बिहार की राजनीति बहुध्रुवीय नही हो सकती!
मुझे अगर देश का कोई चुनाव न देख पाने का मलाल होगा तो वो 2004 का लोकसभा चुनाव होंगे। 2009 में मैं ग्यारह वर्ष का रहा होऊंगा, तबतक इन बातों की थोड़ी समझ बनने लगी थी। सन् चार के चुनाव परिणामो के बाद की एक रात मुझे याद है, बाबा आए और टीवी चलाने को कहने लगें, 'टीवी खोलो! सोनिया गांधी ने पीएम बनने से मना कर दिया है।' सोनिया गांधी टीवी पर आ रही थीं। मैं बहुत कुछ नही समझ पा रहा था, फिर भी... मनमोहन सिंह उस रात के सितारा थे...
अटल जी के राजनीति का वो आखिरी पड़ाव था और इसलिए जिन आदर्शों की बात हम सुनते रहते हैं, उन्हें न देख पाने का मलाल तो होगा। खैर, बात 2009 की, बिहार में यूपीए और एनडीए का एक स्पष्ट सा विभाजन था तब। आज की तरह कि कौन किस खेमे में होगा, जैसी कोई अनिश्चितता नही थी। बिहार में नीतीश कुमार के एनडीए की सरकार थी। यूपीए में कांग्रेस, राजद और रामविलास पासवान की लोजपा हुआ करती थी। कांग्रेस सबसे जूनियर पार्टनर थी।
रामविलास पासवान तब भी मौसम वैज्ञानिक थें, और आज के उपेंद्र कुशवाहा की तरह उनके मन मे भी मुख्यमंत्री होने की हसरत थी, आंकड़ों ने कभी मौका नही पड़ने दिया वर्ना... लोकसभा चुनावों से ठीक पहले लालू यादव के राजद और लोजपा ने कांग्रेस के लिए तीन सीट छोड़कर 40 में से 37 सीट बांट लिए, इस चेतावनी के साथ कि अगर कांग्रेस नही माने तो हम ये भी ले लेंगे। रेल मंत्री होते हुए भी ये समय लालू के राजनैतिक ह्रास का था। कांग्रेस ने लाख गठबंधन की दुहाई दी, लेकिन ये तीन से अधिक सीट देने को तैयार नही हुए और कांग्रेस ने गठबंधन तोड़ लिया।
रामविलास पासवान तब धर्मनिरपेक्षता के बड़े चेहरे के रूप में जाने जाते थे और हर जगह कहते चलते थे कि सत्ता की कुंजी उनके पास ही है। इस एक बात को उन्होंने पूरे वक़्त दुहराया था। जाहिर है उन्हें अपने राजनैतिक कौशल पर भरोसा था। इसके साथ ही वो दोनों पक्षों को चुनाव के बाद अपनी अहमियत बताना चाहते थे। वो गठबंधनों का दौर था आखिर!
विडम्बना देखिए कि मौसम वैज्ञानिक और भारतीय राजनीति के धुरंधर लालू जनता को भांपने में चूक गए थे तब। एनडीए में जदयू और भाजपा 25-15 के फार्मूले पर लड़े थे। राजद-लोजपा गठबंधन में लोजपा 12 सीटों पर लड़ी थी और शेष पर राजद। यूपीए का पांच साल का कार्यकाल बहुत बढ़िया नही रहा था, इस कारण भी ये दोनों कांग्रेस से अलग होना चाहते थे। कांग्रेस अकेली थी, तो जाहिर है बिहार में औपचारिकता के लिए ही लड़ रही थी। पूरे देश के राजनैतिक विद्वानों को उम्मीद थी कि भाजपा नीत एनडीए जीतेगी और आडवाणी प्रधानमंत्री होंगे।
ऐसा नही हुआ। आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस वापस आई। लेकिन बिहार के परिणाम अलग थें। एनडीए 40 में से 32 सीट जीती थी, जदयू 20 और भाजपा 12, राजद को 4 सीट मिले, लालू यादव खुद अपनी एक सीट हार गए थे। कांग्रेस को फिर भी दो सीट मिल गए, लेकिन रामविलास पासवान सहित पूरी लोजपा हार गई थी। फिर उनके 'सत्ता के कुंजी' वाले जुमले पर खूब बात भी हुई।
बहरहाल, बिहार में जदयू और भाजपा अलग हो गए। 2014 में पूरे देश मे नरेंद्र मोदी की लहर थी। राजद और लोजपा वापस यूपीए में थें। लेकिन मौसम को भांपते हुए पासवान एनडीए में आ गए। नीतीश कुमार को वो अबतक नरेंद्र मोदी के नाम पर घेरते आए थे। जदयू के भाजपा से अलग होने का एक कारण यह भी था। लेकिन पाला बदलने के साथ ही उन्होंने मोदी जी को क्लीन-चीट दे दी। 'जब न्यायालय ने फैसला दे दिया तो हम कौन होते हैं बोलने वाले...'
