छठ सबको समेट लेने का पर्व है!

संगीत में रुचि रखने वाले लोग जानते हैं कि हमारे यहाँ हर ऋतु, हर महीने का अपना रस और श्रृंगार होता है। होली, चैती से लेकर कतिकी तक। इन महीनों में अश्विन और कार्तिक का अपना महत्व है। हमारे यहाँ कहते हैं, 'आसीन-कातीक जो नर सोवे, ताको देख विधाता रोवे'। आज भी जब घर से दूर, इस मौसम में मैं दिन में सो जाता हूँ तो उठने के बाद पश्चाताप का एक भाव जरूर होता है। असल में इतना सबकुछ करने और जीने को होता है हमारे पास इस दौरान कि दिन में सोकर हम अपनी ज़िंदगी कम कर रहे होते हैं।

पितृपक्ष के समाप्ति के बाद, पूरे अश्विन और कार्तिक इतने पर्व होते हैं कि आप उन्हें उंगली पर नही गिन सकते। नवरात्रि और दशहरा से शुरू हुए त्योहारों का सिलसिला कम से कम कार्तिक पूर्णिमा तक तो चलता ही है। छोटे-बड़े जिस भी धंधे में, लेकिन जो लोग बाजार से जुड़े होते हैं, उनके लिए ये दौर शादियों के सीजन से भी बढ़िया होता है। बाजार वाले इसे बखूबी समझते हैं, इसलिए 'लगन' की तैयारी वो महीनों पहले शुरू कर देते हैं। हमारे यहाँ इस सीजन को आम बोलचाल में 'लगन' ही बोलते हैं लोग। चाहे ट्रांसपोर्ट से जुड़ा कोई हो, उत्पादन से, या रिश्तों में डील करने वाले लोग; किसी के लिए ये वक़्त खाली बैठने का नही होता।

दशहरे के ठीक बाद शरद पूर्णिमा को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से मनाते हैं। मिथिला में उस दिन 'कोजागरा' होता है। आम लोगों के अलावा नवविवाहितों के लिए इसका विशेष महत्व है।  फिर धनतेरस, यम की दीवाली, दीवाली,भाई दूज और गोवर्धन पूजा।  एक बच्चे के नजरिये से तो मैंने इन पर्वों को आज़ादी के पर्व की तरह देखा है। दो लंबी छुट्टियां, लंबी सी शॉपिंग लिस्ट, खाने-पीने में इतनी विविधता, भक्तिमय, संगीतमय माहौल और बड़ों के प्यार का बोनस! जाने अभिभावकों के लिए ये वक़्त कैसा होता होगा! उन्हें सब देखना-जोड़ना भी तो होता है।

बाजार के लिहाज से धनतेरस का महत्व जाहिर है। पहले की तुलना में अब अधिक सटीक आंकड़े भी मिल जाते हैं। फिल्पकार्ट और अमेज़न ने इस दौरान जो रिकॉर्ड बनाए हैं, जाहिर है उनकी अनुपस्थिति में वो पैसा क्षेत्रीय बाजार को ही जाता था, जिससे सामान्य लोग जुड़े होते थे।

मूर्ति, माला बनाने वालों, फूलों, मिठाइयों का कारोबार करने वालों के लिए दीपावली महत्वपूर्ण हो ही जाती है। इस दौरान सम्पन्न घरों में लोग कई बार कपड़े भी खरीदते हैं, दशहरा, दीवाली से लेकर छठ तक। आम घरों में भी कम से कम एक बार कपड़े की खरीददारी तो होती ही है। सबके बाद आता है गोवर्धन पूजा, हमारे यहां इसे कलम-दवात भी कहते हैं। बचपन में ये दिन हमारे लिए खास होता था। ये साल के उन चंद दिनों में होता था, जब आपको बड़े पढ़ने के लिए नही कहते थे। इस दिन किताब-कलम न छूने का चलन था।

