अतीत के दम्भ में जीने वाला समाज ठहर जाता है, लेकिन अपने इतिहास को भूल जाने वाली कौमें मर जाती हैं!

कई बार दिन बड़े निराशा में बीतती हैं। मगर अक्सर ऐसे ही हताश दिनों से कुछ बहुत बढ़िया निकल आता है। सवाल था कि बिहार का समाधान क्या है? और बात जब बिहार की हो तो वो इतिहास तक न पहुंचे ऐसा सम्भव नही है। बिहार भारत है... बिहार भारत का दर्पण, द्योतक है इससे कोई असहमत नही ही सकता। कोई भी राज्य या समाज व्यक्ति के स्वभाव का विस्तार ही है। बिहार व्यक्ति भी है... भारत भी... संसार भी... बिहार दरअसल अद्वैत का जीवंत प्रतिमान है। नई पीढ़ी को लुभाने वाली एक शानदार रिसर्च मटेरियल है ये।

व्यक्तिगत तौर पर मैं आस्तिक व्यक्ति हूँ। जब मैं अपने ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ तो ये कामना करता हूँ कि वो मेरे आसपास सबको ऐसा वर्तमान दें कि उसे अपने बीते हुए कल को याद करने की फुर्सत न हो। जो वर्तमान के बजाय अतीत में जीते हैं वो खोखले हो जाते हैं। उनका स्वर्णिम अतीत ही उनके भीतर एक भीषण घुटन भर देता है। जब भी मेरा सामना ऐसे किसी व्यक्ति से होता है तो मुझे उसके लिए सहानुभूति होती हैं। ऐसे लोग भयानक दम्भ और पूर्वाग्रह के शिकार होते हैं। लेकिन उनका ये स्वभाव मुझे बिल्कुल बुरा नही लगता, क्योंकि मैं उनका दर्द समझता हूँ। अफसोस वो खुद इसे नही समझते। एक समाज के रूप में बिहार और पूरा भारतवर्ष वैसा ही व्यक्ति हो चला है। अतीत के दम्भ ने हमारे समाज के एक बड़े वर्ग को खोखला कर दिया है।

बिहार के लोग राजनैतिक रूप से प्रबुद्ध माने जाते हैं। सामान्यतः ये समझा जाता है कि वहाँ के बच्चे की भी राजनैतिक सूझ सामान्य लोगों से कहीं अधिक विकसित होती है। बिहार का दंश यहीं है। वहाँ बच्चे अपने बड़ों के चर्चाओं को सुनते हुए बड़े होते हैं। मगर हमें बचपन मे ऐसे किसी चर्चा के आसपास जाने से सख्त मनाही थी। हमें साफ-साफ कह दिया जाता था कि जहाँ बड़ें बैठकर बात कर रहे हों वहाँ नही जाना है।

बड़ों की ये बातें बड़ी हास्यास्पद होती हैं दरअसल। उन्हें पता होता है कि समाज का कौन व्यक्ति और राजनेता कितना भ्रष्ट है। लेकिन फिर बातचीत के अंत में उसे ही महान और मसीहा घोषित कर दिया जाता है। भ्रष्ट होने के उसके गुण और कला के कारण। राजनैतिक सूझ वाले ये लोग अपने भ्रष्ट, नकारे राजा को क्यों वोट करते हैं इसके लिए वो आसानी से तर्क देते दिख जाएंगे। हम इससे कैसे उबर सकते हैं इसकी बात नही होती है अपितु उनका ध्यान इस बात पर होता है कि कैसे बातचीत के इस प्रतियोगिता में अंत में सबसे समझदार उन्हें ही माना जाए।

क्या भारत की परंपरा यही थी? नही, बिहार के पास नंद वंश का उदाहरण है कि कैसे एक सामान्य आचार्य ने सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को उखाड़ दिया था। ऊपर जो बात मैंने कही है वो अधूरी है, अपने इतिहास के दम्भ में जीने वाला समाज ठहर जाता है, लेकिन अपने इतिहास को भूल जाने वाली कौमें मर जाती हैं। एक बड़े पश्चिमी दार्शनिक ने कहा है, 'सभ्यताओं की हत्या नही होती, वो आत्महत्या करती हैं।' हमारे समाज पर भी यही बात लागू होती है। अपने असली मूल्यों, परंपराओं, इतिहास, आदर्शों को हमने भुला दिया है और उसके बजाय जो हमपर थोपा गया है उसे सच मानकर जिए जा रहे हैं। हम भीषण भ्रम के शिकार हैं और हमारे भीतर ही वो लोग भी हैं जो चाहते हैं कि ये भ्रम कभी खत्म न हो। उनका हित उसी में है।

