बोर्ड रिजल्ट्स: अभिभावकों के नाम खुला खत।
नमस्ते,
आशा करते हैं आप कुशल होंगे। कल आपके बच्चे का रिजल्ट आया। क्षमा चाहूंगा कि मैं वक़्त पर बधाई नहीं दे सका। दरअसल मैं कल का रिजल्ट देख कर समझ नहीं पा रहा था कि बधाई दूँ भी या नहीं। आखिर रिजल्ट ही ऐसा आया है। फिर बाकी बोर्ड के रिजल्ट भी आने हैं, मैं ये भी सोच रहा था कि सब को एक बार ही बधाई दे दूंगा। लेकिन अब लगता है कि नहीं, बात होनी चाहिए, क्योंकि बात जरूरी है।
जो भी ये कहते हैं कि एक कागज का पन्ना मेरा आकलन नही कर सकता। वो या तो खुद को सांत्वना दे रहे होते हैं, या आपको बेवकूफ बना रहे होते हैं। हाँ एक तीसरी सम्भावना भी है कि वो खुद बड़े बेवकूफ होते होंगे। यकीनन 93% लाने वाला 73% वाले से कहीं बेहतर होता है। कम से कम उस विषय मे तो होता ही है, इससे आप कैसे इंकार कर सकते हैं? आखिर आसान तो है नही थर्मोडायनामिक्स का हर सवाल सही-सही हल कर लेना, कितने डिग्री पर रिएक्शन होने पर कम से कम एनर्जी लगेगी, बातों-बातों में ये तय कर लेने वाले के योग्यता को आप कैसे नकार सकते हैं ? मैं वो नही कर सकता। लेकिन मैं ये बात यदि समझ सकता हूँ तो कम ही सही, लेकिन ज़िन्दगी से मैंने भी कुछ तो सीखा ही है। मेरी भी तो कुछ योग्यता है।
पूरे देश मे 82% छात्र इस बार सीबीएसई बारवीं में सफल हुए हैं। दिल्ली-एनसीआर में ये आंकड़ा 86% है। लेकिन जैसे ही मैं अपने राज्य में पहुंचा, मैं हताश हो गया ! आपको पता है हमारे बिहार में मात्र साढ़े 74 फीसदी छात्र सफल हुए हैं। हालांकि मेरी निराशा इस वजह से नही थी। दरअसल मैं सोचने पर मजबूर तब हुआ जब मैंने देखा कि पटना जोन का ये रिजल्ट पिछली बार से 3 प्रतिशत कम है। कभी इस पर सोचने की चेष्टा की है क्या आपने ? बिहार का टॉपर पटना से न होकर गया के एक स्कूल से क्यों है, आपको फुर्सत मिली क्या इसपर सोचने की ? क्या आपने कभी ये सोचा कि एनसीआर वाले राष्ट्रीय औसत से 4 प्रतिशत ऊपर क्यों होते हैं हर बार ?
आपको पता है, मेरा शहर, सॉरी मैं गांव से आता हूँ, लेकिन जिस शहर का सबसे बड़ा हिस्सा मुझ में है, मुज़फ़्फ़रपुर, जो उत्तर-बिहार की अघोषित राजधानी है, जिसे बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर कहा जा सकता है, वहाँ सीबीएसई से एफिलिएटेड एक स्कूल भी नही है जहां आर्ट्स की पढ़ाई होती है। अब जब वहां ये हाल है तो बाकी शहरों का अंदाजा आप सहज लगा सकते हैं। पटना के चंद स्कूलों को छोड़ दें तो शायद ही मुझे लगता है कि आप बिहार में ह्यूमैनिटीज के लिए सीबीएसई स्कूल खोज पाएंगे।
दरअसल दसवीं में बेहतर करने वाले छात्र के पास विकल्प काफी कम बचते हैं। सत्तर प्रतिशत अभिभावक ये चाहते हैं कि उनका बेटा डॉक्टर, इंजीनियर बने। इससे कम उन्हें शायद ही कुछ बर्दाश्त होता है। फिर अगर बच्चा स्कूल से पढ़ना चाहता है तो उसके पास साइंस और कमर्स के अलावा कोई विकल्प नही होता। जिसे आर्ट्स लेना होता है वो बिहार बोर्ड में चला जाता है। अब वहां की स्थिति से तो आप वाकिफ हैं ही, प्रोडिकल साइंस पढ़ने वाला वहां टॉपर होता है। तो जो बच्चे बिहार बोर्ड में जाते हैं उन्हें पहले ही न पढ़ने वाला मान लिया जाता है। आप भी तो नही चाहते कि आपका बच्चा साइंस छोड़े ! लेकिन आप नहीं जानते, जब मैं इन मुद्दों पर लिखता हूं, बात करता हूँ तो कितने व्यथित बच्चे मेरे इनबॉक्स में ये कहते हुए आते हैं कि वो कभी साइंस पढ़ना ही नही चाहते थे और दलदल में ऐसे धंसे कि आज कर्नाटक-उड़ीसा से बी.टेक. कर रहे हैं।
