सबरीमाला हिंदुओं का मंदिर है ही नही!

दक्षिण के हिन्दू अपने धर्म के मामले में उत्तर वालों से कहीं अधिक सजग और संवेदनशील होते हैं। वो जानते हैं कि धर्म उनके अस्तित्व का महत्वपूर्ण आयाम है। हिन्दू धर्म खुद में सैकड़ो पंथ, मत, संप्रदायों को समेटे है। सनातन धर्म को जब सबसे सहिष्णु और विविधताओं वाला बताया जाता है तो ये उसके मूल में होते हैं। क्योंकि कई बार ये सम्प्रदाय अपने स्वभाव में सनातन के सामान्य स्थापित सिद्धांतों को भी चुनौती देते से लगते हैं। अधिसंख्य हिन्दू मूर्ति पूजा को हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण आयाम मानते हैं लेकिन हिन्दू धर्म के एक प्रमुख मत आर्य समाज की बुनियाद ही मूर्ति-पूजा के विरोध और खंडन पर है। वेदों को हिंदुओं का सर्वमान्य ग्रंथ माना गया है। लेकिन इसी हिंदुत्व में वेद-निंदक सम्प्रदाय भी हैं। और तो और वेद-निंदक चार्वाक दर्शन भी हिन्दू दर्शन परंपरा में स्थान पाता है।

कल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संबंधी मामले में उच्चतम न्यायालय के संविधान पीठ का फैसला आया है। माननीय न्यायालय ने माना है कि लैंगिक समानता के आधार पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की स्वतंत्रता होनी चाहिए। पीठ के चार जज इस मत के थे कि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश होना चाहिए। आश्चर्यजनक रूप से जो पीठ की एकमात्र महिला जज थीं उनका मत इनसे अलग था। मजेदार है, आखिर एक महिला ही क्यों महिलाओं के अधिकार के खिलाफ खड़ी हो रही थी।

मैंने कोर्ट का फैसला अभी नही पढ़ा है। आधा पोस्ट लिख चुकने के बाद पढूंगा ताकि मेरी जो मूल सोच है वो प्रभावित न हो। अधिकारों की परिभाषा क्या है? मोटे तौर पर हमारे अधिकार वो हैं जो हमे समान अवसर उपलब्ध कराते हैं और हमारे सम्मानजनक जीवन को सुनिश्चित करते हैं। मंदिर जाना क्या ऐसे पैमानों पर अधिकारों के श्रेणी में रखा जा सकता है? ध्यान रहे कि धर्म निजी जीवन का विषय है। अच्छा एक मिनट को मान ले कि एक अधिकार है। सार्वजनिक जगहों पर सबकी पहुँच सुनिश्चित हो, ये हमारा अधिकार होना चाहिए। तब सवाल है कि क्या मंदिर सार्वजनिक स्थान है?

यदि बचाव पक्ष इस मामले को अदालत में ऐसे रखता कि सबरीमाला हिन्दुओं का मंदिर है ही नही तब फैसला क्या होता? धार्मिक स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुसार व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों में है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार सबको अपने धर्म को मानने, पालन करने और इसके प्रसार की छूट है। इसी के साथ कहा गया है कि राज्य का कोई धर्म नही होगा, न ही राज्य किसी धर्म मे हस्तक्षेप करेगा और न ही किसी को अपने धार्मिक अधिकारों से वंचित करेगा। यहीं एक नोट और जोड़ दिया गया है, राज्य से सुनिश्चित करेगा कि हिन्दू धर्म से जुड़े हर सार्वजनिक स्थान पर हिंदुओं के सभी वर्ग और समुदाय को प्रवेश मिले। इस प्रावधान को जोड़ने के पीछे जातिगत भेदभाव जैसे कारण रहे होंगे। ध्यान रहे कि हिन्दू धर्म के अलावा अन्य किसी मामले में ऐसा कोई प्रावधान नही है।

सबरीमाला का विवाद क्या था? सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है। ये सामान्य स्थापना है कि माहवारी के समय महिलाएं पूजा-पाठ नही करती और धार्मिक कार्यों में भाग नही लेती। इसके कई आधार दिए जाते हैं। इसके खिलाफ जो सबसे बड़ा तर्क है वो ये है कि ये लैंगिक समानता का हनन है। असली बात यहीं आती है। मंदिर राज्य की संपदा है क्या? नही, ये उस सम्प्रदाय के लोगों का है जो इसमें आस्था रखते हैं। किसी धर्म या सम्प्रदाय का सबसे मुख्य आधार क्या है? उनकी मान्यता और परम्परा। त्रावणकोर का राजपरिवार इस मंदिर से जुड़ा रहा है। जब वो आजादी के बाद भारत में शामिल हो रहे थे तब सरदार पटेल ने उन्हें आश्वस्त किया था कि राज्य उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नही करगा।

