बिहार बोर्ड रिजल्ट: मुख्यमंत्री के नाम खुला खत।

आदरणीय मुख्यमंत्री जी,
नमस्ते,
लंबे अरसे बाद आपको लिख रहा। पिछली बार शराबबंदी की सराहना करते हुए आपको लिखा था। आज बिहार बोर्ड के परिणामों के कारण लिखना पड़ रहा है। अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो बिहार बोर्ड ने पिछली बार 45% रिजल्ट दिया था। आपकी नई सरकार का पहला साल था वह। शिक्षा मंत्री भी अपने बयानों से बहुत क्रांतिकारी लग रहे थे। चोरी एकदम नही हुई थी। तब मैंने यही कहा था कि बिहार को ऐसे परिणामों की सख्त जरूरत है, और यही कड़वी दवाइयां शिक्षा के सेहत को सुधारेंगी। मैंने तमाम खामियों के बारे में भी बताया था जिनपर हमें लगा था कि  सुधार होंगे।

लेकिन उसके चन्द दिनों बाद ही टॉपर घोटाला उजागर हो गया। पूरी मशीनरी मानो उसी में लग गई। उससे हम उबरे ही थे कि बीएसएससी और बीपीएससी में गड़बड़ी के मामले आ गए। इस बीच हमारे शिक्षा मंत्री ऐसे बयान देते रहें, जिससे जनता सोचे कि सरकार वाकई शिक्षा को लेकर गम्भीर है। बयान तो आपके भी आते रहें मुख्यमंत्री जी। आप हमारे नेता हैं, आपके नाम पर हमने पूरा बिहार आपको सौंप दिया। ऐसे में जब सुधारों के नाम पर बस बयान आ रहे थें, तो आपसे हमारा भरोसा रोज टूट रहा था।

मुख्यमंत्री जी ! आपसे कुछ छुपा होगा, ऐसा तो हमें लगता नहीं। पिछली बार आपने चोरी रोक दी, हम बहुत खुश हुए। लेकिन जब 45% रिजल्ट आया तो आपने संज्ञान लिया क्या ? आपको पता ही है शिक्षा की स्थिति क्या प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक। मैं शिक्षकों के योग्यता पर बात नही करूंगा, वो पुराना मुद्दा हो चुका। लेकिन शिक्षक अगर प्रबन्धक हो जाएं, उस पर तो बात होनी चाहिए। मिड-डे मील, पोशाक, छात्रवृति तक तो ठीक था। लेकिन मानव श्रृंखला बनवाने, खुले में शौच से रोकने जैसी जिम्मेदारी अगर शिक्षकों को दी जाने लगेंगी तो वे पढ़ाएंगे कब ? फिर इन प्रबंधकों पर ये दवाब भी होता है कि वो योजनाओं का लाभ ऊपर के अधिकारियों तक भी पहुंचाएं। बेचारे आखिर करें तो क्या करें !

इस वर्ष तो एक और मामला सामने आया कि वित्तरहित शिक्षक कॉपी जांचने के लिए तैयार ही नही थे। फिर जैसे-तैसे शिक्षकों की व्यवस्था की गई और उन्हें उत्तर मुहैया कराया गया ताकि वो कॉपी चेक कर सकें। एक समय तो ऐसा लग रहा था कि इसबार रिजल्ट ही नही आ पाएगा। पता नही ये स्थिति क्यों उतपन्न हुई !

शिक्षक से लेकर अभिभावक हो या छात्र, हर स्तर पर उदासीनता हैं। सब निराश हो चुकें। उन्हें लगता है कि इस व्यवस्था का कुछ नही हो सकता। प्राइवेट स्कूल और कोचिंग हर जगह खुल आए हैं। उनकी कोई जिम्मेदारी-जवाबदेही नही है। वो मनमानी को स्वतंत्र हैं। फीस से लेकर पढ़ाई तक में। फिर चाहे रिजल्ट आए या न आए।

शिक्षा हर स्तर पर वैसे ही ठप की गई है जैसे एक वक्त में सरकारी परिवहन को किया गया था। मानो बाज़ार के लिए पूरी व्यवस्था तंत्र ही तैयार करेगी। फिर जब आप करोड़ो बजट वाले किसी प्राइवेट स्कूल के वार्षिकोत्सव में जाते हैं तो आपको राज्य के गरीब जनता का ख्याल नहीं आता क्या ? ये ठीक है कि राज्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं आएं, लेकिन उन्हें राज्य की संस्थाओं के कीमत पर लाना कितना सही है ?

फिर क्या उसको शिक्षा का अधिकार नहीं जो दो हज़ार से लेकर दस हज़ार तक महीना इसपर खर्च नहीं कर सकता ? सरकारी स्कूलों में पढ़ने वालों को वैसे ही नॉन-सीरियस मान लिया जाता है। बाकी राज्यों में भी बिहार बोर्ड वालों को दोहरे नजरिये से देखा जाने लगा। फिर क्या गरीब को ये मान लेना चाहिए कि उसके लिये यहाँ शिक्षा नही है। बेहतर है, कि वो पहले ही मेहनत-मजदूरी में लग जाए।

इस बार का रिजल्ट पिछली बार से भी कम, लगभग 35% है। लेकिन अबकी पिछली बार जैसा नही लग रहा। इस बार उम्मीद टूटती सी लग रही है। लोग निराश हो चुके।

मुख्यमंत्री जी ! आप स्थिति से वाकिफ नही होंगे, ऐसा तो नही लगता। आप जानते हैं, ये राज्य आपके चेहरे को देखते ही उम्मीदों से भर जाता है। स्थिति नाजुक है, लेकिन उम्मीद ज़िंदा तो है। उम्मीद है कि आप राज्य के भविष्य के इस टूटती उम्मीद को बचा लेंगे।

इसी उम्मीद के साथ...
आपका,
अभिषेक।

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