मई 24, 2018. थ्योरी ऑफ कंट्राडिक्शन्स.
जब मैं बड़ा होऊंगा तब एक थ्योरी दूंगा, 'थ्योरी ऑफ कंट्राडिक्शन्स'। जीवन के द्वंद्वों की थ्योरी। बड़ा होऊंगा तब इसलिए क्योंकि मन का एक हिस्सा आज भी खुद को बड़ा मानने से इंकार कर देता है। हम सब के भीतर बचपन एक नियत प्रतिशत बचा रहना जरूरी है। जीवन को अगर किलो से तोल सकते तो मैं अपने आधे से अधिक हिस्से को बचपन वाले भाग में रखना पसंद करता। सब बताते हैं कि बचपन जीवन का सबसे बहुमूल्य समय होता है, अब हमें भी लगता है। जगजीत सिंह के कागज़ की कश्ती टाइप निश्छल बचपन। लेकिन द्वंद्व यहाँ भी हैं। जबतक हम बच्चे होते हैं, बड़े और स्वछंद होने की एक स्वाभाविक बेचैनी हमारे भीतर होती है। इनका होना भी जरूरी है। यही हमें इंसान बनाती हैं। यथास्थिति से अनावश्यक लगाव हमें जड़ बना देती है। आज बड़ों के जिस डाँट के लिए हम जानबूझ कर भी गलतियाँ कर दिया करते हैं, वही डाँट बचपन की सबसे बड़ी बला हुआ करती हैं। शायद उन्हीं के वजह से बच्चे अपने अभिभावकों को नफरत के हद तक नापसन्द करने लगते हैं।
हाल में एक फ़िल्म आई थी। मुक्काबाज। संयोग ऐसा बना कि टिकट कट जाने के बाद भी मैं उस फिल्म को नही देख सका। खैर वो जरूरी भी नही। उस फिल्म में सुनील जोगी की चर्चित कविता 'ये प्यार नही है खेल प्रिय, मुश्किल है अपना मेल प्रिय' को गाने के रूप में रखा गया था। जिन्होंने उस कविता को पहले सुना होगी वो जानते होंगे कि उसे कितने ही लोगों ने सुनने के अलावा अपने शब्दों में लिखा भी था। यथार्थ से इंसान जल्दी जुड़ता है। उस कविता के साथ यही था। वो दरअसल द्वंद्वों की कविता है। एक से उसका हज़ार हो जाना उसे कसौटियों पर कसता है। जितनी बार वो कविता आपको 'मुश्किल है अपना मेल प्रिय' बताती है, उतनी ही बार वो मेल के संभावना को पुख्ता करती है।
आप अगर उसके पंक्तियों पर गौर करें तो पाएंगे कि जीवन में प्रेम द्वंद्वों के बिना सम्भव नही। कबीर ने जब लिखा होगा 'प्रेम गली अति सांकड़ी, जा में दोऊ न समाए', तब निश्चित ही उनके ध्यान में जीवन के द्वंद्व रहे होंगे। We need voids for the hinges to fit into them. The hinges of a person fill the voids of the other. The contradiction actually completes them. जहाँ आप एक-दूसरों के कमियों को पूर्ण करने लगते हैं, आप एक हो जाते हैं। एक समान विचार वाले लोगों के लंबे समय तक साथ होने की संभावनाएं कम होती हैं। उनका अहम आड़े आने लगता है। जबकि भिन्न विचार एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। जहाँ सम्मान से अधिक स्वीकार्यता महत्वपूर्ण हो जाती है।
बचपन से ही साल में छह-छह परीक्षाएं देने की ऐसी आदत हमें लगी कि कालांतर में परीक्षाओं का डर ही खत्म हो गया। लेकिन फिर भी परीक्षा से पहले गंभीर दिखना होता है। आज एंट्रेंस एग्जाम था, इसलिए कल आपके उस डॉक्ट्रिन जवाब आज देने को बोले थे हम। आपने कहा था, 'असल दुख है, अखंड सिंगलत्व में साझेदार रहे अकेले निठल्ले दोस्त का प्रेम में पड़ जाना।' भैया! इससे पहले कि मैं अपना कुछ कहूँ, आज सुबह मिले एक ज्ञान के ताज़ा-ताज़ा डोज को उद्धृत करना चाहूंगा। घण्टों होने वाले फोन के बातचीत पर उनका कहना था कि जो हम कर रहे होते हैं उस दौरान, उसका पछतावा हमें नही होना चाहिए। वो अहसास अलग होता है। वो वक़्त अलग होता है।
मैंने जब नाइत्तेफाकी जाहिर की तो उन्होंने कह दिया कि तुम कभी प्रेम में नही पड़े हो, जिस दिन होगा उस दिन जानोगे। मेरे पास कहने को कुछ बचा नही था, सचमुच जहाँ पांचवी में पढ़ने वाले बच्चे भी साथ मरने-जीने की कसमें खा रहे हों। उस दौर में प्रेम में पड़े बिना प्रेम पर बात करने की अनुमति मुझे नही ही होनी चाहिए। ये अलग बात है कि परसों ही मैं खुद को प्रेम में पका हुआ बता रहा था। शायद इसलिए क्योंकि मेरे अनुभवों में अनन्त प्रेम है। प्रेम में पड़ने वाले मेरे मित्र मुझे अपनी बात बताने में सहज महसूस करते हैं, शायद इसलिए क्योंकि मैंने पिछले कुछ सालों में सुनने की एक आदत बनाई है। जीवन में दूसरों के अनुभव से सीखने के लिए कम है क्या?
