प्रधानमंत्रीजी को खुला खत: ये 2019 का आगाज़ नहीं है!
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
मैं अमूमन राजनीति पर नही लिखता। सार्वजनिक फोरम में राजनीति पर लिखते हुए हर बार व्यक्ति का खेमा तय कर दिया जाता है। निष्पक्षता आदर्श होती है, हालांकि वर्तमान में खुद को निष्पक्ष कहने वाले अधिकतर लोग भी एक पक्ष से भावात्मक जुड़ाव वाले ही हैं। एक नागरिक के रूप में मैं कभी निष्पक्ष नही हो सकता, होना भी नही चाहिए। मगर पक्षधरता का अर्थ जितना संकुचित और निम्न हो चला है, उस से बचना ही बेहतर होता है। खैर, आज के मौके को मैंने बचाकर रखा था, आपसे संवाद करने के लिए।
आज के परिणामों के बाद मैं कुशलक्षेम की औपचारिकता नही करूँगा। ये परिणाम अप्रत्याशित नही थे। आपके पक्ष में भी लोगों को चुनावों के पहले ही इसका अंदाजा हो चला था। लोकतंत्र के लिए हितकर यही है कि हर बार एक ही पक्ष न जीते। हर बार एक का जीतना संभव भी नही है। मगर मोदीजी, जब दूसरों के जीत से अधिक आपके हार के चर्चें हैं तो जाहिर है कि जनता को आज भी आप से ही उम्मीद है। जो इसे 2019 का आगाज मान रहें, वो गलती कर रहे हैं। सच ये है कि आप अभी 2019 के लिए उतरे ही नही हैं। जिन्हें ये लगता है कि इस हार ने 2019 की पटकथा लिख दी है, उन्हें बहुत पीछे जाने कि जरूरत नही है। 2008-09 का ही उदाहरण ले सकते हैं। असल में तो अनजाने ही लेकिन इस हार से आपके भी कई हित सध गए हैं।
राज्यवार अपने हार के कारणों की समीक्षा आप कर लेंगे। राजनीति आप सबसे बेहतर जानते हैं, इसलिए उसके बारे में बताते हुए मैं आपका समय खराब नही करूँगा। लेकिन मोदीजी, सत्ता अक्सर जनभावना से कट जाती है। आपके साथ भी इस कार्यकाल के उत्तरार्ध में वही हुआ। आपने नीति और नियत की बात की थी। सच ये है कि सत्ता में आने से पहले आप नियत की बात तो कर सकते हैं, बाद में नीति ही देखी जाती है। आपकी नीतियां चाहे जितनी अच्छी हो, सामाजिक मसलों पर आप चूक जाते हैं। हर बार नेहरू को दोष देते हुए आप भूल जाते हैं कि धीरे-धीरे कई अर्थों में आप भी 'नेहरू' हो चले हैं। जो कर सकते हैं(थे) वो किया नही, और जबरदस्ती वो करने चले हैं जिसकी जरूरत नही।
नेहरू बच्चों के चाचा कहे जाते थें। आपने 'एग्जाम वारियर्स' वैसा ही कुछ सोच कर लिखा होगा। लेकिन परीक्षाओं के बीच ये खत लिखते हुए मैं निश्चित ये कह सकता हूँ कि उस मसले पर पहले से ही बेहतर किताबें उपलब्ध हैं। वो वैसे भी व्यावहारिक पक्ष है। आपके लिए शासन महत्वपूर्ण है, वो आप औरों से बेहतर कर सकते हैं। आपने ये साबित भी किया है। आपका ध्यान उसपर ही होना चाहिए। लेकिन केंद्र के सत्ता में जाने आप किस द्वंद्व के शिकार हो गए। आप चुनावों में कुछ कहते हैं, जबकि सामाजिक मसलों पर आपकी नीतियां कुछ और होती हैं।
मैं राम मंदिर की बात नही करूँगा। सच है कि उसमें आप कुछ नही कर सकते। लेकिन आप जिस तुष्टिकरण के विरोध से सत्ता में आए थें, आप वही करने लगे। देश मे कई मौकों पर भीड़ 'न्याय' करती हुई देखी गई है। वैसे मामलों में आपके पक्ष की संलिप्तता अक्सर होती है। सत्ता में बैठे लोगों के ऐसा करने से गलत संदेश जाता है। फिर विरोध को बिका हुआ कहने की एक नायाब परंपरा चल पड़ी है। शीर्ष पर बैठा हुआ व्यक्ति जिम्मेवार होना चाहिए। जाहिर है कि मजाक में ही, लेकिन राज्यसभा के उपसभापति के लिए विपक्षी उम्मीदवार(बीके हरिप्रसाद) को जब आपने 'बिके हुए' कहा होगा तो इसके परिणामों की परवाह नही की होगी।
