माननीय उच्चतम न्यायालय की निष्ठा आपके पक्षधरता की मोहताज नही...
भाजपा की सरकार पर अक्सर संस्थाओं को बर्बाद करने जैसे आरोप लगते रहते हैं। काफी हद तक इस आरोप में तथ्य भी है। खासकर सोशल मीडिया में जो वर्ग उनका नेतृत्व करता है, वो हमारे संस्थाओं की एकदम इज्ज़त नही करता। विडम्बना ये है कि ये नया नही है। ये हमेशा से होता आया है। बस सोशल मीडिया ने इसे प्रत्यक्ष कर दिया है। गर दक्षिणपंथी भी अपने विरोधियों जितने होशियार होते तो इसपर बात ही नही होती। क्योंकि जो दूसरा पक्ष है, वो भी हमारे संस्थाओं की इज्जत उतनी ही करता है। मगर वही काम वो इतने महीन तरीके से करते हैं कि सामने वाले को भ्रम हो जाता है कि वो संवैधानिक संस्थाओं के शुभचिंतक हैं। मैं दूसरा पक्ष इसलिए लिख रहा क्योंकि कांग्रेस और तमाम क्षेत्रीय दल वामपंथी नही हैं और जो घोषित वामपंथी हैं वो इनसे पृथक नही है, इसलिए इनके लिए मेरे पास शब्द नही है।
ये यूं ही नही कह दिया जाता कि भाजपा के समर्थक कांग्रेसी और कम्युनिस्ट पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के सामने नही टिक सकते। दक्षिणपंथी, संस्थाओं में अपने पकड़, शिक्षा आदि में दूसरे पक्ष के सामने कहीं नही टिकते। इस पक्ष का नेतृत्व वो वर्ग करता है जो संस्थागत व्यवस्था से नही जुड़ा है। जो पढ़े-लिखे लोग, पत्रकार आदि हैं भी, अगर उस पक्ष के हैं, तो घोषित तौर पर हैं। लेकिन दूसरा पक्ष अक्सर खुद के निष्पक्ष होने का स्वांग रचाता है।
असल में उस दूसरे पक्ष के लिए संस्थाएं तबतक ही स्वतंत्र होती हैं, जबतक वो इनके पक्ष में हो। जैसे ही उनके एजेंडे के इतर कोई फैसला या कदम इन्हें दिखता है, ये उस संस्था पर हमलावर हो जाते हैं। इसके उलट दक्षिणपंथी समर्थकों का रुख उनके प्रति हमेशा एक साम्य लिए होता है। हालिया उदाहरण उर्जित पटेल का है, भले ही वो काँग्रेस के वक़्त में भी रिजर्व बैंक में कई पदों पर थे। जब भाजपा ने उन्हें गवर्नर बनाया तब भी वो डिप्टी-गवर्नर थे। मगर सिर्फ इस बात पर कि उन्हें भाजपा के सरकार रहते गवर्नर बनाया गया, उनकी हमेशा आलोचना हुई। लेकिन जब उनके सरकार के साथ मतभेदों की खबरे आईं और उन्होंने इस्तीफा दे दिया, तो यही पक्ष उन्हें अपना चहेता मानने लगा। नए बनाए गए गवर्नर की आलोचना उनके इतिहास के छात्र होने के कारण हो रही है। लेकिन वित्त मंत्रालय के उनके दशकों के अनुभव और उसी दौरान आईआईएम जैसे संस्थानों से लिए गए उनके प्रमाण पत्रों को खारिज कर दिया गया सा है।
ऐसा नही है कि दूसरा पक्ष ये बातें नही जानता है। क्योंकि जो पक्ष पंद्रह लाख वाले बयान के लिए मोदी को आजतक कटघरे में खड़ा करता है, वही राहुल गांधी के 'कर्ज माफी समाधान नही है' वाले वीडियो को संदर्भ के साथ देखने की वकालत करता है। तमाम अदालती प्रक्रियाओं के बाद भी जो पक्ष प्रधानमंत्री को गुजरात दंगों के लिए कटघरे में खड़ा करता है, वही पक्ष कमलनाथ के बचाव में चुनाव में दिए गए उनके हलफनामे को लेकर सामने आ जाता है। जबकि वो ये बखूबी जानते हैं कि हलफनामा व्यक्ति द्वारा स्वघोषित होता है। इतना सेलेक्टिव होने के बाद भी उस पक्ष को निष्पक्ष कैसे कहा जाए?
