नकारात्मक पोस्ट: कोरोना और बिहार, मुख्यमंत्री को पत्र!

आदरणीय नीतीश जी,
नमस्कार,
ये वक़्त कुशल-क्षेम का नही है, वक़्त तो पत्र लिखने का भी नही है। मगर पिछले तीन दिनों के कश्मकश के बाद अत्यंत क्षुब्धता और दुःख में आपको लिख रहा हूँ। कायदे से मुझे आपको ये पत्र  लिखना भी नही चाहिए था। बताइए, कितनी ही चीजें बीत गईं... मेरे पड़ोस में 'चमकी' हो या पटना का जलजमाव, हर बार मैं खुद को थामे रखा, इस नाउम्मीदी में कि कुछ नही बदलेगा, कि अब आपको फर्क नही पड़ता। मगर इस त्रासद समय में, आपको न लिखने के अपने बात पर मैं कायम नही रह सका।

नीतीश जी, इस बार हम आपके भीतर के प्रशासक को लिख रहें, जो पिछले पांच-सात वर्षों में न जाने कहाँ खो गया... स्थिति भीषण है, हमारा राज्य एक त्रासदी के मुहाने पर खड़ा है... अगले सात दिनों में क्या कुछ हो जाए कुछ पता नही है। बातें न करने के इस वक़्त में बातें खोखली भी लगती हैं। खासकर तब जब पूरा देश एक चुनौती के सामने पूरी मजबूती से खड़ा है। धन्यवाद माननीय प्रधानमंत्री का कि उन्होंने उत्सवधर्मी इस देश में आपदा में भी खुश रहने का जज्बा भर दिया।
मुख्यमंत्री जी, ऐसे वक्त में मनोवैज्ञानिक मजबूती भी काफी महत्वपूर्ण होता है, खासकर तब जब हमें पता है कि विज्ञान इस चुनौती के सामने अबतक असहाय है और इस कारण हमारे संसाधन भी कम पड़ रहे; और जब पूरा देश एकजुट हो इसके सामने खड़ा है, ऐसे में चीजों को प्रदेशों के दायरे में बांधकर देखना तुच्छता भी है।

मगर मुख्यमंत्री जी, हमारे हालात पूरे देश से अलग हैं। हम अभिशप्त हैं हर तीसरे महीने कुछ नया झेलने को... आपदाएँ आती हैं, जाती हैं... हम जस के तस रह जाते हैं। मगर इसबार अगर हम नही चेतेंगे तो जाने क्या होगा!

अच्छा लगा मुख्यमंत्री जी कि  आपने राहत पैकेज की घोषणा की, लोगों को मुफ्त अनाज और मुआवजा इस नाजुक वक़्त में महत्वपूर्ण कदम है। पैकेज शब्द वैसे भी आपको काफी पसंद है। लेकिन इस समय आप वो क्यों भूल गए जो सबसे महत्वपूर्ण है? क्यों स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई बात या घोषणा नही हुई?

संदिग्ध लोगों को अलग-थलग(क्वारंटाइन) करने की प्रक्रिया हर जगह चल रही है। हर प्रदेश में उनके लिए व्यवस्थाएं की गई हैं। लेकिन कितना हास्यास्पद है कि हम उनके लिए व्यवस्था स्कूलों में करवा रहें। आज अगर हमारे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कागजों पर न होकर जमीन पर होते तो कितना बेहतर होता न! ठीक है कि स्वास्थ्य केंद्र अगर होते तो वहाँ लोगों को रखने को लेकर दूसरी समस्या होती, मगर आज तो हमारे पास वो विकल्प तक नही है... और स्कूलों में अगर वो संदिग्ध रुकेंगे तो उनकी देखभाल कौन करेगा... हमारे शिक्षक? इतना सबकुछ तो करते हैं बेचारे, बदले में सबकी सुनते भी हैं... अब बिना व्यवस्था के संक्रमित होकर जान से भी जाएँ क्या? वहाँ बीमारों को भी न्यूनतम जरूरत की चीजें भी कैसे मुहैया होंगी?

