बिहार के नसों में पलायन है: आपको आईएएस दिखते हैं, मजबूर नही!

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स गुजरात में कार्यरत बिहार-यूपी के आईएएस-आईपीएस का हवाला दे रही हैं। हालांकि इन सेवाओं का चयन अखिल भारतीय सेवा से होता है, मगर फिर भी इसमें पलायन का एक ट्रेंड है, जिसे पकड़ने की जरूरत है। बिहार एक शब्द से अधिक एक प्रक्रिया है। गुजरात में कुल 400 के करीब आईएएस-आईपीएस हैं। जिनमें 40 बिहार के हैं और 40 उत्तर प्रदेश के। लगभग बीस प्रतिशत अधिकारी इन दो राज्यों से आते हैं। मुझे इसपर कोई आश्चर्य नही है, खुशी भी नही, दुख भी नही, मैं भावशून्य हूँ।

गुजरात के मुख्य सचिव जे.एन. सिंह बिहार से हैं, डीजीपी शिवानंद झा बिहार से हैं, गृह सचिव ए.के. तिवारी यूपी के हैं, छह प्रधान सचिव, चार अतिरिक्त मुख्य सचिव और न जाने कितने ही कलेक्टर-एसपी-आईजी-एडीजी बिहार और उत्तर प्रदेश से हैं। सिर्फ गुजरात ही नही, आप किसी दूसरे राज्य या केंद्र सरकार के किसी भी मंत्रालय के आंकड़े उठाकर देखेंगे तो आपको यही हालात नजर आएंगे।

हाल ही में मेरा हैदराबाद जाना हुआ था। बिहार से और पूर्वी उत्तर प्रदेश के आधे हिस्से को मिला दें तो हैदराबाद के लिए सिर्फ एक दैनिक ट्रैन चलती है। दानापुर-सिकंदराबाद एक्सप्रेस में मेरा टिकट बनारस से था। संयोग से टिकट कन्फर्म नही हो सका था। एक बार ट्रैन में घुसते ही मेरा मन हुआ कि उत्तर जाऊं। एक स्लीपर बोगी जिसमें 72 लोगों की जगह होती है, उसमें कम से कम दो-ढाई सौ लोग थे। ये रोज का मामला है। उस ट्रैन में रोज इतनी ही भीड़ होती है। बैंगलोर जाने वाली संघमित्रा का भी यही हाल होता है। केंद्र सरकार भी ध्यान नही देती। वो जानते हैं कि एक-दो ट्रैन बढ़ा देने से भी समस्या जस की तस रह जाएगी।

जिन्हें बिहारी अधिकारी देखकर गुजरात मे हो रही हिंसा पर आश्चर्य हो रहा, उनके लिए ये समझ लेना जरूरी है कि गुजरात मे टेम्पो-रिक्शा चलाने वाले आधे से अधिक लोग भी बिहारी ही होंगे। छोटे दुकानों-ठेले वाले भी बिहारी ही होंगे। हर राज्य, शहर, देश में मामला यही होगा। मैं यूपी अलग से नही लिख रहा क्योंकि उन्हें भी बाहर बिहारी ही मान लिया जाता है। हर शहर में, हर कॉलेज में, चाहे वो छोटे हो या बड़े, सरकारी हो या निजी, आपको बिहारी छात्र मिल जाएंगे।

इनमें से कई ऐसे भी होंगे जो आलीशान बंगले से निकलकर महंगी गाड़ी में कॉलेज पहुंचते हैं, तो कई वो भी जिन्हें क्लास में ये भी सोचना होता है कि इस महीने कमरे का किराया कैसे देंगे और क्लास से निकलने के बाद रात के खाने की व्यवस्था कैसे होगी। इनमें वो भी होंगे जिन्हें ये पता नही होता कि उनके आराम के पीछे जो पैसे लगे हैं, वो उसके पिता ने किसी से ब्याज पर लेकर भेजा है और जब वो रात को पार्टी कर रहे होंगे, तब उनके पिता के दिमाग मे ये चल रहा होगा कि एकबार बच्चे की नौकरी लग जाए तब सारे कर्जे खत्म हों। फिर बिहार से बाहर हम कहीं अच्छे जगह चैन से रहें।

बिहार में बैठे उस पिता के सपने में भी बिहार के बाहर चैन की बात ही होती है। कभी सोचा है आपने ऐसा क्यों है? या आपकी जिम्मेवारी 'बिहारी के रूप में हम शर्मिंदा हैं' कह देने भर से खत्म हो जाती है। या 'एक की सजा पूरे समाज को नही मिलनी चाहिए' जैसे किसी प्रोग्रेसिव कथन से इस देश की जिम्मेवारी खत्म हो जाती है?