ये सच है कि सामाजिक विरोधों और आंदोलनों में राजनैतिक दल अपना हित देखते हैं। जो आज काँग्रेस या अन्य दल कर रहे हैं, कभी आप भी करते थे। वहाँ विरोध का राजनैतिक होना मसला ही नही होता। सत्ता में विरोध को पचाने की क्षमता होनी चाहिए। चुने हुए शासक में अकड़ नही, विनम्रता होनी चाहिए। फिर विरोध भी आपके पक्ष में चले जाएंगे। लेकिन किसानों को, छात्रों को, हर विरोध को बिका हुआ कह देने की जो परंपरा चल पड़ी है, उससे निश्चित ही आम जनता के बीच आपके छवि को धब्बा लगता है।
आपके आसपास के लोग जनता की नब्ज नही जानते। आप वो सबसे बेहतर जानते हैं। गलत लोगों के सलाह पर काम करने से नुकसान होता है। आपकी सरकार में सबसे महत्वपूर्ण विभागों सम्भालने वाले मंत्री जनता का सामना नही कर सकते। आजतक एक चुनाव नही जीत सकने वाले नेता पर अत्यधिक भरोसे से नुकसान तो हुआ ही है। फिर एक की बात भी नही है, आप जिनके हिसाब से फैसले लेते हैं, हारने का अंदेशा होने पर वही आपको सबसे पहले छोड़कर भागेंगे। कड़े फैसले हर तरफ से लेने होते हैं, वो चुनिंदा नही हो सकते। जनहित और राष्ट्रहित का महत्व सिर्फ बातों में हो और कार्य वोटों के तुष्टिकरण के हो, ऐसे में नुकसान तो अवश्यम्भावी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में बेवजह हस्तक्षेप करके संशोधन करने से भी गलत संदेश गया। वो आपको आपके पूर्ववर्तियों के कतार में ले जाकर खड़ा करता है। उसकी तुलना शाहबानो प्रकरण से की गई। उस प्रकरण का अंजाम तो आप जानते ही होंगे!
चार वर्ष बाद भी अगर आपके प्रवक्ता सत्तर साल को ही कोसते हैं तो एन्टी-इनकमबेंसी ही बढ़ा रहे होते हैं। शीर्षस्थ संस्थाओं से आनेवाली खबरें भी इसमें सहयोग करती हैं। कई बार ये विपक्ष, मीडिया और संस्था में बैठे लोगों की मिलीभगत भी हो सकती है। जैसे सीबीआई के मामले में गोपनीय रिपोर्ट के लीक होने से लगा। लेकिन कई बार अलग-अलग कारणों से आप संतुलन साधने में चूक जाते हैं। न्यायपालिका के प्रति भी आपके सरकार में बेवजह ही अत्यधिक विरोध दिखता है। ये सरकार को सड़क पर खड़े आदमी के बराबर ला खड़ा करती है।
लेकिन जहाँ सड़क पर खड़े व्यक्ति के बराबर खड़े होने की बात होती है, वहाँ आप अलग सुर ले लेते हैं। मसलन चुनावों में आप तुष्टिकरण का विरोध करते हैं, लेकिन चुनावों के बाद महाराष्ट्र की तरह आपके मुख्यमंत्री मुस्लिम कोटा की बात करने लगते हैं। झारखंड, बिहार जैसे कुछ प्रदेशों में आपकी पार्टी प्राइवेट लिमिटेड की तरह काम करती है, जिनका जनसरोकारों से कोई सरोकार नही होता। ऐसे में जनता से कट जाना आखिरी वक्त के किसी जादुई भाषण के भरोसे हर बार तो नही जिता सकता!
मोदी जी! आज परिणाम का दिन है। आज हार का दिन है। हार का दिन अपना होता है। ये दिन आपका आईना होता है। ये आपको सिखाता है। आपको मजबूत बनाता है। आपको अपने भीतर झांकने का मौका देता है। आपके जीत की राह प्रशस्त करता है। जाहिर है कि जबतक देश का नेतृत्व करने के लिए कोई संजीदा विकल्प नही है, आपका होना जरूरी है। इसलिए छोटे हार जरूरी हैं, बड़े सबक देने के लिए। स्वार्थ के लिए आपको घेरे लोगों से अलग होकर सोचने के लिए... आशा है कि ये हार आने वाले वक्त में आपके जीत का कारक होंगे! शुभकामनाएं!
आपका,
अभिषेक.
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