धारा 497: माफ करिएगा साहब! लेकिन इस फैसले पर आपके आपत्ति को स्वीकार करने के लिए हमें चरित्रहीन होना होगा...

पिछले कुछ समय में देश के आम जनमानस में न्यायपालिका के फैसलों के प्रति रुचि बढ़ी है। अभिजात्य सी मान ली गई न्यायपालिका के प्रति ये जागरूकता सुखद है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले तीन मुख्य न्यायाधीशों को जाते हुए मैंने करीब से देखा है। कमोबेस सबने जाते-जाते कुछ ऐसे फैसले सुनाए जो ऐतिहासिक महत्व के थे। मगर न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा इस मामले में थोड़े अलग हैं। वो अपने आखिरी पाँच दिनों में 16 महत्वपूर्ण फैसले सुनाने वाले थे। इनमें आधार, प्रमोशन में आरक्षण, अदालती कारवाई के प्रसारण और एडल्ट्री से संबंधित मामले भी शामिल थे।

जस्टिस मिश्रा का कार्यकाल कई मामलों में ऐतिहासिक और विवादित रहा है। राजनीतिक कारणों से भी वो खासे चर्चित रहे हैं। इस लिहाज से ये तो तय था कि उनकी विदाई भी सामान्य नही होने वाली है। मसलन कल के दिए उनके फैसलों के विश्लेषण में देश अभी उलझा ही था कि आज दो और बड़े फैसले आ गए। विवाहोत्तर संबंधों(एडल्ट्री) के ऊपर आए कोर्ट के फैसले पर समाज के हर वर्ग ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मगर उनकी ये प्रतिक्रिया मुख्यतः हास्यास्पद है। इस मामले में कई कथित विशेषज्ञों के राय से मैं इत्तेफाक नही रखता।

जस्टिस मिश्रा के अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने एडल्ट्री से संबंधित भारतीय दंड संहिता के धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करते हुए इसे खारिज कर दिया है। अबतक इस मामले में किसी विवाहित महिला से उसके पति के सहमति के बगैर संबंध बनाने वाले पुरुष के लिए आपराधिक दंड का प्रावधान था। अदालत ने माना है कि ऐसे मामलों को क्रिमिनल के बजाय सिविल पक्ष से देखा जाना चाहिए। ये विवाह समाप्त करने का आधार भले हो सकते हैं, लेकिन ऐसे मामलों में आपराधिक करवाई नही होनी चाहिए।

ये फैसला खुद में कई आयामों को समेटे हुए है और हाल के वर्षों में न्यायपालिका द्वारा दिए सर्वश्रेष्ठ फैसलों में है। हमारा समाज पिछले कुछ दशकों से भयानक संक्रमण से गुज़र रहा है। ऐसा की हमारे मूल्य टूटते-टूटते अब खत्म होने के कगार पर हैं, उनके स्थान पर निराधार से पैमाने हमारे मूल्यों को गढ़ने लगी है। गाहे-बगाहे ये चिंता हमारे बातों में झलकती है। ऐसा नही है कि हम इसे लेकर गंभीर नही है। मगर हमारी व्यस्तताएं उन्हें हमारे प्राथमिकताओं का हिस्सा नही होने देतीं। मानवीय मूल्यों की कक्षाएं पहले दादी-नानी के लोरियों में हो जाया करती थीं, संयुक्त परिवार के टूटने से उन्हें अब अकादमिक कोर्स का हिस्सा होना पड़ रहा है। ये सच है कि प्रयास हर स्तर पर हो रहा है। लेकिन जो मार पड़ी है उसका असर हमारे सामाजिक संरचना के अलावा हमारे विचारों और चेतना पर भी हुआ है।

ये स्थापित तथ्य है कि भीतरी चोट का इलाज भी भीतर से ही सम्भव है। तेज रक्तश्राव को रोकने के लिए भी हमे अपने शरीर के प्रतिरोधक क्षमता की जरूरत होती है। अल्प-समझ के कारण कई लोग ऐसा मान रहे कि इस फैसले से हमारे सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएंगे,  मगर दरअसल ऐसा करके वो हमारे पूरे समाज को कटघरे में खड़ा कर रहे। वो पूरे समाज को चरित्रहीन होने का प्रमाणपत्र दे रहे हैं। एक सामान्य उदाहरण है कि हमारे आसपास कई ऐसे लोग होते हैं जो अक्सर ये कहते हुए पाए जाते हैं कि वो डरते तो अपने बाप से भी नही है। उनका अगला वाक्य होता है कि वो तो अपने पिता की इज्जत करते हैं वर्ना...!

