आदरणीय नीतीश जी! फिर कभी आपको लिखने का मौका लगे न लगे...

आदरणीय नीतीश जी,
ये आपको लिखे आखिरी खतों में होगा। इसके बाद आपको लिखने का मौका न लगे शायद! कुशल-क्षेम पूछने से पहले मैं आपसे एक बात साझा करना चाहूंगा। अक्सर लोग मुझसे आपको लेकर आवश्यकता से अधिक आशावादी होने के संदर्भ में प्रश्न पूछते हैं। मैं उनको जवाब देने के लिए तेरह साल पीछे जाता हूँ। हम भारतीय याददाश्त के मामले में थोड़े कमजोर होते हैं, इसलिए जो आपको पिछले कुछ वर्षों के अनुसार तोलना चाहते हैं, वो तथ्यात्म भूल करते हैं। अमूमन मैं व्यक्ति-केंद्रित होकर बातें नही करता। लेकिन जिसने भी आपका दौर देखा है वो जानता है आप एक व्यक्ति भर नही हैं। फिर बालमन तो आदर्श गढ़ने के बहाने ढूंढता रहता है।

हमारे बालमन ने आपके शीर्ष को देखा था, और मैं उससे कभी बाहर नही आ पाया। बिहार ने बदलाव की जो बयार देखी थी, उसी प्रभाव के कारण ही 2013 में जब से आपने गठबंधन तोड़ा था, उसके बाद भी कई बार मैंने आपके वापस एनडीए में आने की बात की थी। आप अपने हर फैसले के पीछे बिहार के हित की बात करते हैं। ये एक चीज है आप में जो कभी नही बदली। ऐसा आप तब भी किया करते थे, आज भी करते हैं। लेकिन आज जब आप बिहार के हित की बात करते हैं तो वो भद्दा मजाक सा लगता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि आपने सुशासन का जो मॉडल बनाया था, उसमें भाजपा का योगदान कितना था ये तो मैं ठीक-ठीक नही बता सकता, लेकिन जब आप भाजपा से अलग हुए तो आपका जादू खत्म हो गया। फिर आप अपने राजनैतिक विरोधियों से जा मिले, तब आप सफल तो हुए, लेकिन अपने छवि को बट्टा लगा बैठे। आपसे अलग रहने के कारण बिहार भाजपा के चरित्र का भी हमें पता चला। उनके सबसे बड़े नेता का जो 'जादुई-ऑरा' बना हुआ था, वो जाता रहा और रोज बदलते बयान के कारण वो अप्रासंगिक से हो गए। आपने उन्हें छपास रोग से ग्रसित तक कह दिया, और वो आज भी आपके बयान को गलत साबित नही होने देते।

बहरहाल मेरा मानना है कि अपने पहले साढ़े सात साल के कार्यकाल में आपलोगों ने जो किया था उसपर सबसे अधिक आपका प्रभाव ही था। क्योंकि चार साल बाद जब वापस आप लौटकर उसी खेमे में आए तो आप वो जादू नही दुहरा पाए, बिहार भाजपा आज भी वही है फिर भी। क्योंकि आप वो नही रहें। चार साल के झटकों ने आपके तेज को छीन लिया। आपसे वो सब करवा लिया जो आप मर जाने पर भी न करने का दम भरा करते थे। परिणाम ये हुआ कि आप पद पर तो बने रहें, मगर प्रतिष्ठा खो बैठे। आप बिहार के हित की बात भले करते रहें, लेकिन अब लोगों ने आप पर विश्वास करना छोड़ दिया।

जो सुशासन आपकी यूएसपी हुआ करती थी, उसकी चमक भी कब की धुँधली पर चुकी है। आपके नए बनाए फाइव-स्टार म्यूजियम के अलावा वो कहीं नही दिखता। आपके राज्य के बड़े अस्पतालों में से एक दरभंगा मेडिकल कॉलेज के आईसीयू में चूहा बच्चे को काटकर मार डालता है, लेकिन आपके प्रशासन को फर्क नही पड़ता। कानून व्यवस्था का आलम ऐसा है कि अदालत तक मे भी हत्याएँ हो जाती हैं। आप इसके लिए तो नही ही जाने जाते थे!