हम दिशाहीन समाज हो चले हैं जिसका नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों में चला गया है जो समाज के लिए बने ही नही हैं। नेतृत्व का कार्य मार्गदर्शन करना होता है। कभी आपने सोचा है कि हमारे कितने राजनेता इस पैमाने पर फिट हैं?

भारत की विडंबना ये है कि हम खुद को जितना खारिज कर सकें उतना ही अधिक प्रगतिशील मान लिए जाते हैं। अपने अस्तित्व को खारिज करते-करते ही हम इस आयाम पर पहुंचे हैं कि हमारे अस्तित्व पर ही संकट हो चला है। विविधता वाला हमारा भारत सोच के स्तर पर भी उतना ही विविध है, हमारे पास वो लोग हैं जो परंपरा के नाम पर किसी हद तक गुजर जाने को तैयार हैं तो वो लोग भी खूब हैं जो हमारे इतिहास, ज्ञान, परंपरा को पुरानी बातें मानकर उन्हें बेवजह खारिज करने में ही अपनी बुद्धिमता समझते हैं।

इन सबके बीच वैसे लोग काफी कम हैं जो हमें अतीत के साथ भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान को साधना सीखा दें। मेरा मानना है कि सामने वाले के कोर्ट में एक कदम आगे बढ़कर उसका सामना करना कहीं बेहतर होता है। इसलिए प्राचीन भारतीय ज्ञान को मैं कल्पना मानने को सहज तैयार हो जाता हूँ। उसके बाद भी वो बताएं, कोई सच बगैर कल्पना के बन सकती है क्या? हर आविष्कार के मूल में कल्पना होती है। आपके पूरे एस्ट्रोफिजिक्स में कल्पना एक महत्वपूर्ण आधार है। जरा सोचिए कि जब कल्पना मात्र के आधार पर लियोनार्डो-द-विंची को क्या-क्या नही मान लेते। आखिर हवाई-जहाज के आविष्कार में एक चित्र से अधिक उनका क्या योगदान था?

लेकिन समस्त भारतीय ज्ञान को आप कल्पना कहकर खारिज कर देते हैं। कभी सोचा है आपने कि हमारे ग्रंथों में आज के भौगोलिक स्थितियों का सटीक वर्णन कैसे मिल जाता है। ऐसे वक्त में जब यातायात का कोई साधन शायद ही रहा होगा हमारे पूर्वजों ने हजारों किलोमीटर पर स्थित चीजों की व्याख्यां की है। एक मिनट के लिए उन्हें अगर कल्पना भी मान लें तो ये तो मानेंगे कि बिना असाधारण ज्ञान, ध्यान और साधना के ऐसा करना संभव नही था। फिर कभी कोशिश की है आपने ये जानने की कि रामायण की लंका आज कहाँ है? पुराणों में जिन जगहों का जिक्र है, उसपर कभी काम करने की कोशिश की है क्या आपने कभी? बाकी जिन्हें भारत अलग-अलग राज्यों का समूह लगता है उन्होंने 'गंगे च जामुने चैव...' वाला नदियों को एकसार करता हुआ मंत्र सुना ही होगा, उन नदियों के नाम और स्थान भी जानते ही होंगे। जिनके लिए भारत सीमित भूभाग है, उन्होंने भी 'जम्बूद्वीपे, भारतखण्डे...' वाला मंत्र सुना ही होगा। फिर भी अगर आप गुजराती और बिहारी के भेद को मानते हैं, तो मानते रहिए!

बिहार, खासकर मिथिला क्षेत्र का भारतीय दर्शन परम्परा में योगदान भी आप जानते ही होंगे। बुद्ध और महावीर का नाम भी आपने सुना ही होगा। अब सब जानकर भी अंजान बनने की कोशिश आप कर रहें तो कोई कुछ कर तो सकता नही... लेकिन देखिए कहीं कोशिश करेंगे तो हो सकता है इनमें ही आपको समाधान दिख जाए!

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