असल में वो जो कहना चाहते हैं वो इस वर्ना के पीछे छुप जाता है। ऐसे लोग दरअसल अपने पिता की इज्जत भी सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि किसी न किसी रूप में अपने पिता के ऊपर उनकी निर्भरता होती है। जिस दिन ये बाध्यता खत्म होती है, वो अपने पिता से भी सचमुच नही डरते। फिर उन्हें आगे कुछ कहने की जरूरत नही होती है। हम जिन मूल्यों को महत्व देते हैं, हमारे आचरण उन्हीं मूल्यों से प्रभावित होते हैं। एक सामान्य व्यक्ति सिर्फ अपने पिता की ही इज्जत नही करता। बल्कि वो हर इंसान को उतना ही सम्मान देता है, चाहे वो उसका पिता हो या कोई और। यहीं से हमारा व्यक्तित्व परिभाषित होता है।

एक समाज और परिवार के रूप में हम अपने बच्चों को कैसे बड़ा करते हैं, वो महत्वपूर्ण है। हमारे रिश्ते सम्मान और विश्वास पर आधारित हैं। माता-पिता और गुरु के अलावा बड़ों का सम्मान करना हमें स्वाभाविक रूप से सिखाया जाता है। छोटो से प्रेम भी उस सम्मान का अंग होता है। बिना सम्मान दिए आप बदले में उसकी अपेक्षा नही कर सकते। हमारे मूल्य यही थें साहब! अब आज के  बच्चों को ऐसी छोटी बातें बताने का समय आपके पास कहाँ है?

माफ करिएगा मगर... व्यर्थ के व्यस्तताओं की आपकी मजबूरी हमारे संस्कृति को दोषी नही बना सकती। पति-पत्नी का सम्बंध भी उसी विश्वास के डोर पर आधारित है। जब मैं धर्म को आचरण का विषय बताता हूँ तो मेरा आशय हमारे दैनिक व्यवहार से होता है। हम वो समाज हैं जो पत्नी को अर्धांगिनी मानते हैं। हम वो संस्कृति हैं जो पुरुष को शिव तो स्त्री को शक्ति मानते हैं। बिना शिव के शक्ति स्वरूपा भी अधूरी हैं और बिना शक्ति के शिव का तो कोई अस्तित्व ही नही है। शिव और शक्ति दरअसल पृथक हो ही नही सकते हैं।

एक पल को न्यायिक पक्ष को छोड़ भी दे तो ऐसे मूल्यों वाला समाज विवाहोत्तर सम्बन्धों जैसे तुच्छ और पतित अवधारणाओं पर बात भी कैसे कर सकता है। शारीरिक संबंध वैवाहिक जीवन का सीमित पक्ष हैं। विवाह उस से कहीं ऊपर का बंधन है। आप अगर ये मानते हैं कि विवाहोत्तर सम्बन्धों के लिए दंड खत्म कर देने से समाज दूषित हो जाएगा तो आप भीषण भ्रम में जी रहे... आप अविश्वास में जी रहे। ये अविश्वास खुद पर है, आपके अपनों पर है। कोई अगर ऐसा करने को ठान ही ले तो कोई कानून उसे रोक नही सकता। सभ्य समाज कानून के लाठी से नही डरता। वो अपने आत्मा से डरता है। और जो पतित है वो किसी से नही डरता।

मैं आभारी हूँ माननीय उच्चतम न्यायालय का कि उन्होंने ऐसा साहसिक फैसला सुनाया। हमारा समाज अपने आदर्शों के कारण सनातन है, किसी औपनिवेशिक कानून के कारण नही। ये फैसला सच मे आने वाली पीढ़ियों के लिए न सिर्फ नज़ीर साबित होगा बल्कि हमारे समाज को और अधिक सभ्य बनाने में सहायक होगा!

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