बीते दिनों आप जिस तरह इंडिया टुडे के वरिष्ठ महिला एंकर से बात कर रहे थे वो आपका तरीका तो नही ही है। आप रविशंकर प्रसाद की तरह इंटरव्यू के दौरान पत्रकार को आंखों से भयाक्रांत करने के लिए तो नही ही जाने जाते हैं न! आप तो पत्रकारों से सहज होकर उनको अभिभावक की तरह संरक्षण देते हुए गंभीरता से बात करने वाले हुआ करते थे। कल वो एंकर बार-बार असहज लग रही थी लेकिन। आपके चेहरे पर गंभीरता की जगह झल्लाहट थी। आपकी मुस्कान भी बनावटी थी। आपके जवाबों में जो झल्लाहट थी वो आपके ढलान को बखूबी दिखा रही थी।

आप राजनैतिक रूप से खत्म हो चुके हैं। कम से कम वर्तमान को देखकर तो यही कहा जा सकता है। आपने इसकी पटकथा भी खुद लिखी है। आपके आसपास वालों ने आपके छवि से बचे-खुचे बूंदों को निकालने के लिए आपको प्रासंगिक बनाए रखा है, वर्ना आप कब के अप्रासंगिक हो चुके होते। आपके सबसे बड़े विरोधी पहले ही विस्थापन झेल रहे हैं। ऐसे में नए लोगों को खड़ा होते देख आप अपना शांत स्वभाव खो बैठे हैं। ये बात आपको और खोखला करती है कि उन्हें आपने ही राजनीति में मुकाम दिलाया है और वो आपके खिलाफ खड़े हैं! शराबबंदी पर आपकी जिद ताबूत में एक और कील ठोक देती है।

देश की राजनीति सच में नए दौर में हैं। ये अभूतपूर्व तो निश्चित है। कल दिल्ली के घटना में एक विधायक ने दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष को धक्का दे दिया। राजनीति में सार्वजनिक मारपीट सच मे नई विधा है। हालांकि धक्का खाने वाले सांसद भी दूध के धुले नही है। जगह-जगह गाने के बावजूद उन्होंने अपने कर्म को इतना हीन और सांसदी के दम्भ को इतना बड़ा समझ लिया कि एक शिक्षिका को गाने का आग्रह भर करने पर मंच से बेइज्जत कर बैठे थे। सवाल लेकिन है कि हम किस दौर में जा रहें? जो विधायक एक सांसद को सार्वजनिक तौर पर धक्का दे सकता है, वो आम लोगों के साथ क्या कर सकता है!

नीतीश जी, बिहार के राजनीति में आप बीते वर्षों में अभिभावक के भूमिका में भी रहे हैं। बिहार में ये नया दौर गढ़ने का श्रेय इसलिए आपको ही जाता है। आपने जो पौध बिहार को दी है उसके लिए हमेशा याद किए जाएंगे। वर्तमान में आपके दो सबसे बड़े विरोधी दो ध्रुव हैं। एक पढ़े-लिखे प्रोफेसर और वर्तमान में केंद्र में मंत्री हैं। तो दूसरे बमुश्किल हाई स्कूल पास। दोनों को आपने पहचान दिलाई और शायद दोनों ने राजनीति भी आपसे ही सीखी है। इसलिए आपके महीन विभाजनकारी राजनीति को आपसे कहीं बेहतर और खुलकर करते हैं। आपने बिहार को अंधकार और त्रासदी की ओर धकेल दिया। आपके जिद ने इसे तबाह कर दिया और नए पीढ़ी के नाम पर आपने स्वार्थ के लिए कुछ ऐसे बीज बोए जो आगे चलकर जाने क्या-क्या रंग दिखाएंगे। खुद तो गए ही, इससे बढ़िया तो आपने तेजप्रताप यादव को आगे बढ़ा दिया होता! कुछ नही तो कम से कम खड़ा आदमी तो है! खैर...
आपका,
अभिषेक

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