जून 2, 2018. यूपीएससी प्री: प्रिय मित्र!

कुछ यादें बस रह जाती हैं जेहन में। उम्र भर के लिए। उनका कोई मतलब नही होता। वो फिर भी विशेष होती हैं। आज सुबह मौसम बड़ा सुहावना था। बनारस में हालांकि इस मौसम की पहली बारिश हुई नही है अभी, मगर पूरब से आती उन हवाओं में अलग ही सोंधापन था। मानो घर पर हुई बारिश से होकर हम तक आ रही थी। मैं खो गया था, सोलह साल पुराने एक संस्मरण में...
साल 2002... बरसात के मौसम में ही कोई दिन रहा होगा। तब एलकेजी में पढ़ते थे हम, अगर ठीक-ठीक याद है तो। अधिकतर बाबा ही मुझे स्कूल छोड़ने जाया करते थे। उनका अपना स्कूल हमारे घर से तीन कोस की दूरी पर था। मेरा दूसरे रास्ते पर तीन किलोमीटर दूर। मुझे साथ ले जाने के कारण घूम के जाने से उनकी दूरी थोड़ी और बढ़ जाती थी। शाम को लौटते हुए भी वो मुझे साथ ही लेते आते थे। ऐसे ही उस दिन हम लौट रहे थे। अचानक जोर की बारिश आ गई। हम पास ही एक खपरैल घर देखकर रुक गए थे। तबतक पत्थर भी पड़ने लगे थे। मैं उन पत्थरों को चुनने की कोशिश में लग गया था। उन्हें चुनते हुए खपडों से होकर आने वाले बूंदों से भींगने भी लगा था। बचपने में बारिश के पत्थर चुनना भी अलग शगल होता है। हमेशा ऐसे मौके नही मिलते। खासकर जब बड़े आस-पास हों तो वो आपको एकदम भींगने नही देतें। बाबा भी मुझे रोकने लगे थें। उन्हें इसका मतलब पता था। तबियत तो खराब होती ही, अगले कुछ दिन स्कूल भी छूट जाते।
जहाँ हम खड़े थें, वो दरअसल घर के साथ-साथ मिल भी था। उसी परिवार का एक बच्चा मेरे क्लास में पढ़ता था। जबतक बारिश छूटती वो चाय ले आए थे बाबा के लिए। मेरे साथ पढ़ने वाले लड़के ने कागज का नाव बनाया था। मैंने उससे वो नाव ले लिया। उसी के नाव से सामने जमे पानी में हम खेलने लगे। कागज के नाव पर बच्चों का सर्वाधिकार होता है। वहाँ न उन्हें कोई टैक्स देना होता है, न सामने से आने वाले नाव की चिंता होती है। लेकिन विडंबना ये उनके उस नाव को पानी ही गला जाती है।
असल में अनेकों बार कोशिश करके भी मैं कागज की कश्ती बनाना नही सीख पाया। शायद नियति नही चाहती थी। क्योंकि मुझे याद है उसी साल कलाम साब भारत के राष्ट्रपति बने थे। सुबह आठ बजे आकाशवाणी से समाचार सुनते हुए बाबा ने मुझे इस बारे में बताया था। अगले दिन स्कूल से लौटते वक्त उन्होंने मुझ से नए राष्ट्रपति का पूरा नाम पूछ दिया। मैं साईकिल के पीछे बैठा अबुल... अबुल... कहता रह गया। एपीजे का पूरा मतलब नही याद था मुझे। उन्होंने थोड़ा डाँटा, 'कल ही तो बताया था, ऐसे पढ़िएगा?' फिर अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम दुबारा से बताया। एक वो दिन रहा होगा और एक आज का दिन... हम जितना क्लास में पढ़ते हैं, उतना ही राह चलते भी पढ़ते हैं। आज बाबा नही हैं फिर भी।
कल का दिन विशेष होने वाला है हम में से कई लोगों के लिए। यूँ तो यूपीएससी प्री हर साल ही होता है। लेकिन कल पहली बार हमारे बीच वाले भी उसमें बैठेंगे। वर्षों के संजोए सपनों से ये मिलन रोमांचित करने वाला होना चाहिए। इतने सालों से जाने कितने ही मौकों पर अपने सपनों में हमने उस लम्हें को जिया है। काश अभी मैं उन मित्रों से कह पाता कि कल वहाँ मैं भी उनके साथ होऊंगा, कि काश मैं उनसे कह पाता कि कल मैं भी उस परीक्षा में बैठ रहा होऊंगा।
मैं जरूर होता मित्र, गर मुझे ऐसा करने की इजाजत होती। लेकिन तुम्हे खुश होना चाहिए। ज़रा लौट के याद करना अपने बचपन को! तुमने कितने ही लम्हों को बेच नही दिया था क्या इस एक लम्हें के खातिर। तुमने अपने सपनों को कुर्बान नही कर दिया था क्या इस एक सपने के खातिर। ये बेवजह के आदर्शों को जो हम अपने साथ लिए घूम रहे हैं, वो सच में बेवजह हैं क्या? इन्हीं आदर्शों ने तो हमें बेहतर इंसान बनाया है। इन्हीं में तो हमारे रातों के सुकून की नींद बसती है। दिल पर हाथ रखकर कहना, भला इससे अधिक प्रेम तुमने किसी और से किया है क्या आजतक?
