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Showing posts from September, 2018

सबरीमाला हिंदुओं का मंदिर है ही नही!

दक्षिण के हिन्दू अपने धर्म के मामले में उत्तर वालों से कहीं अधिक सजग और संवेदनशील होते हैं। वो जानते हैं कि धर्म उनके अस्तित्व का महत्वपूर्ण आयाम है। हिन्दू धर्म खुद में स...

धारा 497: माफ करिएगा साहब! लेकिन इस फैसले पर आपके आपत्ति को स्वीकार करने के लिए हमें चरित्रहीन होना होगा...

पिछले कुछ समय में देश के आम जनमानस में न्यायपालिका के फैसलों के प्रति रुचि बढ़ी है। अभिजात्य सी मान ली गई न्यायपालिका के प्रति ये जागरूकता सुखद है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले त...

पर्यटन पर्व:भारत की उत्सवधर्मिता।

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अतिराष्ट्रवाद वर्तमान सरकार की सबसे कमजोर पक्षों में रही है। बीते सवा चार वर्षों में ऐसे कई मौके आए जब ऐसा लगा कि सरकार एंटीबायोटिक की तरह देशभक्ति का डोज जबरदस्ती देना चाहती है। यूजीसी द्वारा विश्वविद्यालयों को 'सर्जिकल स्ट्राइक डे' मनाने संबंधी सर्कुलर इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। ऐसा करने के तमाम नुकसानों में एक यह भी है कि ऐसा करके वो जनता पर अविश्वास जता रहे होते हैं। जैसे देश का जनमानस नैसर्गिक रूप से राष्ट्रभक्त नही है। हर बात में नुक्स निकालने की हम भारतीयों की आदत तो वैसे भी है। नकारात्मक पक्षों पर ध्यान देते वक्त उसके सकारात्मक सिरे को हम अक्सर छोड़ जाते हैं। हमने बचपन से ही भारतीय समाज के उत्सवधर्मिता के विषय में पढ़ा हूं। करीब-करीब तभी से हम पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के उस तस्वीर को देखते आए हैं जिसके विषय में कहा जाता है कि नेहरू ने दुनिया के सामने भारत की सपेरों वाली छवि पेश की थी। ठीक ही तो किया था। हम सपेरों के देश ही तो हैं। हम औघरों के, अक्खड़ों के, पीरों के देश ही तो हैं। आप मानिए या नही लेकिन वो सपेरे, नट, जोगी, सारंगी वाले हमारी परंपराओं के अभिन्न अंग हैं। द...

अगस्त 12, 2018: पर्सनल पोस्ट: व्यवस्था गर चाह ले तो कुछ भी संभव है।

कई दिन ऐसे आते हैं जब आपको एकांत की जरूरत होती है। ऐसे एकांत की जहाँ आपका खुद से साक्षात्कार हो सके। तब बात करने की भी जरूरत नही होती, बस इतना देखना होता है कि हम अकेले में रो सकें, खुद को थाम सकें। बोझ हल्का हो जाता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विदा होते समय मैंने कहा था कि ये चैप्टर अभी खत्म नही हुआ है, अभी काफी कुछ है इसमें। आज जब आपसे मुखातिब हो रहा तो ये बताते हुए कि वो चैप्टर अब अपने अंजाम को पहुँच चुका जाने कैसा महसूस कर रहा ये मुझे खुद भी नही पता। पिछले कुछ महीने त्रासद रहे मेरे लिए। आपसे जितनी बार भी हँसते हुए मिलता था, भीतर से उतना ही खोखला होता जाता था। जाहिर है, वो हंसी मेरी नही थी, हर बार एक बनावट ओढ़ना पड़ता था। आदत है, मिले हैं तो मुस्काना तो होगा ही। अफसोस कि हाल में वो बनावट भी चली गई थी। मैं अवसाद के मुहाने पर खड़ा था। अब गिरा कि तब गिरा। दूसरों को लाख समझा लेने के बाद भी अपने मामले में हम वही चीजें नही समझ पाते। हर आते हुए रिजल्ट के साथ मेरा दुख और गहरा होता जाता था। ऐसे कम लोग होते होंगे जो अपने ही रिजल्ट से दुखी होते हों। मैं होता था, क्योंकि रिजल्ट न होने के...

जुलाई 18, 2018. बीएचयू, हिंदुत्व की फैक्ट्री: कांग्रेस

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कल दो बार मुझे बनारस जाने का टिकट कैंसिल करना पड़ा। तबियत ऐसी नही थी कि अकेले उतनी लंबी यात्रा कर सकूं, खासकर पिछले एक हफ्ते में लगभग पाँच हजार किलोमीटर की रेल यात्रा के बाद। कल एमए कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के लिए जीडी-पीआई था, जबकि आज एमए पॉलिटिकल साइंस की कॉउंसलिंग थी। कल ही ये तय हो गया कि कम से कम अगले कुछ वर्षों तक इस 'साम्प्रदायिक विश्वविद्यालय' से मेरा कोई सम्बन्ध नही रहेगा। पिछले तीन सालों में यहाँ रहते हुए मुझे क्या हासिल हुआ, इसका जिक्र मैं कई बार कर चुका हूँ। जब इस विश्वविद्यालय की कल्पना की गई थी, तब कांग्रेस के नेता और चार बार के अध्यक्ष रहे महामना मदन मोहन मालवीय तत्कालीन विश्वविद्यालय के पद्धति से अलग भारतीय और हिन्दूवादी परंपरा के एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे। उनकी कल्पना ही इतनी विस्तृत थी कि अक्सर उनके वरिष्ठ सर सुन्दर लाल उनका मजाक बनाने के लिए उनके खिलौने का हाल-चाल पूछ लिया करते थे। सर सुन्दरलाल भावी विश्वविद्यालय को खिलौना ही कहते थे। मालवीय हर बार उनसे कहते कि जब मेरा विश्वविद्यालय बनेगा, तब मैं उसका पहला कुलपति आपको ही बनाऊंगा। ऐसा ही हुआ। अगर...