और आखिर में बारी होती थी नहाय-खाय से शुरू होकर चार दिनों तक चलने वाले छठ की। इस दौरान आस्था और श्रद्धा अपने चरम पर होती है। जिन्हें इस दौरान बस नाक तक सिंदूर दिखता है, उन्होंने इस पर्व को 'अंधे के हाथी' जैसे समझा है। बिहार, झारखंड के अलावा पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में मनाए जाने वाले इस त्योहार में पुरुष भी उतने ही सहभागी होते हैं। व्यवस्था से लेकर व्रत तक। लेकिन वो मातृत्व के सामने फीके पड़ जाते हैं। हफ़्तों पहले से संगीतमयी माहौल में अगर कुछ बजता है तो वो एक धुन में ढले 'छठी मैया की महिमा' ही होती है। दीनानाथ उसके सामने थोड़े फीके पड़ जाते हैं! छठ के बाद कार्तिक पूर्णिमा अलग-अलग हिस्सों में भिन्न नामों से मनाते हैं। बीच के आठ दिनों में हमारे यहाँ बहनें दूर देस गए भैया के याद में 'सामा-चकेवा' खेलती हैं। मिट्टी के बर्तनों के अलावा कुम्हारों के पास इस दौरान 'सामा' बनाने की जिम्मेवारी भी होती है। पूरे काम में निश्चित ही काफी वक्त का रोजगार भी मिलता होगा, क्योंकि आखिरी वक्त पर बाजार जाने के अपने आदत के कारण पिछले दो बार मुझे उनके घर जाकर सामा लेना पड़ा। तबतक वो भी अपने छठ में लग चुके होते हैं और उनके पास बमुश्किल ही कुछ बेचने को बचा होता है।

छठ दरअसल सबको समेटने का नाम है। इस दौरान सारे सौदे, बेचने वाले के शर्त पर होते हैं। एकबार आपने जो मान लिया उससे मुकरना भी ठीक नही होता। केले, मैदे, ईंख से लेकर गेहूँ तक, ये पर्व सबको समाहित करता है। समाज का सबसे निचला हिस्सा भी अपना छठ उतना ही मनाता है। गरीब से गरीब व्रती का आशीर्वाद समृद्ध लोग भी बेहिचक लेते हैं। असल मे ऐसी कोई भावना आनी ही नही चाहिए। घर पर यदि मैं व्रती के गरीब होने जैसी कोई बात करूँ तो डांट पड़ने की पूरी संभावना होगी। इस पर्व में श्रद्धा गजब की होती है। थोड़े ऊंच-नीच के लिए भी कई गुणा जुर्माना मान लेते हैं लोग। इसलिए आम व्यवहार में शुचिता के लिहाज से ये पर्व अच्छा शिक्षक हो सकता है।

पिछले दस-बारह सालों में ये पहली बार होगा जब मैं छठ के बाजार से दूर होऊंगा। बाबा मुझे छोटी उम्र से ही अपने साथ बाजार ले जाने लगें थें। बाजार ने मुझे समझाया था कि ये पर्व दरअसल उपेक्षितों का है। साठी के चावल से लेकर कद्दू तक और बोरी अरुआ सुथनी से लेकर अर्तक पात, पटुआ तक। हर वो चीज जो आम दिनों में बेकार मान लिया जाता है, छठ में सबसे अहम हो जाता है। अनाज उपजाने वाले किसान से लेकर गन्ना और सब्जी उपजाने वाले किसान तक के लिए ये उत्सव ही तो होता है। समाज का हर वर्ग बराबर का भागीदार होता है इसमें। बाँस के बर्तन के बिना छठ की कल्पना नही हो सकती। सुप, सुपली, डगरा, छैटी, टोकड़ी आदि बनाने वाला समुदाय बिहार में आज भी सबसे पिछड़ा है। लेकिन इस दौरान वो अपने शर्तों पर व्यापार करते हैं। मुंहमांगी कीमत पर सामान बेचते हैं। छठ इन्हीं कारणों से विशेष है। भेदभाव से दूर भाईचारे का, सबसे मिलने का, सबकी समृद्धि का, समर्पण का त्योहार है छठ।

ये पर्व दरअसल समाज और प्रकृति के हर हिस्से का महत्व बताता है। उनका सम्मान करना सिखाता है। अपमान की कीमत और सजा भी बताता है। ये पर्व असल में पीढ़ियों के बीच हमारे मूल्यों का वाहक है। हमारे समाज का शिक्षक है। 'लर्निंग व्हाइल डूइंग' के तरीके वाला!

कल से शुरू होने वाले छठ पर्व की आपको शुभकामनाएं!

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