बाजार के आयातित आदर्शों से तो...
क्योंकि राहुल द्रविड़ गंभीर और संवेदनशील थें, बस इसलिए आप विराट कोहली से वैसी ही अपेक्षा नही कर सकतें। हर कोई बराबर समझदार हो ऐसा जरूरी नही है। हर कोई आपके अनुसार ही सोचे जरूरी नही। हम सब अलग परिवेश व समाज से आते हैं। समाज की तो छोड़िए, एक ही परिवार के दो बच्चे कभी एक से नही हो पातें। ऐसा होना भी नही चाहिए, सब स्वतंत्र हैं, सबने जीवन को अपने तरीके से देखा है और इसलिए उनका अपना नजरिया है। हम अपने आसपास के किन अनुभवों को प्राथमिकता देते हैं वही हमारे व्यक्तित्व को निर्धारित करता है।
राहुल द्रविड़ या किसी अन्य क्रिकेटर का गंभीर व्यक्ति होना उनका व्यक्तिगत गुण था। हम जिस दौर में हैं वहाँ आपके व्यक्तित्व के मूल और गुण महत्व नही रखते। इसलिए द्रविड़ की गंभीरता महत्वपूर्ण नही है। यहाँ क्रिकेट के मैदान की उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, उसके बाद ही कुछ और। विराट कोहली जैसे हैं, उसे वो कभी छुपाते नही। वो नही हो सकते किसी अन्य की तरह। ये उनका जीवन है, उनका चुनाव है, दूसरों को अगर ये ठीक लगता है तो बढ़िया वर्ना वो भी अपना जीवन जीने को उतने ही स्वतंत्र हैं जितना कोई और व्यक्ति।
पिछले कुछ वर्षों में, खासकर शादी के पश्चात ऐसा भ्रम होने लगा था कि विराट अब पहले की तुलना में अधिक मैच्योर हो गए हैं, उम्र के साथ उन्होंने सफलता को पचाना सीख लिया है। मगर फिर गाहे-बगाहे अपने व्यवहार से वो जाहिर कर देते हैं कि व्यक्तित्व में आमूल-चूल परिवर्तन मुश्किल होता है। हालांकि ऐसा पहली बार नही है कि उन्होंने कुछ ऐसा कहा हो जिससे लोग आहत हो जाएं, फर्क बस इतना है कि इसबार लोगों ने इसे धड़ लिया है। हम 'सफलता विनम्र बनाती है, फलदायी वृक्ष झुक जाते हैं' जैसे सिद्धांतों में मानने वाले लोग हैं। लेकिन आप ये भूल जाते हैं कि विराट आज के भारत के आदर्श हैं। उन्हें आपके बीते जमाने के बातों से कोई फर्क नही पड़ता। यहाँ फर्क नही पड़ता कहना भी ठीक नही, पता नही उन्हें ये सब किसी ने बताया भी होगा कि नही। आखिर राजनीति की तरह क्रिकेट के लिए भी कोई न्यूनतम अहर्ता तो है नही। न व्यवहार के नजरिये से, न शिक्षा के नजरिये से।
फिर 'स्पोर्ट्स-एथिक्स' जैसा तो कुछ होता नही जो उन्हें क्लासरूम में बिठाकर सिखाया जाए। क्रिकेट को जेंटलमैन्स गेम कहा जाता है। लेकिन उसके जेंटलमैन की अवधारणा ही सिरे से त्रुटिपूर्ण है। आज का युवा अपने सोच में किस हद तक भ्रमित है वो आप विराट को देख के बखूबी समझ सकते हैं। उसे विराट में अगर कुछ सबसे बेहतर लगता है तो वो उनकी आक्रमकता है। मैदान पर आक्रमकता की सीमाएं होती है, विराट उनमें नही मानते, इसलिए अपने सीनियर से लेकर नवोदित खिलाड़ी तक से भिड़ जाते हैं। हमारा युवा भी वैसा ही है, गुस्से से भरा हुआ। फिर विराट कोई राजनेता तो हैं नही, जो आप उनसे सवाल पूछें। वो भी तब जब राजनेता भी सवाल पूछने वालों को ठीक नही समझते।
विराट दरअसल भविष्य के भारत के लिए केस स्टडी हैं।सौ साल बाद अगर मानव का अस्तित्व रहा तो झुण्ड के व्यवहार को समझने के लिए पीढियां गावस्कर, तेंदुलकर, विराट जैसी प्रक्रियाओं को समझेंगी। तेंदुलकर व्यवहार के मामले में इन तीनों में सबसे ठीक कहे जा सकतें। लेकिन उससे फर्क नही पड़ता। फर्क अगर पड़ना चाहिए तो इस बात से कि हम कैसे आदर्श गढ़ रहें। पीढ़ियों को सुनाने के लिए हमारे पास बचपन की कौन सी कहानियां होंगी।
क्रिकेट का भारत को योगदान ही क्या रहा है वैश्विक पटल पर! ये कोई फुटबॉल जैसा खेल भी नही जिसे दो सौ देश खेलते हों। अगर कुछ थोड़ा-बहुत योगदान होगा भी इतने वर्षों में तो मार्जिनल यूटिलिटी तो निश्चित ही नेगेटिव होगी। पीढ़ियों को खराब किया सो अलग। क्रिकेट अब पहले के तुलना में कहीं बढ़ गया है। हर दूसरे दिन कोई मैच होता है। टीवी, इंटरनेट से लेकर मोबाइल तक पचास साधन हैं। मैच का वक़्त अक्सर वही होता है जिस वक्त पर अक्सर बच्चें पहले दो किताबें पढ़ लिया करते थें!
मैं विराट को तनिक भी दोषी नही मानता। विराट तो पहाड़ से हो चुके उस सोच के तिनका भर हिस्सा भी नही हैं। हम उस दौर में रहते हैं जहाँ लोग खुद को एक राजनेता का भक्त कहते हुए नही सकुचाते थे। जहां लोग सामने वाले को बात-बात पर देशद्रोही घोषित कर देते हैं, देश छोड़ने जैसे सलाह दे देते हैं। जहाँ लोग अपने सांसों में जहर महज इसलिए खरीद लेते हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे न उड़ाने के निर्देश दिए थे। वो सोचते हैं कि निर्देश की अनदेखी कर उन्होंने धर्म-युद्ध जीत ली, जिन्हें ये भान ही नही है कि उन्होंने अपने जीवन से कुछ दिन कम कर लिए। ये अधिकतर वो लोग हैं जिन्हें धर्म का मतलब भी बाजार ने अपने फायदे के अनुसार ही समझाया है।
एक दायरे के बाहर बाजार का अस्तित्व ही लोगों के कीमत पर है। क्रिकेट उस बाजार का एक बड़ा हिस्सा है भारत में। ऐसा कि लोग उसे मजहब तक मान बैठते हैं। विराट कोहली उस बाजार के छोटे से प्रतिनिधि हैं। जिन्होंने खुद अपनी शादी इटली में की, जो हर साल आईपीएल में विदेशियों के साथ खेलते हैं, मगर विदेशी खिलाड़ियों को पसंद करने वालों को देश निकाला दे देते हैं। क्योंकि उनकी समझ उतनी ही है। हमें उसका सम्मान करना चाहिए। हम उन्हें नही बदल सकते हैं। हमें अगर कुछ कर सकते हैं तो बस ये तय करना कि हमें अपने आदर्श कहाँ से गढ़ने हैं। उन्हें बाजार से आयात करने पर तो यही होगा...
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