मैंने जब नाइत्तेफाकी जाहिर की तो उन्होंने कह दिया कि तुम कभी प्रेम में नही पड़े हो, जिस दिन होगा उस दिन जानोगे। मेरे पास कहने को कुछ बचा नही था, सचमुच जहाँ पांचवी में पढ़ने वाले बच्चे भी साथ मरने-जीने की कसमें खा रहे हों। उस दौर में प्रेम में पड़े बिना प्रेम पर बात करने की अनुमति मुझे नही ही होनी चाहिए। ये अलग बात है कि परसों ही मैं खुद को प्रेम में पका हुआ बता रहा था। शायद इसलिए क्योंकि मेरे अनुभवों में अनन्त प्रेम है। प्रेम में पड़ने वाले मेरे मित्र मुझे अपनी बात बताने में सहज महसूस करते हैं, शायद इसलिए क्योंकि मैंने पिछले कुछ सालों में सुनने की एक आदत बनाई है। जीवन में दूसरों के अनुभव से सीखने के लिए कम है क्या?
हालांकि सिंग्लत्व के दौर में साथी रहे मित्रों के प्रेम में पड़ जाने का दर्द मैं न जान पाता अगर घर से दूर रहने न आया होता। घर पर प्राथमिकताएं अलग होती हैं। मगर साथ रहने वाला इकलौता मित्र घण्टों फोन पर लगा रहे और आप उसके साथ बूत की तरह सड़कों पर चलते रहें ये अहसास बस अनुभवजन्य ही हो सकता है। उनकी व्यस्तता के मध्य गर कोई समय बचता है तब भी उन 'घण्टों हुई बातों' पर ही बातें होती हैं, मंथन होता है। ये स्थिति पराकाष्ठा की होती है। प्रेम में चाहत का तत्व भी होता है। अक्सर यही तत्व बलवती होता है। ये इंसान को अधीर बना देता है। चाहत को रेंत की तरह मुट्ठी से फिसलने देने की हिम्मत कम लोगों में होती है। प्रेम और चाहत का अंतर उस मुट्ठी के खुले और बन्द होने भर का ही है।
जो मित्र हमें शास्वत प्रेम समझा रहें थें, मैं काश उनसे कह पाता कि उम्र का एक पायदान पार करने के बाद पीछे मुड़ने पर ये आपको आपका बचपना ही लगेगा। हर बार यही होता है। ये कागज़ की कश्ती वाले बचपन की तरह निश्छल होता है या नही, तय करना मुश्किल है। हाँ, ये तय है कि आज आप उसे अपना बचपना नही मानेंगे। मैं समझा भी नही सकता। उम्र बीत जाने दीजिए थोड़ा सा। तबतक नदी में नई धार आ गई होगी, शायद तब आप उसे पढ़ पाएं।
भैया! अखण्ड सिंग्लत्व के दौर के साथी रहे मित्र का प्रेम में पड़ जाना अलग अनुभव है, मैं उसे दुख नही कहूँगा। मुझे ऐसा कहने का कोई अधिकार भी नही इसलिए अलग अनुभव कह रहा। लेकिन ये अनुभव जीवन के द्वंद्व के नए आयाम से परिचय कराती है। इस आयाम के तूफान से गर हम कश्ती निकाल ले गए तब निश्चय ही उत्कर्ष को उन्मुख होंगे, तब निश्चय ही नए आयाम गढ़ेंगे...
Comments
Post a Comment