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Showing posts from 2020

(Open) letter to my friend.

My Dear Friend, I am writing this to you for absolutely no reason. I don’t know how this piece will unfold. But I do feel that there are times when it’s better to approach and speak out—no matter be it to the self, to a diary or to the people around. I generally have a bad habit of not expressing myself, my feelings; of not wishing good day, of not saying to take care… But today, I would love to begin with a confession that you are a champion…a genius who hits back at life with an intensity greater than what it throws at you.   Remember our first meeting, when we were introduced to each-other? We were just out of depressing lows in our lives and heading towards something which later turned out to be among the most enriching experiences. The times of rise are usually those when people start getting superiority complexes, but I found you astonishingly humble, grounded, polite; and better than me in many of the aspects. This helped me building a strong foundation to our friends...

जून 4, 2018: उनके नाम, जिन्हें मैं भूल न सका!

मित्रों! उम्मीद है कि आपको इस सम्बोधन से समस्या नही होगी। बहुत खोजने पर भी मुझे इससे बेहतर शब्द नही मिला, अपने साथियों के लिए, प्रोफेसर्स के लिए, जूनियर्स-सीनियर्स के लिए, बड़ों के लिए, छोटों के लिए, उन भाइयों के लिए, उस बहन के लिए; जो मुझे इस शहर ने दिए हैं। वैसे भी सफर का साथी मित्र ही तो होता है। फिर ये सफर तो वैसे भी खास था। पलट कर देखने का वक़्त नही है आज, लेकिन जो मेरे हिस्से आया है उसके लिए कृतज्ञ न होना न्याय नही होगा। चलाचली की बेला भावों के सर्वाधिक प्रवाह की होती है, सफर चाहे कोई हो ! कल एक यात्रा होगी, ट्रेन की यात्रा और उसके साथ ही मेरा ये सफर खत्म हो जाएगा। सब फिर से वापस शून्य पर शुरू होने के लिए। कल के बजाय ये मैं आज ही लिख देना चाहता हूँ, कल लिख नही पाऊँगा मैं, जानता हूँ। जीवन सच मे मजेदार है! केदारनाथ सिंह ने कहा था कि जाना हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है। गुस्ताखी के लिए माफी सहित मैं समझता हूँ कि रुक जाना उससे कहीं अधिक खौफनाक है। व्यक्ति के लिए भी, नदी के लिए भी। नदी ठहरकर बदबूदार गटर हो जाती है, व्यक्ति ठहरकर... वक़्त रहते चले जाना कहीं बेहतर है। वक़्त रहते जाकर...

साथी ये याद रहे : हमारी आँखों की नमी पर अधिकार उनका है!

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...कई दिन बड़े बोझिल से होते हैं, ऐसे ही दिनों में कुछ कहानियाँ होती हैं, आप जानते हैं वो आपको हर बार झकझोरेंगी, रूलाएँगी... आप मगर फिर भी उन्हें पढ़ते हैं... मैं सोने की तैयारी कर रहा हूँ... मेरे टूटे हुए फ़ोन में गाना बज रहा है, 'साथी ये याद रहे, एक साथी और भी था...' न चाहते हुए मैं फिर से उन यादों में लौट गया हूँ... हम भारतीय अपने याददाश्त के मामले में बड़े कच्चे होते हैं। मगर अपने पिता के पार्थिव शरीर को सलामी देते समय उनके बटालियन का युद्ध-घोष करती हुई वो बच्ची शायद आपको याद हो? नही, 'उरी' फ़िल्म वाली नही... अल्का राय, कर्नल मुनीन्द्र नाथ राय की ग्यारह वर्षीय वो बच्ची, जो ये अच्छे से जानती थी कि 27 जनवरी 2015 का वो दिन उसके लिए क्या लेकर आया था! अभी एक दिन पहले ही गणतंत्र दिवस के मौके पर 42 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल राय को युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था। कर्नल बड़ा अधिकारी होता है। पूरे बटालियन को कमांड करता है। शिव अरूर और राहुल सिंह अपने किताब में कर्नल संतोष महादिक के बच्चों के लिए लिखते हैं कि उन्हें आश्चर्य होना चाहिए था कि क्यों...

कुछ सूक्ष्म प्रश्न।

शिव और शिव की शक्ति स्थापित व निर्विवाद हैं। मगर शिव से शक्ति हैं, या शक्ति से शिव; इसपर कल्पनाएँ और चर्चाएँ महज हो सकती है... शास्वत सत्य तो बस यही है कि शिव और शक्ति कभी पृथक हो ही नही सकते... न शिव अपनी शक्ति से; न शक्ति शिव से... मगर ये संसार 'शिव और उनकी शक्ति' जैसे उक्ति ही क्यों प्रयोग करता है, कभी 'शक्ति और उनके शिव' क्यों नही कहता... शायद इसलिए क्योंकि शिव को ही हर बार अपने शक्ति की जरूरत होती है, उनकी शक्ति; शक्ति तो स्वयं में ही पूर्ण हैं... मगर तब जबकि प्रत्यक्ष यही है कि तेंतीस कोटि देवताओं, दानवों या चौरासी लाख योनियों में सदा शक्ति से ही शिव का तत्व है! फिर क्यों हर युग में शक्ति ही सीता या द्रौपदी बनती है? सत्य है कि माता कैकेयी भी शक्ति की ही छवि थी, परन्तु ये क्यों होता है कि इस जीवन में शक्ति भी शक्ति के विरुद्ध ही दृष्टिगोचर होती है। यह भी सत्य है कि भले राम और युधिष्ठिर का दुःख अपने शक्तियों से कम न हो, परन्तु क्यों हर बार शिव के घुटन में शक्ति का ही वन-गमन होता है... क्यों कभी शिव की अग्नि परीक्षा नही होती? शायद इसलिए क्योंकि ये प्रकृति भी भली-भांत...

