लप्रेक इन द टाइम ऑफ़ पुरस्कार रिटर्न..


तुम भी कोई उपन्यास लिख रही थी न रचना ?
छोड़ दिया..
ऐसे कैसे छोड़ दिया ?
बस, मन नहीं लगता इसमें अब..
वो क्यों यार ? कितना भला तो लिख रही थी ? और इंफैक्ट, वो हूबहू हमारे लव स्टोरी को भी कितने अच्छे से दिखा रही थी..
तुम नहीं समझोगे यार क्षितिज, तुम तो बहुत भोले हो.. तुम क्या जानो इस चौकचंध से भरी दुनिया क्या-क्या होता है और कैसे होता है..
अरे वो सब तो ठीक है, पर अचानक किसी अच्छे भले काम को ऐसे एक पल में कैसे छोड़ सकती हो तुम ? सचमुच मैं नहीं समझ पा रहा..
नहीं, मुझसे नहीं होगा ये.. इतनी मेहनत से किताब लिखो और इनाम कोई और ले जाए.. तुम्हे चाहिए तो सरकारो को सिफारिश करो.. अब तो अखिलेश यादव जैसो के पैर भी पड़ना पड़ता है यार.. फिर इतने से भी कुछ नहीं होता.. अगर उसकी सरकार चली जाय.. कल को उनके राजनीतिक अस्तित्व पर संकट आए तो उनके लिए अपने इनाम लौटाओ.. उपाधि लौटाओ.. उनकी राजनीति की जिम्मेदारी भी तुम्हारी होगी.. कौन करे इतना भला ? ये सब ना करो तो साबित ही न होगा कि तुम लेखक भी हो.. कौन खरीदेगा तुम्हारी पुस्तक ? खरीदना तो दूर मुफ़्त में भी कौन पढ़ेगा ? इससे अच्छा तो वो रिक्शेवाला है। दिन भर मेहनत भले ही करता हो, पर रात को नींद तो अपने हिस्से की पाता है न.. हम गुमनामी में ही अच्छे हैं.. अब तो हमारे परिवार वाले भी हमारी शादी को तैयार हैं.. हम बाहर की दुनिया को ध्यान न दें वही बेहतर है..
वो सब तो ठीक है यार, पर फिर भी तुम लिखना मत छोडो.. मेरे खातिर ही सही !

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