क्यों न हम दिखाने के बजाय रिश्तों को सहेजना सीख जाएं !
दो साल में हम काफी बदल गए हैं। बदल तो आप भी गए हैं। परिस्थितियां भी काफी कुछ अलग हैं अब, आपकी, हमारी, देश की, सब की। बीते दो सालों में अक्षय कुमार को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल गया और उसी के साथ एक राष्ट्रीय चिंता भी समाप्त हुई।
हम अपने डायरी के पन्नों में पीछे झांककर देखते हैं तो उससे यही लगता है कि अब हम भी थोड़े औपचारिक हो गए हैं। पहले की तरह एकदम कंक्रीट स्टैंड नही है हमारा औपचारिकताओं के खिलाफ और अब हम भी व्हाट्सएप्प पर लोगों को त्योहारों पर संदेश ब्रॉडकास्ट करने लगे हैं। धन्यवाद और थैंक्यू बोलने जैसी आदतें-आदतों में बाई-डिफ़ॉल्ट शामिल हो गई हैं।
लेकिन इन आदतों का अब भी एक दायरा है। संयोग से कल रौनक(छोटे भाई) का जन्मदिन है। कल(पोस्ट पब्लिश होते-होते आज हो जाएगा, बारह बजने को हैं) मैं उससे बात करूं तो भी शायद ही हैप्पी बर्थडे जैसा कुछ बोल पाऊं। कुछ चीजें-कुछ रिश्तें-कुछ अपने हैं जो उन औपचारिकताओं के दायरों से बाहर हैं। और ये यूं ही रहें मैं यही चाहूंगा। हम बिना कहे एक-दूसरों को समझते रहें, इससे बेहतर क्या हो सकता है ?
पिछले दो-तीन महीनों से बाबा अब लगभग न के बराबर बोल पातें हैं। ज़िन्दगी का वो सबसे क्रूर और वीभत्स रूप है। लेकिन आज भी जब हममें से कोई उनसे बात नही करता तो वो बेचैन हो उठते हैं। दूसरे दिन खुद फोन लगवाते हैं। और बस आने के लिए कह पाते हैं ! उनका प्यार कभी दिनों का मोहताज हो पाएगा क्या जो आपको खुद से अधिक चाहता हो ?
मेरे परिवार में मुझ से बड़े सात लोग थें, अब छः हैं। उनमे सबका प्यार हमे मिला है और खूब मिला है। सबकी डाँट भी हमें ही सबसे अधिक मिली है। उनमें सब के लिए दिन तो है नहीं, लेकिन इससे उनका महत्व कम हो जाएगा क्या ? उन रिश्तेदारों का क्या जो हमेशा हमारी शुभचिन्ता में रहते हैं ? उनका तो कोई दिन नहीं है।
फिर दिन है भी तो क्या ? मेरे पापा से मेरी कभी इतनी बात नही होती कि मैं कभी कुछ कह पाऊं उनसे। उन्हें कोई डे विश कर पाऊं। लेकिन मेरे बिना कहे उन्हें सब पता होता है और सामने से वो हंसकर मुझे डांट रहे होते हैं, चाहे मेरी गलती हो न हो, ज़िन्दगी से इससे ज्यादा आपको क्या चाहिए ?
छोटा-पापा जो मेरे हर उपलब्धि पर मुझ से अधिक खुश होते हैं और हर बार जब मैं बुरा करता हूँ तो सबसे पहले हौसला वही देते हैं। जिनकी डांट आपको कब पड़ जाए कुछ पता नहीं होता। और वही डाँट कब हँसी और दुलार में बदल जाए ये भी पता नहीं चलता। क्या वो हमारी भावनाएँ नही समझते होंगे ? हर बार बोलने की जरूरत क्यों होनी चाहिए ?
मेरी दादी, छोटी-मम्मी, दीदी भी फेसबुक नही चलाती। फिर अगर उनके लिए मैं यहाँ कोई पोस्ट लिख ही दूँ तो क्या फायदा ?
मैं ये भी नहीं मानता कि जो ये सब करते हैं, वो गलत हैं। खुद मेरे छोटे भाई-बहनों ने मदर्स डे पर कई पोस्ट किए हैं। उन्होंने शायद उन्हें सामने से विश भी किया होगा। एक पोस्ट मेरा भी हो सकता था उनमें, मम्मी फेसबुक नही चलती। लेकिन जब बच्चे उन्हें बतातें तो वो सुनकर खुश भी होतीं कि बेटे ने उनका फोटो लगाया है।
लेकिन हमारा प्यार इतना दायरों में बंधा-बंधा सा क्यों हो ? क्या मम्मी को नहीं पता होगा कि वो मेरे लिए और हम उनके लिए क्या हैं ? फिर कई बार ये दिखावा भी लगता है। अफसोस ये चलन पिछले दो-तीन सालों में कई गुणा बढ़ गया है। ये हमें अपनों के पास लाने के बजाय दूर ही करती हैं।
बेहतर हो कि क्यों न हम औपचारिकताओं से ऊपर उठ असली खुशियों को ढूंढने की कोशिश करें। माँ के लिए, अपनों के लिए हर वक़्त निकालें। जैसे हम हर वक़्त उन्हें विश कर रहे हों और हमारे कारण उन्हें हमेशा सकारात्मक ऊर्जा मिल रही हो ! क्यों न हम अवगुणों के बजाए अच्छाइयों को देखना सीख जाएं ! क्यों न हम बताने के बजाय रिश्तों को सहेजना सीख जाएं !
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