डायरी: गाँव से दूर होते गाँव.

इसबार चौक से घर की ओर जाने वाली सड़क चौड़ी हो गई थी, पत्थर बिछा दिए गए थे, बस पिचिंग बाकी थी... यादों का एक और हिस्सा दूर जा रहा था। गाँव हर बार, हर छुट्टी में, कुछ नयापन लिए होता है। इसमें कुछ अनूठा नही है, मगर यादों का परत दर परत धुंधलाना द्वंद्वों को जन्म देता है। ये बदलाव स्वयं भी तो द्वंद्वों से खाली नही हैं।  जिस सड़क के बनने में मैं अपने जाते हुए यादों को देख रहा था, वही गाँव के सैकड़ो लोगों के लिए राहत लिए थी कि अब वो बरसात में भी अपनी गाड़ी लेकर निकल पाएँगे, फिसलन का डर नही होगा... दूसरी तरफ से आती हुई गाड़ी को देख सौ मीटर पहले ही नही रुक जाना होगा... मगर मेरा क्या! मैं तो देख पा रहा था, उस सोलिंग को जिसे मैं आज बाइस वर्षों से अधिक से देख रहा था, उसे जिसे इस गाँव के लोगों ने और कितने वर्षों पहले से देखा होगा... जिसके साथ गाँव की दो पीढ़ियाँ खप गई... दो नई पौध जवान हो गई...  पीढ़ियों के इस सफर में जाने कितना कुछ बदल गया... पैदल और बैलगाड़ी पर जाने वाली बारातें गाड़ियों के संख्या में सिमट कर रह गईं, साइकिल पर ससुराल से चमकता हुआ लौटकर आने वाला दूल्हा चमक-दमक में न जाने कहाँ खो गय...

नकारात्मक पोस्ट: कोरोना और बिहार, मुख्यमंत्री को पत्र!

आदरणीय नीतीश जी, नमस्कार, ये वक़्त कुशल-क्षेम का नही है, वक़्त तो पत्र लिखने का भी नही है। मगर पिछले तीन दिनों के कश्मकश के बाद अत्यंत क्षुब्धता और दुःख में आपको लिख रहा हूँ। कायदे से मुझे आपको ये पत्र  लिखना भी नही चाहिए था। बताइए, कितनी ही चीजें बीत गईं... मेरे पड़ोस में 'चमकी' हो या पटना का जलजमाव, हर बार मैं खुद को थामे रखा, इस नाउम्मीदी में कि कुछ नही बदलेगा, कि अब आपको फर्क नही पड़ता। मगर इस त्रासद समय में, आपको न लिखने के अपने बात पर मैं कायम नही रह सका। नीतीश जी, इस बार हम आपके भीतर के प्रशासक को लिख रहें, जो पिछले पांच-सात वर्षों में न जाने कहाँ खो गया... स्थिति भीषण है, हमारा राज्य एक त्रासदी के मुहाने पर खड़ा है... अगले सात दिनों में क्या कुछ हो जाए कुछ पता नही है। बातें न करने के इस वक़्त में बातें खोखली भी लगती हैं। खासकर तब जब पूरा देश एक चुनौती के सामने पूरी मजबूती से खड़ा है। धन्यवाद माननीय प्रधानमंत्री का कि उन्होंने उत्सवधर्मी इस देश में आपदा में भी खुश रहने का जज्बा भर दिया। मुख्यमंत्री जी, ऐसे वक्त में मनोवैज्ञानिक मजबूती भी काफी महत्वपूर्ण होता है, खास...

THE UNBECOMING OF (a) JUSTICE.

Ranjan Gogoi, J. [1] (as he was then), addressing a function had remarked in 2018, ‘independent judges and noisy journalists are democracy’s first line of defence.’ [2] Justice Gogoi, now attributed more for being the Judge of the Ayodhya dispute case [3] should be better known for the reason why he first came to the consciousness of the masses, the unprecedented Press-conference of four puisne judges of the then supreme court. [4] The incident which saw the legal fraternity clearly divided over the development. Justice Gogoi has travelled long distance since then and is again a part of the popular discourse four months after his retirement from the office of the Chief Justice of India—for being nominated to the upper house of the Parliament by the President of India. [5] Among the four judges in the presser, Gogoi, J. was the next in line to be the CJI, there were speculations thereafter that he might not see the office, which were not at all baseless, but owing to the maturity ...