डर घूमने चला गया था। नीतीश जी, सड़क ऐसी थी कि 30 किलोमीटर के सफर में अंग्रेजी वाला सफर करने लगे इंसान। सालों से उन्हें बनाने का छलावा कर रहे आप। लेकिन हकीकत है कि वो बदतर ही हो रही।
लूट-हत्या-बलात्कार-अशिक्षा-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार महज शब्द हैं आपके लिए। उनसे फर्क नही पड़ता आपको। हालांकि जिनसे आपको फर्क पड़ता है उससे आम लोगों को कोई फर्क नही पड़ता। बिहार की हकीकत ये है कि आज न गुटखा बन्द है, न दारू, न दहेज और ना ही खैनी बंद हो पाएगा। बिहार में एक बड़ा वर्ग खैनी किसानों का भी है। व्यक्तिगत आदतों पर इतनी दखलंदाजी ठीक नही। यूँ लोगों के घर में झांकना बंद करिए। लोग आजिज हो चुके।
आपके हरकत ऐसे ही कम उटपटांग नही हैं। तमाम जमूरे आपने ऊपर से बिठा रखे हैं अपने आस-पास। अब और प्रहसन मत करिए। ऐसा मत करिए कि सब मजाक बनकर रह जाए। हकीकत से भागने से नही होगा, आप ही अपदस्थ कर दिए जाएंगे। बख्श दीजिए लोगों को साहब। उम्मीद तो वैसे भी नही है कोई आपसे! :(
आपका,
.....................
(आज खुद के नागरिक-बोध पर भी संशय है, इसलिए पहचान नही लिखूंगा।)

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