जाओ अवनी! सब छीन लेने वालों के पास अपने पीढ़ियों को देने को कुछ नही होगा।

हम सब एक होड़ का हिस्सा हैं, सबकुछ अपने हिस्से कर लेने के एक भयानक होड़ के। हम संस्थाओं और व्यवस्थाओं को खत्म करके विकसित होने के भ्रम में जीना चाहते हैं। पांचवी में जब मेरे टीचर ने मुझे 'मैरिज इज अ कॉन्ट्रैक्ट' पढ़ाया था तब मुझे भी वो परिभाषा बड़ी आकर्षक लगी थी, 'प्रोफेशनल' जो थी!

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास संबंधित लक्ष्यों में पहले नम्बर पर क्या है जानते हैं? पर्यावरण संबंधी कुछ होगा... जी नही, अपने सत्रह लक्ष्यों में संयुक्त राष्ट्र ने गरीबी उन्मूलन को पहले स्थान पर रखा है। विकास के इतने वर्षों, इतने होड़ और इतनी त्रासदियों के बाद ये लक्ष्य ज़रा हास्यास्पद सा लगता है, पर सच हैं।

हम छिनने की प्रकृति वाले जीव हैं। आज समाज नही लिखूंगा, क्योंकि हम बराबर धूर्त हैं। छिनने वालों का संघर्ष ऐसा ही होता है। वो छल जीते हैं। जीवन से भागने के लिए 'हैंग-आउट, लांग-ड्राइव, बीच, बार, पूल' जाने वाले लोग समाज नही बनाते। कभी कोशिश करिए अपने आसपास के लोगों से कटकर उनके व्यवहार को समझने की, हम जिस होड़ में हैं उसका हासिल क्या है? हम फुर्सत के दिनों को सोशल मीडिया पर 'एंजोयिंग द स्प्लेंडिड ब्यूटी ऑफ नेचर' जैसे स्टेटस से सजाते हैं। ये सच में हमारी त्रासदी है। मानव क्या नेचर से अलग है? फिर हमने अपने बीच से नेचर को कैसे छाँट दिया? जब छाँट ही दिया तो हमें जीने के लिए उनके शरण में जाने की जरूरत क्यों होती है? उनके पास जाकर भी हम उन्हें उनके हाल पर क्यों नही छोड़ देते! वहाँ भी हमने अपने 'स्टेटस' के लिए टावर लगा डाले। बाज़ार बनाकर सब बेच दिया। जंगल को 'फॉरेस्ट' और 'रिज़र्व' बना दिया। ये सब दिखता है। जो नही दिखता वो ये कि हम खुद भी बिक गए। हमने खुद को भी बेच दिया। हम सब भी किसी 'टाइगर-रिज़र्व' के टाइगर से हो गए, छल जीने वाले। नाकों पर मास्क लगाए दिल्ली को देखकर मुझे उम्मीद होती है, एक उम्मीद कि शायद अब हम चेत जाएं। पर हम तो आदी हैं, छल जीने के।

हमारी सिर्फ आबादी नही बढ़ी है, व्यस्तताएं भी बढ़ी हैं। फर्जी व्यस्तताएं, जिन्हें हम खुद न्योता देते हैं, दूसरों के हिस्से का छीन कर। हमारी प्रवृत्ति बदल चुकी है। सब जगह बस हम ही हम हो जाना चाहते हैं। समाज में, रिश्तों में, दुनिया में, हर जगह। जहाँ दूसरे किसी के लिए कोई जगह न हो। यहाँ मेरे कमरे में हमारे साथ तीन चूहे भी रहते हैं। नाले के रास्ते आकर, कमरे के कोने से होते हुए वो बाहर चले जाते हैं। हमने उनके घरों को खोद डाला, नाले बना डालें और जब वो हमारे घर में आते हैं तो हम उन्हें मार डालते हैं। क्यों?

