आप किसे भगाना चाहते हैं साहब!

भारत विविधताओं वाला देश है। इसके तमाम प्रदेशों में दो प्रदेश ऐसे हैं जो मुझे भारत का विस्तृत स्वरूप लगते हैं। वो अपने आप में भारत के तमाम विविधताओं को समेटे हुए हैं। अक्सर मैं अपने बातों को कहते हुए अतिआदर्शवादी सा लगता हूँ। लेकिन ये दो प्रदेश ऐसे हैं जो हमारे आदर्शवाद के पैमाने पर फिट नही होते। जब आप प्रेम की भाषा बोलने वालों की सुनते हैं तब आपका कश्मीर झीलों और वादियों तक सीमित हो जाता है। सर्द-खूबसूरत पहाड़ों के बीच बसा गुलमोहर का स्वर्ग।

कश्मीर की हकीकत क्या है मगर? आज से नवरात्रि शुरू हो रही है। बिहार से बाहर बसे लोगों में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे सुबह तक ये एकदम याद नही था। दिल्ली में बसा कोई कश्मीरी जब शिवरात्रि के सुबह जगता होगा तो कैसा महसूस करता होगा? करीब तीन दशक पहले वहाँ जो हुआ था वो किसी से छुपा नही है। तब से अबतक झेलम में काफी पानी बह चुका। कश्मीरी पंडितों के मन मे हमारे लिए बड़ा सम्मान होता है, सहानुभूति होती है। मेरे मन में उनके लिए गुस्सा भी होता है मगर। कश्मीर से विस्थापित किए जाने के बावजूद उन्होंने हर क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं, चाहे शिक्षा हो, राजनीति, खेल या पत्रकारिता, हर क्षेत्र में वो शीर्ष पर बैठे दिख जाएंगे। बिल्कुल बिहारियों की तरह। जहाँ से उठकर वो आए हैं, उन्हें ऐसा करते देखकर खुशी भी होती है।

फिर भी उनके प्रति मेरे मन में स्वाभाविक गुस्सा होता है। क्योंकि सब जीतकर भी वो वक़्त से हारे हुए लोग हैं। बिल्कुल बिहारियों की तरह। वो चाह कर भी अब डल में शाम के वक़्त नौके में नही घूम सकते। राहुल पंडित की 'Our Moon has Blood Clots' उस दौर पर लिखी गई सर्वश्रेष्ठ किताबों में है। उन्होंने तब के घटनाओं का इतना मार्मिक चित्रण किया है कि कई बार पढ़ने वाला सिकुड़ कर आधा हो जाता है। सोचिए कि शिवरात्रि का दिन हो, आपके दादाजी घर से जरूरी सामान लेने निकलें और बाहर सड़कों पर बम चल रहे हों। दोपहर में ही सुनसान हो चले सड़क पर जब वो निकले होंगे तब घर वालों पर क्या बीत रही होगी। सोचिए आप घर में हैं, रात के दो बजे अचानक आपकी नींद खुलती है तो पता चलता है कि एक बड़ी बेकाबू भीड़ आपके घरों के तरफ आ रही है। आप डरकर पूरे परिवार के साथ एक कमरे में कैद हो जाएँ और सुबह होने का कोई भरोसा न हो!

कश्मीरी और बिहारी सभ्य समाज में बड़े सम्मान से देखे जाते हैं। उनके विषय में आम धारणा यही होती है कि ये पढ़े-लिखे, समझदार, मेहनतकश-ईमानदार लोग होंगे। फिर भी दोनों अपने सफलता के पीछे एक दर्द लिए घूमते हैं। अपने घर न जा पाने का दर्द। सोचिए 70 के दशक में पैदा हुए उस बच्चे का दर्द जो 1990 में बमुश्किल 20 साल का रहा होगा... जीवन के जद्दोजहद में लगा हुआ। आज वो किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर होगा। सोचिए कि उसकी आंखें बंद होती होंगी तो वो कहाँ होता होगा... श्रीनगर के लाल चौक के पास बने उस आंगन में जिसे 47 के पलायन के बाद उसके दादा जी ने बसाया था... अपने अखरोट के बागों में जहाँ वो टहलने चला जाया करता था... अब न वो बाग बचे हैं मगर... वो घर तो है लेकिन उसके आगे किसी और के नाम की तख्ती लटकी है... वो अपने घर के आंगनों में फिर से लौटना चाहता है... लेकिन नही लौट सकता... कितना त्रासद होता होगा ये! मैं कल्पना नही कर सकता...

