शिक्षा और सुधार: बिहार के मुख्यमंत्री के नाम पाती।
आदरणीय मुख्यमंत्री जी,
सादर नमस्कार,
आपके रहते मैं ये नहीं लिख सकता कि बिहार ठीक नहीं है, क्योंकि आप खुद जोर देकर बार-बार ये कहते आए हैं कि बिहार में बहार है। हम आशा करते हैं कि आप वहां कुशल होंगे। तीन दिन पहले पीएम साहब के साथ आपकी तस्वीर देखी थी। आपकी मुस्कान देखकर हम भी बहुत खुश हुए थे।
मेरा पिछला खत आप तक शायद पहुंच नहीं पाया। उस खत में मैं ये नही लिख पाया था कि बिहार में बहार है। लेकिन मेरी ये लिखने की हिम्मत भी नही हुई थी कि बिहार में बहार नही है, कि बिहार में सबकुछ ठीक नहीं है !
कल इंटरमीडिएट के परिणामों के बाद जब शिक्षा मंत्री कह रहे थे कि ये नकल रोकने का परिणाम है तो वो परोक्ष रूप से पिछले सभी परिणामों और सभी छात्रों के योग्यता पर सवाल उठा रहें थे। मुख्यमंत्री जी ! जब सिस्टम ही सवाल उठाने लगे तो स्थिति क्या होगी, आप कल्पना कर सकते हैं। जिस परिणाम पर उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए, उसको सही ठहराने के लिए जो तर्क उन्होंने दिया उसकी हवा भी आज तब निकल गई जब एक बार फिर टॉपर्स कैमरे से बचने की कोशिश में लगे रहें। वहीं फर्स्ट डिवीज़न जितना नम्बर पाकर भी छात्र महज इसलिए फेल हो जा रहें कि वो इंग्लिश में अच्छे अंक नहीं ला सके। आपकी जो सरकार अंग्रेजी को दसवीं तक पढ़ने लायक विषय भी नही मानती, वही अंग्रेजी इंटर में एकदम से मजबूरी क्यों बन जाती है।
मुख्यमंत्री जी, मैं अर्थशास्त्र के 'ट्रिकल-डाउन इफ़ेक्ट' में विश्वास रखता हूँ। मैं उनमें से हूँ जो ये मानते हैं कि योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता ऊपर से नीचे की ओर होनी चाहिए। एक उदाहरण भी हैं ना वो रुपए और अस्सी पैसे वाला, वही राजीव गांधी वाला। नीचे हम चाहे जितनी सफाई कर लें, ऊपर बैठे लोग ही यदि ईमानदार नही होंगे तो भ्रष्ट होना नीचे वालों की मजबूरी हो जाएगी। फिर जितने हाथों से होकर वो पैसा लाभान्वित व्यक्ति तक पहुँचता है, उनको जोड़ लें तो सरचार्ज, सर्विस चार्ज और सेस के इस युग मे 15 पैसे भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेंगे, इसपर संदेह है ! ये सिद्धांत पैसे के अलावा राज्य के शिक्षा व्यवस्था पर भी उतना ही लागू होता है।
पिछले खत में मैंने शिक्षकों सम्बन्धी मुद्दे पर बात नहीं की थी। मुख्यमंत्री जी ! जिस देश मे सिपाही, गार्ड और क्लर्क तक को बहाल होने के लिए लिखित परीक्षा पास होना पड़ता है, तब जबकि उनके काम का उस विषय से कोई लेना देना नही होता। ऐसे में आप शिक्षकों की बहाली सिर्फ सर्टिफिकेट पर, वो भी बिना जांच करवाए करवा देते हैं। फिर जब वो शिक्षा देने के अलावा हर काम बहुत आसानी से कर लेते हैं और पढ़ाते वक़्त फिसड्डी साबित होते हैं तो सवाल उठना तो स्वाभाविक है।
ये सर्वविदित है कि बिहार में सरकारी संस्थानों में, चाहे प्राइमरी स्कूल हो या यूनिवर्सिटी, कहीं कक्षाएं और पढ़ाई नही होतीं। सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि बाकी जगहों में जहां अच्छे, योग्य, परिश्रमी शिक्षक सरकारी संस्थानों में होते हैं, वहीं अपने यहाँ ये कोचिंग और प्राइवेट स्कूलों में काम करने को मजबूर हैं।
मैं ऐसा नहीं कह रहा कि बच्चों की, अभिभावकों की, समाज की गलती नही है। लेकिन परिणाम ये जरूर कह रहें कि इन सबों से कहीं अधिक दोषी हमारी व्यवस्था है, जिसे पूरे शिद्दत से इस अंजाम तक पहुंचाया गया है। मैं ये भी नही कह रहा कि सत-प्रतिशत शिक्षक अयोग्य हैं। लेकिन परिणामों ने ये बता दिया है कि उनकी संख्या योग्य शिक्षकों की तुलना में कहीं अधिक है।
स्थिति इस से बुरी कभी नही हो सकती, अगर आधे बच्चों को न पढ़ने वाला भी मान लें, फिर भी 35% रिजल्ट को हम सही नहीं बता सकते। फिर पिछले साल के 46% से हमने क्या सीखा ?
आलम अभी नहीं तो कभी नही वाला है। फिर भी बिहार के लोग इन सब के इतने आदी हो चुके कि वो हताश हैं, उन्हें सुधार की उम्मीद नहीं है। लेकिन चन्द छोटे कदमों से आप सुधारों की शुरुआत कर सकते हैं। चाहे कितना ही अयोग्य शिक्षक क्यों न हो, होगा तो वो 20 साल से ऊपर का ही। 20 साल के व्यक्ति को दो महीने के ट्रेनिंग में इस लायक तो आराम से बनाया जा सकता है कि वो प्राइमरी के बच्चों को पढ़ा सके। इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी अब नहीं हैं। ऐसे ही ट्रेनिंग सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी लेवल पर भी अध्यापकों को दिए जा सकते हैं।
युनिवर्सिटी के क्लास भी थोड़े प्रयास से चलाए जा सकते हैं। शिक्षकों की कमी वहां भी बहुत नही है। अगर थोड़ा और ध्यान दिया जाए तो सेशन, एडमिशन, परीक्षा और रिजल्ट सब समय से होने लगेंगे। आखिर जो जुलाई में हो सकता है, अगर सख्ती से काम लिया जाए तो वो मई में क्यों नही हो सकता ?
संसाधन पर्याप्त हैं, उनकी कमी का रोना अब नहीं रो सकते। जरूरत बस इच्छाशक्ति की है। जरूरत है, उन्हीं संसाधनों में जरूरी परिवर्तन करके उनसे काम लेने की। ये जरूरी है; बिहार के भविष्य के लिए। बिहार के आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए ! वर्ना वो परीक्षा, फिर कंपार्टमेंटल और फिर पास न होने तक वार्षिक और कंपार्टमेंटल परीक्षा देते ही रहेंगे !
आशा करता हूँ आप वो इच्छाशक्ति दिखाएंगे। इसी आशा के साथ !
आपका,
अभिषेक।
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