न हो तो कल तुम अपने बचपन को याद कर लेना। नाव बनाना न सीख पाने जैसी कई खोई हुई यादें मिल जाएंगी तुम्हें वहाँ। वो तुम इसलिए नही सीख पाए होगे क्योंकि तुम विशेष हो। तुम आज जहाँ खड़े हो, तुम्हे वहाँ तुम्हारे संघर्ष, परिश्रम, प्रेरणा, अध्यावसाय, बड़ों के प्रेम, दुआओं ने पहुंचाया है। जिसके साथ इतनी चीजें हो उसे पीछे मुड़ कर देखने की क्या जरूरत? फिर परीक्षाओं से तुम्हें कब से फर्क पड़ने लगा। तुम तो हँसकर परीक्षाओं से हमजोली करते आए हो।
मित्र, बचपन के दिनों में मेरे आसपास कुछ बेवकूफ बच्चे हुआ करते थे। कई बार वो एक अजीब सी हरकत करते हुए दिख जाते थे मुझे। वो अपने पलकों से कुछ बाल तोड़ते, किसी खास दिशा में मुड़ते और उन्हें फूँक मारकर उड़ा देते थे। इससे मुझे बड़ा कौतूहल होता था। एकबार मैंने उनमें से एक से इस बारे में पूछ दिया। उसने मुझे बताया कि ऐसा करने से वो जिनसे अपने मन की बात कहना चाहते हैं, वो बात उन तक पहुंच जाएगी। घर से दूर रहने वाले वो छोटे-छोटे बच्चे अपने माँ-पिता, परिवार से ऐसे ही जुड़ते थें। हॉस्टल में रहने वाले उन बच्चों के पास तब फोन का विकल्प सीमित था। आज उनके उस मासूम सी बेवकूफी से मुझे प्रेम हुआ जाता है। वो अजीब थें, लेकिन अलग थें।
दरअसल उनके निश्छल मन के भीतर का विश्वास गजब का था। उन्हें खुद पर विश्वास था, अपने ईश्वर पर विश्वास था, अपने माता-पिता पर विश्वास था। सबसे गजब तो जिस हवा को खुद पर विश्वास नही होता, उन्हें उस पर भी विश्वास था। जीवन ऐसा ही है मित्र... कल जब तुम जाना तो अपने मन में उन बच्चों सा ही विश्वास लेकर जाना। बेवकूफ हो जाना उन्हीं की तरह। यही हमारी पूंजी है। तुम विशेष हो कि तुमने जो चाहा था उसके कई पड़ावों को पार कर यहाँ तक पहुंचे हो। तुम्हारे साथ ही शुरू करने वाले कई लोग काफी पीछे रह गए। ये राह तुम्हारा है... तुमने चुना है, और बिल्कुल सही चुना है... तुम्हें तुम्हारे चुनाव के लिए शुभकामनाएं! तुम्हे तुम्हारे कल के लिए शुभकामनाएं!

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