कई दिन ऐसे आते हैं जब आपको एकांत की जरूरत होती है। ऐसे एकांत की जहाँ आपका खुद से साक्षात्कार हो सके। तब बात करने की भी जरूरत नही होती, बस इतना देखना होता है कि हम अकेले में रो सकें, खुद को थाम सकें। बोझ हल्का हो जाता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विदा होते समय मैंने कहा था कि ये चैप्टर अभी खत्म नही हुआ है, अभी काफी कुछ है इसमें। आज जब आपसे मुखातिब हो रहा तो ये बताते हुए कि वो चैप्टर अब अपने अंजाम को पहुँच चुका जाने कैसा महसूस कर रहा ये मुझे खुद भी नही पता। पिछले कुछ महीने त्रासद रहे मेरे लिए। आपसे जितनी बार भी हँसते हुए मिलता था, भीतर से उतना ही खोखला होता जाता था। जाहिर है, वो हंसी मेरी नही थी, हर बार एक बनावट ओढ़ना पड़ता था। आदत है, मिले हैं तो मुस्काना तो होगा ही। अफसोस कि हाल में वो बनावट भी चली गई थी। मैं अवसाद के मुहाने पर खड़ा था। अब गिरा कि तब गिरा। दूसरों को लाख समझा लेने के बाद भी अपने मामले में हम वही चीजें नही समझ पाते। हर आते हुए रिजल्ट के साथ मेरा दुख और गहरा होता जाता था। ऐसे कम लोग होते होंगे जो अपने ही रिजल्ट से दुखी होते हों। मैं होता था, क्योंकि रिजल्ट न होने के...