केरल की आपदा याद है आपको? हाँ वही जिसमें पूरा देश एक पांव पर आ गया था मदद के लिए। उस देश में बिहार के वो बच्चे भी थे जिन्होंने अपने पॉकेट खर्च से सौ रुपए भेज कर स्क्रीनशॉट लगाया था, वो मजदूर भी जो अपने हिस्से का देकर खुश हो रहे थे। लेकिन इस देश को शायद याद नही कि बिहार त्रासदी से गुजर रहा है। एक भीषण त्रासदी से, एक ऐसे संक्रमण से, जिसका कोई समाधान नही है शायद! जिसे पेटीएम से सौ रुपए भेजकर भी दूर नही कर सकते हम।

पलायन के फायदे भी हैं, आपको दुनिया के हर कोने में शीर्ष पर बैठे बिहारी दिख जाएंगे। पढ़े-लिखे से लेकर अनपढ़ और एक से एक होशियार से लेकर कुढ़मगज तक। उन सबमें एक बात समान होगी मगर। कभी गौर करिएगा उनके सपनों पर। उन सब में एक बात समान दिखेगी आपको, मजदूर से लेकर आईएएस तक सबका सपना यही होता है कि वो जहाँ हैं वहीं जमीन का एक छोटा टुकड़ा लेकर बस जाए।

धरती का मोह सबसे बड़ा होता है। अपनी धरती से कटना शायद ही कोई चाहता है। जब हम पलायन कर रहे होते हैं तो अपने पीछे गाँव-घर-समाज-परिवार सब छोड़कर आ रहे होते हैं। मैंने आपसे कहा था कि हमारे गाँव वीरान हो रहे। मैं ये लिखते हुए उन यादों में चला गया हूँ, जिसकी हम कभी कल्पना तक नही करते। मेरे पीछे मैं क्या छोड़कर आया हूँ इसकी समझ मुझे अभी आ रही। हम अपना जीवन अपनों से दूर होकर गुजार देते हैं।

जब मेरे छोटे भाई का ऑपेरशन होता है तब कोई मुझे बताता भी नही, महज इसलिए क्योंकि दूर बैठा मैं बेचैन न हो जाऊं। मेरे बाबा चले जाते हैं, लेकिन उस समय भी घर जाते हुए मुझे अपने भविष्य को दांव पर रखना होता है। ये सब कुछ इतना आम हो चला है मगर कि एक औसत बिहारी पलायन को सामान्य समझता है। जन्म के समय ही उसे पता होता है कि 15 साल बाद उसे कहीं और होना है। उससे दूर उसकी जिम्मेवारी कोई भाई-चाचा-दोस्त निभा रहे होते हैं। उसकी खुशियां उसके बिना ही बीत जाती हैं। हमारे गाँव के सूरज की कई शामें हमे देखे बिना ही ढल जाती हैं। कभी सोचा है आपने इतने के बाद भी बिहारी के न घर न लौटने के मानसिकता के ऊपर!

चार दशकों के पलायन ने इसे हमारे नसों में भर दिया है। इसके कारण बहुतेरे हैं। व्यक्तियों के रूप में हम चाहे जितने सफल हो गए हों, लेकिन एक समाज के रूप में हम मर चुके हैं। हम सड़ चुके हैं। आगे उम्मीद भी नही, क्योंकि दुर्गंध पूरी तरह हमें जकड़ चुकी है।

क्यों लौटे कोई बिहारी भला जब उसे पता है कि कल को लौटकर उसके बच्चों को फिर बाहर ही आना है शिक्षा के लिए, स्वास्थ्य के लिए, रोजगार के लिए। बीस साल बाद उसका बच्चा वापस फिर से बाहरी कहलाए उससे बेहतर है कि हम उसे आज ही यहीं का बना दें। उसे आज ही नया समाज दे दें। बीस साल बाद इनके भीड़ में वह भी इन्ही की भाषा बोलना सीख जाएगा।

क्योंकि बिहार में तो कुछ होने से रहा। नई राजनैतिक पौध पुराने वालों से भी जहरीली है। नफरत गहरे पैठ बना चुकी है। बिहार विशिष्ठ है क्योंकि वो भारत का विस्तृत स्वरूप है। ब्रेन-ड्रेन से लेकर संस्थाओं को खत्म करने तक, हमारा कोई सानी नही। सबसे हालिया उदाहरण नए बने मोतिहारी के यूनिवर्सिटी की है। नैतिक पतन का उदाहरण सेल्टर होम्स से निकलकर आ रही कहानियाँ हैं। इसलिए हमसे उम्मीद तो बेमानी ही है। हम खुद भी परिवर्तन की आस लगाए बैठे हैं, जो शायद ही कभी हो!

जहाँ तक बात गुजरात के घटना की है। वह भी हमारे नैतिक पतन का ही उदाहरण है। ऐसी घटनाओं का होना ही कई स्तरों पर एक साथ होने वाली विफलता का नतीजा है। उसके लिए हमें उसके कई आयामों को समझना होगा। उसके प्रतिक्रिया में जो हो रहा, वह भी हमारे समाज का ही चेहरा है। अपराधी झुग्गी में रह रहा कोई अनपढ़ हो तो भीड़ का न्याय यही होता है।

ये कहानी काफी लंबी है। इस पोस्ट जितनी ही। इतनी की अगर लिखने बैठ जाए कोई तो एक बैठक में एक पुस्तक पूरी हो जाए, बात शायद तब भी अधूरी रह जाए। उम्मीद फिर भी नही होगी मगर! नैतिकताओं की बात करते हुए कहाँ जा रहे हैं हम लेकिन! संवेदनशील तो दोनों ही नही हैं फिर भी, न बिहारी ही, न भारतीय ही!

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