जून 17, 2018. पटना: वापस अपने शहर में...

शहर के भीतर अपने हिस्से का शहर ढूंढना रोचक होता है। हालांकि ये चुनौतीपूर्ण भी होता है। चुनौतीपूर्ण इस लिए क्योंकि हम सबका शहर अलग है। हम सब अपने भीतर शहर को अलग-अलग जीते हैं। लगातार फैलते हुए होने के बावजूद ये शहर खुद में पूर्ण हैं। हम इन्हें टुकड़ों में जीते हैं मगर। तब अगर हमने अपने वाले शहर को समझने में जरा सी भी चूक की तो वो शहर बदल जाता है, उसके मायने बदल जाते हैं। आप अगर मुझसे मेरे बनारस का पूछेंगे तो अन्य लोगों की तरह मेरे पास बनारस के सुबह के बजाय वहाँ के रात के किस्से अधिक होंगे। बनारस को मैंने रात में ही सबसे अधिक जीया है इसलिए। पटना अलग था इस मामले में। मेरे हिस्से का पटना सूर्योदय के पहले शुरू हो जाता था। कल सुबह उठने के बाद एक जानी-पहचानी सी हवा किचन से होकर मुझ तक आ रही थी। हाँ, वो हवा पटना की हवा ही थी। लम्बे अरसे बाद इसबार पटना आना हुआ। तीन साल पहले जब हम पटना छोड़कर गए थे, तब से अबतक काफी बदल गया है हमारा पटना। इस बीच कई बार यहाँ आना तो हुआ, लेकिन इस शहर को समय नही दे सके हम, या तो बाबा के साथ उनके बीमारी में उलझे रह गए, या रात को पहुँचे और सुबह ट्रेन पकड़ कर अगले मुक...

जून 11, 2018. मुख्यमंत्री, बिहार के नाम खुला खत।

आदरणीय मुख्यमंत्री जी, नमस्कार। उम्मीद करता हूँ कि आप ये भूले नही हैं कि आप एक प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। दायरों में सिमट जाना त्रासद होता है। अपने उन दायरों को छाँटने के क्रम में मैंने बिहार पर बात करना कम कर दिया था। यहाँ से नाउम्मीद हो जाना भी एक कारण था। लेकिन हाल कि परिस्थितियां ऐसी बनी है कि बार-बार अलग-अलग कारणों से बिहार पर बात करना ही पड़ा है। कल फिर वैसी ही खबर आई है। आपने बिहार मे खैनी को प्रतिबंधित करने का फैसला किया है। प्रतिबंधित करना हमेशा से आपका पार्ट टाइम शौक रहा है। पहले गुटखा, फिर दारू, दहेज और अब तम्बाकू। हालाँकि ये सभी ही अच्छे कदम हैं, लेकिन बात प्राथमिकताओं की है। ये पार्ट-टाइम शौक कब आपका फुल टाइम बिजनेस बन गया ये आप भी नही जान पाए शायद। मुझे उस दृश्य की कल्पना रोमांचित कर रही जब राज्य के पुलिस वाले दीवारों के दरारों में, घर के कोनों में और न जाने कितने ही ऐसे जगहों पर नए तकनीक के माध्यम से तम्बाकू खोजेंगे। आपने तकनीक को भी बड़ा मजेदार आयाम दिया है। दारू वाला मामला ही देख लीजिए, मुंह सूंघकर ब्रेथ-एनालाइजर टेस्ट हमारे यहाँ ही सम्भव है। बात सच में प्राथमिकत...

जून 6, 2018. कल्पना हमारा आदर्श तो हो सकती है, हकीकत कत्तई नही है!

बिहार देश के बाकी राज्यों से अलग है। अलग इसलिए नही कि हम देखने-सुनने में उनसे अलग हैं। असल में हमारा मुँह खोलना हमें उनसे अलग कर देता है। अपनी अस्मिता को लेकर बेवजह इतना ऑब्सेस्ड देश में शायद ही कोई जमात है। दोनों ही तरफ से, आधे बिहारी आपको बिहार को गाली देते मिल जाएंगे। बचे हुए आधे अपने इतिहास को लेकर बेवजह गौरव ढोते रहते हैं। जो बच जाते हैं उन्हें ही अपने वर्तमान की समझ होती है। वो कितने हैं? हमारे साथ की समस्या है कि हम बाकी लोगों के साथ एसिमिलेट हो ही नही पाते। यूँ ही चलते रहते हैं, अपने भीतर का बोध लिए। अफसोस! बाद में हम इल्जाम दूसरों पर लगाते हैं हमसे भेद के लिए। पिछले तीन दिनों से आ रहे आपके संदेशों ने मेरे अस्मिता को भयानक तरीके से जगा दिया है। मिनट-मिनट पर आ रहे आपके मैसेजेज और स्टेटस से मेरे भीतर के बिहारी को अचानक से ऐसा महसूस होने लगा है कि मानो रातों-रात हम शिक्षा के क्षेत्र में देश का नेतृत्व करने लगे हैं। तीन दिनों से मैं इस मसले पर बात कर नही पाया था। लेकिन आज समझ नही पा रहा कि किससे बात करूं? कैसे बात करूँ? क्या बात करूँ? मैं उन्हें कैसे संबोधित करूँ जो खुद की ही न...