लप्रेक: बैंक डकैतियों के बीच..

'कहाँ थे इतने दिनों ?'
'छुट्टियां थी तो गाँव चला गया था..'
'छुट्टियां तो बस दो दिनों की थी, तुम्हे गए तो अब एक महीना होने को है..'
'सोचा, सारे नोट्स तो तुम दे ही दोगी.. वैसे भी क्लास में और होता क्या है तुम्हे देखते रहने के सिवा..'
'तो अब क्यों आ गए यार, कुछ वक़्त और बीता लेते..'
'हाँ, तो अब इतना कुछ हो भी तो गया इस बीच.. देखा नहीं तुमने, हमारे बिहार का रिजल्ट भी आ गया.. कितनी सहिष्णु और काबिल सरकार बनी है.. और परीक्षाएँ भी तो हैं, सो आ गया..'
'मत आते.. परीक्षा भी कोई दे ही देता तुम्हारे बदले..'
'अरे, ऐसा नहीं है रह तो जाता.. पर वहां इन रोज के लूट, डकैती, हत्याओं को कौन झेलता ! इससे बेहतर तो आदमी तुम्हे झेल ले.. '
‪#‎लप्रेक_इन_द_टाइम_ऑफ़_बैंक_डकैतीज‬

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