मुख्यमंत्री जी, पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य सेवाओं का हाल आपसे छुपा नही है। ऊपर से आपने अपने टीम में जमूरे भर रखे हैं। उपमुख्यमंत्री सुबह-शाम पाकिस्तान का नाम न लें, तो उनको पानी नही पचता... इस हालात में भी वो पाकिस्तान से हमारी तुलना कर रहे हैं, जाने कितने समय से उनका सॉफ्टवेयर ही अपडेट नही हुआ है, दुबारा टीम में लेने से पहले पूछे नही थे क्या? या पटना के जलजमाव में बेशर्मी घर से बोरिया-बिस्तर लेकर सड़क पर खड़े होने के बावजूद बुद्धि नही खुली?

स्वास्थ्य मंत्री का ध्यान ज्यादातर ये सुनिश्चित करने में रहता है कि प्रशासन का हर छोटा-बड़ा अधिकारी उन्हें व उनके साथियों को पहचानता है कि नही। बेचारे व्यवस्था सुधारने का पूरा काम वो अकेले कर रहें, उसपर ये पुलिस वाले, बताइए, एक दरोगा उनके कार्यक्रम में उनके मंत्री की जांच कर रहा था। ठीक ही तो कह रहे थे वो, सस्पेंड कर देना चाहिए ऐसे लोगों को... मंत्री को नही पहचानते हैं, फिर काहे की नौकरी करते हैं?

आपको अपना भी एक बयान याद होगा, आप कह रहे थे कि बिहारी लोग यदि काम करना बंद कर दें तो दिल्ली रुक जाए। सुशील मोदी बार-बार ऐसी बात करते हैं। लीजिए, पूरी हो गई आपकी मुराद, रुक गई है दिल्ली! लेकिन जानते हैं, जिस बिहारी आईएएस-आईपीएस के नाम पर सब दम्भ भरते हैं उन्हें बहुत फर्क नही है अभी, लेकिन जिन मजदूरों के दम पर आप दिल्ली को बंद करने की बात कर रहे थे न, उनकी बुरी हालत हो गई है दिल्ली बन्द होने से। बम्बे के सड़को और रेलवे स्टेशन की भीड़ आपने देखी होगी? जिसके बाद रेलवे को ही बंद कर देना पड़ा... उस भीड़ में ज्यादातर लोग बिहार के होंगे, जो नही होंगे वो यूपी, बंगाल, झारखड के होंगे...

जो लौट आए हैं उनकी तो फिर भी खैर रहे, बद से बदतर स्थिति में अपनी मिट्टी तो नसीब हो जाएगी। जो बाहर रह गए उनकी सोचिए, दस बट्टे दस के कमरे में जहाँ छह-छह लोग रहते हैं उन मजदूरों-गरीबों की सोचिए, संक्रमण से बच भी गए तो खाए बिना मर जाएंगे। क्या सोचते हैं आप? शौक से स्टेशन की ओर भाग रहे थे वो... दुख हो रहा लिखते हुए, लेकिन उनको एक वक्त के रोटी तक का ठिकाना नही होता... कमाते हैं तब भी ये तय नही होता कि रिक्शा का रोज का किराया देने के बाद खाने भर का कुछ बचेगा की नही... शुक्र मनाइए कि गले से टपकते खून सने पसीने में भी वो अपने अंदर के बिहारी को जिंदा रखते हैं, एकबार पता भर चल जाए कि सामने वाला भी उनके देस का है, किराया तक लौटाने लगते हैं... मगर अब तो वो कमाई भी नही रही! बहुत लोग जिस पर सोते थे, शायद वो रिक्शा भी नही रहा!

त्रासद स्थिति है, घर वालों की सोचे या जो घर से दूर रह गए उनकी! इसलिए कहते हैं नीतीश जी, शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार में निवेश करना कभी कारगर होता है। भ्रष्टाचारियों का घर तो काम हो तब भी भर जाए, मगर तब कम से कम जान बचने की गारंटी तो होती है!

