दुर्गा-पूजा: हम, हमारे त्योहार और हमारा छूट गया सा अंश!
'यहाँ दुर्गा-पूजा जैसा कुछ लग रहा है भाई?' बिल्कुल बच्चे की तरह भाव चेहरे पर लिए उसने मुझे जवाब दिया था जब मैंने उससे घर जाने के विषय में पूछा था। चूंकि दिल्ली यूनिवर्सिटी के लॉ फैकल्टी ने इस बार दशहरा के दिन के अलावा और कोई छुट्टी न देने का फैसला काफी पहले कर लिया था, इसलिए मेरा सवाल भी स्वाभाविक था। लेकिन मुझे पता था कि वो पहली बार घर से दूर आया है। अपने सौभाग्य से उसने स्नातक तक की पढ़ाई पटना से ही कर ली थी। पहली बार घर से बाहर होने के कारण ये अनुभव उसके लिए नया था। नए-नए बाहर आए लोगों का दर्द त्योहारों पर और बढ़ जाता है। हम जैसे अबतक आदी हो चले होते हैं इसके मगर, इसलिए उसका भाव हमें अधिक समझ आ रहा था।
बिहार में अमूमन लोग नवरात्रि और दशहरा को दुर्गा-पूजा ही बोलते हैं। अब करीब-करीब साढ़े पाँच वर्षों से घर से दूर रहते मेरे भीतर का बचपन खत्म हो चला है। अब त्योहारों को लेकर वो उत्साह भी नही होता। त्योहार के दिन भी आम दिनों की तरह ही बीत जाते हैं। लेकिन जो पहली बार घर से बाहर आया हो, जिसने पटना की, मुजफ्फरपुर की, जहानाबाद की दुर्गा-पूजा देखी है वो भला दिल्ली में कैसे रह पाएगा दुर्गा पूजा के दौरान। याद करिए बचपन के दिनों को, कैसे महीनों पहले से हम दिन गिनना शुरू कर देते थे। कलश-स्थापना के दिन से पंचमी तक के दिन तो खैर सबसे मुश्किल होते थे, क्योंकि तब छुट्टियों का इंतजार करना और मुश्किल हो जाता था। तब हमे पैसे भी कम मिलते थे, वैसे में अगर पहले से पाँच-पाँच रुपए भी बचा लिए तो मेले के लिए वो बोनस से हो जाते थे। परिवार के बच्चों में सबसे बड़ा होने के कारण मुझे थोड़े अधिक पैसे भी मिल जाते थे, तो जिम्मेवारी भी स्वाभाविक तौर पर आ जाती थी। कई बार अपने पसंद का कुछ न लेकर हम छोटे भाई-बहनों के पसन्द का खिलौना ले लेते थे। ये हमारे प्रेम के लिए बोनस होता था।
ये दस दिन हमारे यहाँ उत्सव और उल्लास का होता है। हर चौक सज जाता है। यहाँ स्पर्धा अपनी लकीर बड़ी करने की होती है। कौन कितना बेहतर आयोजन कर पाता है इसकी प्रतियोगिता शहरों में सहज दिखती है। हाँ, बेहतर आयोजन श्रद्धा का पैमाना नही होता मगर। हमने छोटी मूर्तियों और साधारण पंडालों में भी कहीं अधिक श्रद्धा देखी है। हालांकि पूरब में लोग जिस तरह उत्सव के साथ दुर्गा पूजा मनाते हैं उस पर इस बात के लिए जरूर बहस हो सकती है कि पूजा के आड़ में हुड़दंग जैसी चीजें भी कई जगह हो जाती हैं। लेकिन उसका कारण मुख्यतः हमारा स्वभाव है, जो परिलक्षित हो जाता है। वो हमारे समाज का ही रूप है। समाज मे अच्छाई और बुराई एक साथ ही निवास करती है। धर्म और त्योहारों के भी इसलिए सामाजिक और भावात्मक पक्ष होते हैं।