क्योंकि हमें सबसे शक्तिशाली होने का भ्रम है। इसलिए हम मास्क लगाए घूम रहे! पेरिस कन्वेंशन के बाद हमने कार्बन उत्सर्जन कम किया। लेकिन ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा फिर भी बढ़ रही। पता है क्यों? क्योंकि प्रकृति अपने हिस्से में भी ग्रीन हाउस गैस बनाने लगी। सबसे शक्तिशाली होने का भ्रम त्याग दीजिए। हमें प्रकृति के चेतावनी को समझना चाहिए। वर्ना अभी तो सिर्फ नाक-मुंह और हाथ ही ढका है हमने। पाँच-सात वर्षों में शायद ये बातें करने के स्थिति में भी न रहें।

अवनी एक बाघिन थी। ये नाम हमने दिया था। उसे शायद इसका भान भी न रहा हो। जंगल, माफ करिएगा 'हमारे रिजर्व' में अपना जीवन जी रही पाँच साल की एक बाघिन। दो बच्चों की मां। हमने मार दिया उसे। क्योंकि हमारे हिस्से का जंगल जी रही थी वो। बाजार में बाधा थी वो। खैर, कल हम चिंता करेंगे कम होते जंगलों पर, पेड़ों पर, बाजार को जब जरूरत होगी। 'एक्टिविज़्म' भी कोई चीज होती है आखिर! लेकिन 'अवनियों' के मरने से हमें फर्क नही पड़ता। क्योंकि हम नही जानते कि उन्हें मारकर हम अपने हिस्से की मौत न्योत रहें!

पृथ्वी, आकाश, जल, पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी सबको खुद से बड़ा और मानव को सबसे छोटा मानने वाला समाज कहाँ पहुँच गया आखिर! मूल्यों को छोड़ दिया। खरीदे हुए मूल्यों को अपना कर इतने गौरवान्वित हुए कि सब खत्म करने के होड़ में खुद को खत्म करने के कगार पर पहुंच गए। पीढ़ियों की चिंता में हम इतने मशगूल हुए कि हमारे ही अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया। हर तरफ वही हालात हैं। सब बेच डालने के चक्कर में हमने प्राकृतिक व्यवस्था को खत्म कर दिया और सबसे आगे निकल जाने के होड़ में सामाजिक व्यवस्था को।

याद करिए कि आखिरी बार आप अपने आस-पास के लोगों के साथ कब बैठे थे। मैं मानता हूँ, उनमें से अधिकतर बात कर पाने, बैठने, समझने के स्थिति में नही हैं। लेकिन कारण हम ही हैं। हमने दूरियों को इतना बढ़ा दिया कि समाज जैसा कुछ अब बसता नही। गांवों का भी अब यही हाल है। शहर तो छोड़ ही दीजिए। पैंतीस फीसदी से अधिक भारत जहाँ रहता है, उन शहरों में तो सच में लोग बगल के दरवाजे में रहने वाले को भी नही जानते। वही अब हमारे परिवारों में भी होने लगा है। वहाँ भी छल जीने लगे हैं हम, पास बैठकर भी बातें नही करते। खुद में व्यस्त, दूसरों से छीने उपलब्धियों पर जश्न मनाते हैं। नकली खुशियों को जीते हैं।

कभी किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान लाई है आपने! वो खुशी अलग होती है। किसी चूहे को ही सही, जीने का मौका देकर देखिए। आज के पैमानों पर चूहे पर एहसान करने का भ्रम हो सकता है आपको! लेकिन असल में आप अपना जीना आसान कर रहे होते हैं। छोटे मौके दूसरों पर लुटाते चलिए, बड़े वाले खुद आपके झोले में गिरते चले जाएंगे। रिश्तें और लोग कमाएंगे आप सो अलग...

वर्ना स्थिति तो देख ही रहे हैं। आने वाली पीढियां अगर जीने को बचेंगी भी तो क्या जीएंगी! टुकड़ो में फैले लोग। मतलब भर के लिए एक दूसरों से बात करते लोग। अपने मूल्यों से कटे हुए लोग। मैरिज को कॉन्ट्रैक्ट मानते लोग। रिश्तों को बंधन मानते लोग। स्वार्थ के रिश्तों को गढ़ते हुए लोग। दूसरों पर कीचड़ उछालते लोग। अपने व्यवस्थाओं और संस्थाओं को खुद ही लूट चुके प्रोफेशनल लोग। फिर तलाक ही होंगे न... शादियाँ तो नही ही होंगी! जवाबदेही बराबर होगी लेकिन, जो पीढ़ी बीत रही उसकी भी, और जो कमान संभालने को हैं, उनकी भी!

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