कल के फैसले में चार जजों ने संविधान के समानता के अधिकार(अनुच्छेद 14) और छुआछूत से मुक्ति के अधिकार(अनुच्छेद 17) को आधार बनाया है। सही भी है, समानता सबका अधिकार है। लेकिन कहाँ? धर्म व्यक्तिगत होता है। सबरीमाला मंदिर के के ईश्वर 'स्वामी अयप्पा' ब्रह्मचारी माने जाते हैं। वहाँ जाने वाले श्रद्धालुओं को भी नियम काफी सख्त हैं। धर्म श्रद्धा का विषय है, आस्था का विषय है, परंपराओं का विषय है। धर्म कोई प्राकृतिक संसाधन नही है कि इसपर सबका समान अधिकार होना चाहिए। इसको ऐसे समझिए कि केरल में मुख्यतः पुरुषों का एक मंदिर है। वहाँ महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। अब वहाँ महिलाओं का प्रवेश हो या नही इसे तय करने का अधिकार किसी बाहरी को क्यों हो? ये तो ठीक वैसे ही है कि महिलाओं ने कोई धार्मिक संस्था बनाई, वहाँ कोई कार्यक्रम हो। अब पुरुष लैंगिक समानता के नाम पर वहाँ जाने को अपना अधिकार कहने लगे तो कैसा होगा? कल को बागबान के अमिताभ बच्चन की तरह पुरुष करवा-चौथ करने की जिद करने लगें तो कैसा होगा? अपने जीवन में बेशक वो कुछ भी करने को स्वतंत्र है। लेकिन क्या वो जो करेगा वो करवा-चौथ होगा, जबकि ये विदित है कि करवा-चौथ करने के लिए न्यूनतम अहर्ता महिला होना है।

जजों ने माना है कि ईश्वर और उनके श्रद्धालुओं के ब्रह्मचर्य की जिम्मेवारी महिलाओं की नही है। बिल्कुल नही होना चाहिए। लेकिन जहां उनके ईश्वर ही नही, जहाँ उनकी श्रद्धा ही नही उन्हें उनके न जाने से समानता के किस अधिकार का हनन हो जाएगा। यहीं अलग पंथ वाली बात आती है। छोटे से एक समूह का, जिसकी अपनी आस्था है। जो हिंदुत्व का हिस्सा तो है, लेकिन सम्पूर्ण हिंदुत्व नही है। वहाँ हर हिन्दू को अधिकार क्यों मिले? हालांकि बहुमत वाले फैसले ने इस आधार को भी नकारा है।

न्याय का तकाजा क्या है? यहाँ महत्वपूर्ण हैं कि आप किन मूल्यों को प्रधानता देते हैं। यहाँ महिलाओं के किस प्राकृतिक अधिकार का हनन हो रहा था? अगर कोई नही तो फिर ये तो सीधा-सीधा अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होगा कि सबरीमाला के श्रद्धालुओं को उनके धर्म के अधिकार से वंचित किया जा रहा। अगर ये सिंगल जज के बेंच का फैसला होता और अगर वो जज माननीया इंदु मल्होत्रा होतीं तो न्याय क्या होता? अभी जबकि 497 में दो दिन पहले आपने माना था कि व्यक्तिगत सहमति में आपराधिक आधार नही माना जा सकता। जस्टिस मल्होत्रा ने माना कि ऐसे धार्मिक मामलों में न्यायालय फैसला नही कर सकती। इससे धार्मिक व्यवस्था प्रभावित होगी। धर्म के मामलों में फैसला धर्म से जुड़े लोगों को ही लेनी चाहिए।

फिर ये याचिका तो वहां के महिलाओं का था भी नही। जो याचिकाकर्ता थें उनका धर्म से कोई संबंध भी नही था न ही वो महिला थे। उनकी मंशा क्या रही होगी तब एक वर्ग के आस्था को कमजोर करने के सिवा? चार जजों ने फैसले के लिए जो आधार बनाया वो इस मामले में शायद ही महत्वपूर्ण है।

न्यायपालिका के इतिहास में ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं जहाँ मुख्य फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण अल्पमत वाला फैसला रहा है। ये फैसला धर्म मे राज्य के बेवजह हस्तक्षेप का एक ऐसा मामला साबित होगा जहाँ जस्टिस मल्होत्रा के अल्पमत वाले फैसले को सालों तक याद किया जाएगा, जहां उन्होंने अपने वरिष्ठों की तरह किताबी आदर्शो के बजाए संदर्भ को ध्यान में रखकर न्यायोचित आधार रखें।

बाकी जहाँ तक धर्म की बात है तो महिलाएं माहवारी में धार्मिक कार्य नही करती, इसमें उनका स्वविवेक होता है।इसलिए कोई बड़ा फर्क तो फैसले का वैसे ही नही होना है। सवाल न्याय का, तो अगर रिव्यु पेटिशन स्वीकार हो जाए और कल को कोई दूसरी बेंच हो तो निर्णय बदल भी सकता है।

जो मुख्य सवाल है कि न मामले में तीन तलाक जैसे किसी मौलिक अधिकार का सवाल था, न लैंगिक आधार पर उत्पीड़न जैसा कुछ था। फिर जस्टिस मल्होत्रा की ये चिंता बिल्कुल जायज थी, याचिकाकर्ताओं का कौन सा 'सामाजिक हित' छुपा था इसमें?

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