ये त्योहार अंत मे हम बुराई पर अच्छाई के जीत के प्रतीक के तौर पर मनाते हैं। बचपन मे हमने दादी की कहानियों में रोटी और चिमटे वाली कहानी भी सुन ही रखी थी। बड़े होने पर जिसे हमने प्रेमचन्द के 'ईदगाह' के नाम से जाना। हर बच्चा जिसने ये कहानी सुनी होती है, वो एकबार को मेले के लिए मिले सीमित पैसों से कुछ ऐसा लेना चाहता है जिससे उसकी माँ, दादी खुश हो जाएं। उससे भी अधिक इसमें वो भाव छुपा होता है जो उन्हें एक गंभीर इंसान बनाता है। जो ये सुनिश्चित करता है कि बड़े होने के साथ वो संवेदनशील भी होंगे। ये त्योहार हमे अपने परिवार, अपने अपनों के साथ जोड़ते हैं। आज के दौर में तो ये और भी जरूरी हैं, मशीनों से हो चले हम अपनो के लिए वक़्त ही कहाँ निकाल पाते हैं।
व्यस्तताओं ने हमारे परिवारों को बांट दिया है। बच्चे शहर में और दादी गाँव मे होती है अब। घरों के साथ दादा-दादी भी बंट गए हैं। अब हम उनके यहाँ या वो हमारे यहाँ मेहमानों की तरह आते-जाते हैं। हम छोटे परिवार पसंद करने लगे हैं। हम अधिक लोगों से डरने लगे हैं। हम सीमित होते जा रहे हैं। हमें जोड़ने वाले कारण खत्म होते जा रहे। त्योहारों के मेले में भी हम अपनो के साथ नही जाते। सोचिए कैसा होता होगा जब पूरा परिवार एक साथ मेला जाता होगा! एक-दुसरो को समझता होगा... अपने पसंद को एक पल के लिए दबाकर किसी और के लिए कुछ खरीद लेता होगा। बड़े परिवार तो अब टीवी में ही दिखते हैं मगर। हर जगह हालात ऐसे नही हैं, लेकिन अधिकतर हालात ऐसे ही हैं। जोड़ने के लिए दादी की कहानी भी नही है अब तो!
ये सब छोटी बातें हैं। ऐसी बातें जिनका कोई महत्व भी नही। लेकिन हमारा जो समाज है उसके अधिकतर लोग गरीब और मध्यम वर्ग के हैं। ये समाज आज भी अपने छोटी खुशियों को जिता है। ये छोटी खुशियां ही उसे साथ बैठने और रात को सुकून से सोने का कारण देती हैं। परिवार के एक सदस्य की उपलब्धि को सब खुश होकर लोगों को बताते हैं। मुझे ऐसा करते लोग बड़े अच्छे लगते हैं। वो दरअसल अपने रिश्तों को जीने का कारण ढूंढ लेते हैं।
जीवन मे व्यस्तताएं तो हैं ही। लेकिन ऐसी भी क्या व्यस्तता जो आपको अपने लिए ही समय न दे! फिर किस दिन के लिए ये सब कर रहे आप? कोई मतलब नही इन सबका अगर आप अपनों को ही उपलब्ध न हो पाएं। ये त्योहार हमें वो अवसर देते हैं। अपने मूल से जुड़े रहने के। अपने मूल से जुड़ा होना जरूरी है। अपने मिट्टी के लिए भावुक होना जरूरी है। हर उम्र में आपका बच्चा बने रहना भी जरूरी है। फिर अगली पीढ़ी के लिए मापदण्ड भी आपको ही बनाने हैं। कल को अपने बच्चे को स्वार्थी कहने का आपका कोई हक नही होगा, यदि आपने उसे आज परिवार, त्योहार और रिश्तों का महत्व नही समझाया। फिर क्या पता कि इसी बचपने में, मिट्टी के अपने मोह में आप अपने पलायन वाली समस्या का भी समाधान ढूंढ लें!
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खैर मैने तो बहाना ढूंढ लिया है। क्रिमिनल लॉ की क्लास में मैम ने इस हफ्ते क्लास न होने की बात कही तो मैंने बाकी के क्लासेज के व्यस्तताओं के बीच छुट्टी का स्कोप ढूंढ लिया। चले जाओ, चले जाओ कहने वाले चार दोस्त थे ही। टिकट का जुगाड़ भी हो ही गया। दुर्गा-पूजा घर पर बीते इससे बेहतर और क्या होगा!
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