कश्मीरी और बिहारी फिर एक से हैं, वक़्त से हारे हुए... वक़्त के मारे हुए... कारण भले अलग हों... दोनों हैं एक ही... जो कश्मीर में तीन साल में हुआ, वही बिहार में तीन दशक में। अब बिहार उस प्रक्रिया के आखिरी दशक में है। कल वहाँ के एक नेता कह रहे थे कि हम बिहार में गुजरातियों को नही रहने देंगे। आप किसे भगाना चाहते हैं साहब? उन चंद गुजरातियों से कहीं बड़े दुश्मन तो हमारे लिए आप हैं। आपको उन्हें भगाने का अधिकार किसने दे दिया? अव्वल तो इस मुगालते से निकल जाइए कि बिहार में मुट्ठी भर भी बाहरी लोग हैं। गर हैं भी तो वो हमारे हैं। आपको उनके नाम पर राजनीति करने का हक किसने दे दिया?

कश्मीर में जो हुआ था उसमें तब शासन-सत्ता में बैठे लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। अगर उन्होंने कुछ नही भी किया था तो भी उनका कुछ न करने ने ही सब होने की जमीन तैयार कर दी थी। बिहार के राजनेता भी बिहार के लिए वैसे ही हैं। कोई एक नाम नही... सब एक से बढ़कर एक नकारे हैं... विकास की बात तो अलग... वो अपने मंशा में भी बुरे हैं... उनमे कौन अधिक धूर्त हो सकता है, इसकी प्रतियोगिता है! सत्ता एकमात्र लक्ष्य है उनका, जनता को चाहे जो कीमत चुकानी पड़े इसकी। शराबबंदी को ही लीजिए, इतने अच्छे पहल को एक व्यक्ति के जिद ने बर्बाद कर दिया। लाखों परिवार तबाह हुए सो अलग, और बिहार में पिछले तीन सालों में न कुछ हुआ है-न कुछ है, शराबबंदी के सिवा।

ऐसे में जो आपका सवाल आता है कि इसका समाधान कहाँ है? लौटिए कश्मीर में शायद समाधान दिख जाए आपको! जो ये मानते हैं कि संस्थाओं में, अवसरों में समाधान हैं, उन्हें ये निश्चित ही पता होगा कि आजादी के बाद से ही भारत सरकार कश्मीर के लिए अलग ही व्यवस्था करती आई है। उनके कानून भी अलग हैं। क्या नही दिया गया... लेकिन परिणाम क्या हुए?

आप संस्थाओं में समाधान ढूंढ रहें तो वो तो मिलने से रहा। सब तो है ही हमारे पास। पटना में आईआईटी है, एम्स है, निफ्ट है, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी है। गया में आईआईएम है, भागलपुर में ट्रिपल आईटी। हर छोटे-बड़े शहर में इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज-यूनिवर्सिटी हैं। लेकिन परिणाम? कितने बाहरी वहाँ अपने मन से पढ़ने आते हैं? कितने विश्वविद्यालय हैं जो तीन साल की डिग्री पाँच साल से कम में दे देते हैं।

अभी दो महीने पहले आप मेडिकल टॉपर कल्पना के लिए खुश हो रहे थे। लेकिन टॉपर होने के लिए कल्पना को भी बिहार छोड़ना पड़ा था। आप जिन डीजीपी साहब और कलक्टर साहब का उदाहरण दिए नही थकते तो जान लीजिए कि वो ऐसा बिहार के कारण नही हैं। उन्हें भी ऐसा बनने के लिए दिल्ली के मुखर्जी नगर जैसे किसी जगह पर एड़ियाँ रगड़नी पड़ती है। ये संयोग है कि वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षक भी बिहारी होते हैं, पढ़ने वाले छात्र भी और उनके दफ्तर में काम करने वाला क्लर्क भी। वहाँ कुछ नही होता तो बस बिहार...

देखिए कि लड़-झगड़कर हम दो केंद्रीय विश्वविद्यालय भी ले आए। लेकिन क्या हुआ उनका? एक को अभी बेवजह 15 दिन बंद रखना पड़ा था। आए दिन वहाँ शिक्षक-छात्र हड़ताल पर रहते हैं। इस साल वहाँ एडमिशन भी नही हो रहा। तो संस्थाओं में तो समाधान नही ही है। उन्हें बर्बाद करने में हमारा कोई सानी भी नही है। आप दिखा दीजिए एक ऐसी संस्था जहाँ हमने अपना हुनर न दिखाया है तो मानें! स्वरोजगार भी समाधान नही। गर आप ऐसा करेंगे तो आपके आसपास के लोग ही आपके दीवार के पास की जमीन खोदने में लग जाएंगे। रही-सही कसर व्यवस्था पूरी कर देगी।

शेल्टर होम्स की कहानियों से हमने दिखा दिया है कि हम कितने पतित हो सकते हैं। आप हमें रक्षक बनाइए, हम भक्षक हो जाएंगे। आप हमें जिम्मेदारी दीजिए, हम उसे जनमानस के शोषण का औजार समझ लेंगे। इन परिस्थितियों में मुझे तो समाधान नही ही सूझ रहा है। हाँ, जिस रफ्तार से हमारे गांव वीरान हो रहें, धीरे-धीरे ही सही हमारा समाज एक भयानक अनिश्चय की ओर बढ़ रहा। आपके पास समाधान है क्या?

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