और जब आप डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के ख्वाहिश में अपने बच्चे को जबरदस्ती मिनी कोटा, यानी पटना या कानपुर भेज रहे होते हैं ऐसे में अपनी खुशी से पढ़ाई करने वाली गया या बनारस की कोई लड़की टॉप कर जाती है तो फिर आश्चर्य क्यों होता है ! बड़े-बड़े बैनरों के तले अंधे हो जाने से पहले एक बार बच्चे की सुन लेना भी अच्छा होता है।
मैं ये नही मानता कि बच्चों का दोष नही होता। लेकिन सारा दोष बच्चों का ही होता है ऐसा भी नही है। इन सब के बीच मुझे उनपर दया आती है जो इन विषयों पर चुटकुले बनाते हैं। कभी सोचते हैं आप कि जो छात्र अपने पूरे प्रयास के बाद भी असफल हो गया, उस पर तब क्या बीतती होगी जब उसका मजाक बनाते हुए आप लिखते हैं कि वो किसी राज्य का भावी डिप्टी सीएम हो सकता है। क्या आपको नहीं पता कि जो डिप्टी सीएम है वो क्यों है ? क्या वो नौंवी या बारवीं फेल होने के योग्यता के कारण ही डिप्टी सीएम है ? अगर हाँ, तो एक परीक्षा आपकी भी होनी चाहिए।
हाँ, मैं उन रिश्तेदारों को भी गलत नही मानता जो पूरे साल फोन न करके रिजल्ट के दिन ही फोन करते हैं। मैं खुद कल से तीन बार घर फोन करके कन्फर्म कर चुका कि अपने रिश्तेदारी में किसी का रिजल्ट तो नहीं था। इसे हमेशा गलत ही क्यों माने ? अगर हम निजी जीवन के उलझनों में व्यस्त रहते हैं तो ऐसा तो है नहीं कि हम अपनो की शुभचिन्ता नहीं करते। फिर अच्छे रिजल्ट पर हम खुश भी तो होते हैं। दुसरों की छोड़िये, जब मेरा कोई अपना मुझ से बेहतर करता है उस दिन मेरा मन पार्टी करने को होता है। होना भी चाहिए। नकारात्मकता छोड़कर हम इस स्पिरिट के साथ क्यों न बढ़ें।
अंत में बस यही कहूंगा कि अगर आपके बच्चे ने अच्छा नही किया है तो प्लीज आज आप उसे मत डाँटियेगा। उसने जो नम्बर पाया है, उसी के लिए उसे सराहिए। अच्छे-बुरे का पैमाना भी अजीब है। इसलिए उसके मेहनत के लिए उसकी प्रशंसा करिए। क्योंकि आज वो खुद भीतर से निराश होगा ! आपकी डाँट उसे हमेशा के लिए आपसे दूर कर देगी। भले ही चार दिन बाद आप उसे भर पेट गालियां दीजिएगा। लेकिन आज उसे आपकी सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा, यकीन मानिए अगर आज आप उसके रिजल्ट की प्रशंसा कर देंगे तो जीवन मे चाहे वो जितना ही सफल होगा, लेकिन एक इंसान के तौर पर उसे आप पर हमेशा गर्व रहेगा !
क्योंकि 73% कुछ नही होता, वो भी तब जबकि दसवीं में आपका 10 सीजीपीए हो, ये उस दिन मुझे भी पता था और मेरे घर वालों को भी !
आशा करता हूँ आप समझेंगे। अभी कई बातें कहनी बाकी हैं। जल्द लिखूंगा। इस उम्मीद के साथ...
विदा,
आपका,
अभिषेक।
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