कल जब से सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील में अदालती जांच के संभावनाओं को खारिज कर दिया है। इस पक्ष ने जाने कैसे-कैसे संबोधन माननीय उच्चतम न्यायालय को दिए हैं। याद करिए कि जिन चार जजों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश उन्हीं में से एक हैं। तब अपने संस्था के लिए खड़े होने के उनके तरीके से लोगों में असहमतियां भले थीं। हालांकि उन न्यायमूर्तियों के निष्ठा पर किसी को संदेह नही हो सकता। लेकिन जो संस्थाओं का पक्षधर होगा, खासकर सुप्रीम कोर्ट जैसे सर्वोच्च मानदंडों वाली संस्था के विरोध में ऐसे कदमों के पक्ष में नही खड़ा हो सकता। वो तब इन चार जजों के पक्ष में खड़े थें, लेकिन वही लोग जो उन न्यायमूर्तियों को न्याय का योद्धा घोषित कर रहें थे, कल से मुख्य न्यायाधीश को नया सर्टिफिकेट जारी करने में लगे हैं।
हकीकत ये है कि शुचितावादी लोगों को दक्षिणपंथियों से कहीं अधिक दूसरे पक्ष ने नुकसान पहुंचाया है। क्योंकि निष्पक्षता के आड़ में वो जो करते हैं, उससे शुचिता ही कटघरे में खड़ी हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले, हर जस्टिस को तब निशाना बनाया गया, जब कोई फैसला सरकार के पक्ष में आया। विपक्ष का काम विरोध करना है, लेकिन वो विरोध तथ्यों और तर्कों के आधार पर होना चाहिए। और जो खुद को निष्पक्ष कहते हैं, उनका काम विपक्ष के खामियों का पूरक बनना नही है। एक नया प्रतिमान गढ़ लिया गया है, सत्ता के विरोध को जनहित और राष्ट्रहित मानने का। ये जरूरी नही है कि जन द्वारा चुनी गई सत्ता हमेशा जन की विरोधी ही हो।
कल राफेल डील पर याचिका पर सुनवाई करने वाले जजों में जस्टिस गोगोई प्रेस-कॉन्फ्रेंस करने वाले जजों में एक थे। उसी बेंच में जस्टिस केएम जोसेफ भी थे, जिनकी नियुक्ति सरकार ने लंबे समय तक लटकाई थी और तब खास बवाल हुआ था। लेकिन वहाँ व्यक्तिगत खुन्नसों और विचारधाराओं के आधार पर फैसले नही होते। फिर ये एक फैसले मात्र का सवाल नही है। और विपक्ष इतनी मासूम भी नही है। वो तो भला हो हमारे संविधान का और हमारे संस्थाओं का, जो तमाम बातों के बावजूद अपना मजबूत और स्वतंत्र अस्तित्व बचाए रख पाती हैं, वर्ना सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थाओं को तो दशकों पहले रीढ़-विहीन करने की तैयारी कर ली गई थी। असल मे ये लोग 'पंच-परमेश्वर' की अवधारणा को भूल जाते हैं। ये संस्थाएं इतनी महान है कि कुर्सी पर कोई जस्टिस मिश्रा बैठें या जस्टिस गोगोई, उनका होना ही न्याय हैं! उनकी निष्ठा आपके पक्षधरता की मोहताज नही है...
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