अब सोचिए कि ईश्वर न करें ऐसा हो, मगर जो संदिग्ध हैं उनमें से कुछ की भी रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, या उनसे संक्रमण फैलता है तो हमारी तैयारी क्या है? दो दिन पहले से मौतों को सिलसिला शुरू भी हो चुका। उसपर तुर्रा ये कि मरने वाले को जब दफनाने के लिए ले जाया गया तब रिपोर्ट आया कि वो पॉजिटिव था, दूसरे मामले में श्मशान में सैम्पल ही लिया गया। अलग-अलग इलाकों से लक्षणों पर आधारित मौतों की खबरें आ रही हैं, जाँच नही है तो पुष्टि नही है, लेकिन बस इस कारण से उन्हें अफवाह बताकर इनकार भी नही किया जा सकता।

अब पंचायत-प्रखंड स्तर पर अस्पताल नही हैं, होते भी तो ये उनके बस की बात नही है। जिलों के स्तर पर क्या हाल है ये हर साल एसकेएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल को खबरों में देखकर हम समझ जाते हैं। इतनी बड़ी आबादी के लिए बचें पटना के गिने-चुने अस्पताल, उनमें भी सुविधाओं का आलम जाहिर हैं। बात यहाँ तक है कि एस्पेसियलिटी फैसिलिटीज के बारे में पूरी जानकारी भी नही दी जा रही। स्वास्थ्यकर्मियों को जरूरी सामान भी नही मुहैया कराए गए हैं, न वो मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार हैं... इतने के बाद गरीबों के लिए समस्या ये कि वो वहाँ तक पहुँचे कैसे? पहुँच भी जाएं, तो जिस पीएमसीएच में स्वर्गीय वशिष्ठ नारायण सिंह तक की दुर्गति हो जाती है वहाँ उनकी कौन सुनेगा!

नीतीश जी, समस्या विकट है, स्वास्थ्यकर्मियों को पैकेज देने तक तो ठीक है मगर इलाज करने के लिए उन्हें संसाधन भी तो देने होंगे। देश मे और यहाँ संसाधन की जो कमी है उसमें अंतर है। पूरे देश मे जहां संसाधन पर्याप्त नही हैं खतरे के लिहाज से, वहीं हमारे यहां न्यूनतम संसाधन भी नही हैं।

अब अगर बचना है तो अभी से लगना होगा। और अगर इस महामारी से बच गए तो एक सीख लेकर सुधार करना होगा... वर्ना कुछ महीनों के अंतराल पर कमियों के ये रोना तो हमेशा रहेगा... मगर अफसोस कि बिहार बोर्ड की तरह यहाँ हमें चमत्कार भी नही बचाएगा। बिहार बोर्ड को उसके चमत्कार के लिए बधाई तो बनता ही है, दो साल के भीतर बिना किसी बदलाव या सुधार के परिणामों को 40 प्रतिशत से 81 प्रतिशत तक ले जाना सामान्य उपलब्धि तो है नही। उसमें भी परीक्षा के बाद जब सारे शिक्षक हड़ताल पर हों, उसके बावजूद एक महीने के भीतर परिणाम कोई और घोषित कर सकता है क्या? इस मामले में तो दूसरे राज्यों को सीखना चाहिए हमसे, टॉप 100 बच्चों को रिजल्ट से पहले ही बुलाकर इंटरव्यू कर लें, फिर पकड़ के दिखाए न कोई बिहार के किसी टॉपर को!

खैर, नीतीश जी आप बिहार के जनता के नब्ज को अच्छी तरह जानते हैं। आप ये बेहतर जानते हैं कि आप उनकी मजबूरी हैं, मगर इस मजबूरी का इतना फायदा मत उठाइए कि वो विवश हो जाए आपको उखाड़ फेंकने को। बेहतर हो कि आप अपने भीतर के पुराने प्रशासक को जगाइए, वर्ना भगवान तो मालिक हैं ही!
आपका,
अभिषेक.

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