उपेंद्र कुशवाहा ने तब जदयू से अलग होकर अरुण कुमार के साथ रालोसपा बनाई थी और खुद को कुशवाहा समुदाय का नेता मान रहे थे। यहाँ नीतीश कुमार के बारे में एक बात बतानी जरूरी हो जाती है, उन्होंने बिहार में जाति की राजनीति भले की हो, लेकिन कभी खुद को किसी जाति के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट नही किया। खैर, रालोसपा भी तब भाजपा के साथ हो गई। भाजपा ने उन्हें तीन सीट दिया। लोजपा, जिसका कोई सांसद नही था, उसे सात सीट मिलें।
अब राजग में तीन दल थे। यूपीए में राजद और कांग्रेस, और नीतीश कुमार की जदयू अकेले लड़ रही थी। परिणाम आएं। भाजपा 30 में 22 सीट जीती थी। उसकी सहयोगी लोजपा 6 और रालोसपा 3। लालू की पार्टी 4 और नीतीश कुमार 2 पर सिमट गए थे।
2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश राजद और कांग्रेस से मिलकर लड़ें और भाजपा के साथ दो पुराने सहयोगियों के अलावा जीतन राम मांझी थे। महागठबंधन ने इन चुनावों को स्वीप किया। भाजपा के तीनों सहयोगी मिलकर पांच विधायक जीता पाए थे।
आज की परिस्थिति में थोड़ा और बदलाव है। नीतीश फिर भाजपा के साथ हैं, राजद, कांग्रेस के साथ और बाकियों में असमंजस की स्थिति है। बिहार में वोटों का ध्रुवीकरण भले होता है। लेकिन बिहार में राजनीति के कई पोल्स नही हो सकते। छोटे दलों का प्रभाव सीमित है और वो अपने भरोसे नही जीत सकते। आज के स्थिति में वो किसी को जीता सकते हैं, इसका भरोसा भी नही है। इस बात को रामविलास पासवान बखूबी जानते हैं। उन्हें 2009 याद भी होगा। इसलिए वो एकाध सीटों के नुकसान के साथ भी एनडीए में ही रहना चाहेंगे।
उपेंद्र कुशवाहा को चुनाव के बाद केंद्र में मंत्री बनाया गया था। अच्छे महकमे भी मिले। उनकी शैक्षणिक योग्यता भी अच्छी है। मगर विधान सभा चुनावों में वो कन्वर्ट नही कर सकें। अगर चौदह के लहर वाली बात को ध्यान में रखें तो जाहिर है कि पंद्रह के विधान सभा चुनाव उनके लिए पहली परीक्षा की तरह थे। उसमे उनकी पार्टी बस दो सीट जीत सकी। आज वो दोनों जदयू में शामिल होने को हैं। जो कुशवाहा अस्मिता का दांव उन्होंने खेला था, वो भी सफल होता नही दिख रहा। फिर उस वोट बैंक पर दावेदारी करने वाले भी कई लोग हैं। और सबसे महत्वपूर्ण ये कि हर वर्ग में जाति के नाम पर वोट करने वाले लोग सीमित ही होते हैं।
उनके तीन सांसदों में प्रमुख और पार्टी के नम्बर दो अरुण कुमार पहले ही अलग हो चुके और एनडीए में हैं। बचे दो, तो एक वो खुद हैं और एक उनके रिश्तेदार। पार्टी के उपाध्यक्ष भगवान कुशवाहा पहले ही कह चुके कि वो एनडीए में ही रहेंगे। ऐसे में अगर वो दोनों पक्षों से बार्गेन कर पा रहे हैं, ये उन्हीं की राजनैतिक सूझ है!
वैसे केंद्र में साथ रहते हुए वो लगातार भाजपा को ब्लैकमेल करते रहे हैं। लेकिन इसबार भाजपा के चाणक्य ने शायद बिहार के राजनीति के दांव को थोड़ा समझा है। नीतीश कुमार ने फील्डिंग भी सेट की है। दोनों ने मिलकर बराबर सीटों पर लड़ने की घोषणा भी कर दी। जो लोग 17-17 का अनुमान लगा रहे वो गलत हो सकते हैं। भाजपा और जदयू अभी इंतजार करेंगे। क्योंकि बाकी सहयोगियों के अलावा अरुण कुमार जैसों को भी सेट करना है। सबकुछ अंत तक कौन-कौन साथ होगा इसपर निर्भर करता है, इसलिए ये आंकड़ा 15-15 तक भी जा सकता है। लालू पहले ही नेपथ्य में हैं। परिवार का कलह भी है। फिलहाल तो केंद्र में नीतीश ही हैं। लालू वैसे ही उनके पेट में दांत नही कहा करते थे। मामला रोचक होने वाला है!
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