हम जिम्मेदारियों को फ़ास्ट फॉरवर्ड करने वाली पीढ़ी हैं!
कैरियर और पढ़ाई के मामलों में अभिभावकों द्वारा बच्चों पर अपनी पसंद थोपे जाने की बातें हम अक्सर सुनते हैं। हमारे अभिभावक इस कारण कटघरे में भी खड़े किए जाते हैं। तमाम बातें होती हैं, मगर जिनपर पसंद थोपा जाता है, उन बच्चों पर ही बात नही होती। बारहवीं के बाद मेरा एक मित्र फैशन डिजाइनिंग के लिए जाना चाहता था। लेकिन समस्या वही थी, कौन मानेगा! अबतक वो पढ़ने में अव्वल था और उसने मैथ्स लेकर पढ़ाई की थी, तो लोग उसमें एक इंजीनियर इन मेकिंग देख पा रहे थे। अपने इस पहचान को वो भी ढोता चल रहा था। हमारी जब भी बातचीत होती थी, मैं उसे परिवार के लोगों से बात करने के लिए कहता था। संयुक्त परिवार का वो लड़का एक साथ कई उम्मीदों को उठाए हुए था।
ये हमारे समाज का सच है कि एक उम्र के बाद हमारे माता-पिता, अभिभावक, अपने अधूरे सपनों को अपने बच्चों के आंखों से देखने लगते हैं। जो वो न कर सकें, वो उनके बच्चे करेंगे, ऐसा सोचने लगते हैं। उनके न कर पाने के हज़ार कारण रहे होंगे। लेकिन अपने बच्चों को वो कारण, वो बहाने नही देना चाहते। उनकी बस एक इच्छा होती है, उनके बच्चे जीवन में अच्छा, सफल इंसान बन सकें। जब ये चिंता थोड़ी अधिक हो जाती है, तो बच्चों के पसंद निर्धारित करने लगती है। उनके लिए फैसले करने लगती है, और एक हद के बाद अपने फ्रस्ट्रेशन, अपने अभावों को उनपर थोपने लगती है।
तकनीक के अत्यधिक विस्तार के बाद बच्चों के पास विकल्प बढ़ गए हैं। गाँव में ठीक-ठाक कनेक्टिविटी के बावजूद जो सहायता लोगों को पांच साल पहले नही मिल पाती थी, वो आज शहर की तरह ही सुलभ हो गई है। पाँच साल पहले के बच्चों के पास ये बहाना होता था कि उन्हें बताने वाला, उन्हें मार्गदर्शन देने वाला कोई नही था। तब ये बहाना चल जाता था, आज ये कोई नही सुनेगा। मगर अफसोस बच्चों के एक बड़े वर्ग की दिलचस्पी इन साधनों से मीम्स बनाने और नए यूट्यूब सीरीज के इंतजार तक ही सीमित है। तकनीक ने दायरा बढ़ा तो दिया है, मगर हमारे सोचने के दायरे को सीमित कर दिया है। सतही, फूहड़ और अनसेंसर्ड कंटेंट हमारे पैमाने गढ़ने लगे हैं, हमारे आदर्शों को निर्धारित करने लगे हैं।
अभिभावक आपके लिए अधिक तभी सोचते हैं जब आप अपने लिए सोचना बंद कर देते हैं। ऐसा करना उनका अधिकार भी है। अपने अभिभावकों के दवाब में इंजीनियरिंग करने वालों ने उन्हें कोई विकल्प सुझाया था क्या? कभी उन्होंने शांति से बैठकर अपने परिवार वालों को समझाने की कोशिश की थी क्या?
अपने उस मित्र की कहानी पर लौटता हूँ। उसे यही लगता था कि उसके परिवार वाले फैशन डिजाइनिंग कोर्स के लिए नही मानेंगे। वो अपने बड़े-पापा से बात करने से डरता था। संयुक्त परिवारों की ये खूबसूरती होती है, एक बच्चे के साथ पूरा परिवार सपने देखता है। सबकी उम्मीदें और दुआएं उसे बनाने का कारक होती हैं। वहाँ फैसले साथ बैठकर होते हैं, इसलिए गलतियों की संभावना कम होती है। मैंने ऐसे परिवारों में थोपे हुए फैसले काफी कम देखे हैं। परिवार के मुखिया के फैसले के प्रति अगर असंतोष होता है तो वहाँ कोई न कोई सदस्य ऐसा जरूर होता है, जो इस बात को उनके सामने बिना डरे रख सके और उसे बदलवा सके।
काफी हिम्मत करके उसने अपने बड़े-पापा के सामने अपनी बात रखी। जाहिर है, 'ये पढ़ने वाला नही है! इसके ऊपर किए हुए सारे खर्च व्यर्थ हैं!' जैसा ही कुछ सुनने को मिला होगा। जिस व्यक्ति ने आपसे अपेक्षाओं बहाने से हज़ारों सपने बुन लिए थे, उसका ऐसा बोलना जायज़ भी है। ये आपके ऊपर है कि आप उन्हें भरोसा दिला सकें कि आप जो करने जा रहे, वो आपके लिए सर्वश्रेष्ठ है। मुझे नही लगता कि कोई माता-पिता इतने के बाद भी अपने बच्चे की बात नही मानेंगे। आखिर उसकी खुशी ही तो उनकी प्राथमिकता होती है। ऐसा ना हो तो भी, बेमन से ही सही लेकिन अक्सर उन्हें मानना पड़ता है, उन्हें अपनी पसंद छोड़नी पड़ती है!
उस लड़के के परिवार वाले भी मान गए थे। उन्होंने इंजीनियरिंग की जिद छोड़ दी थी। उन्होंने उसे अपने पसंद के करने की छूट दे दी। निफ्ट के एंट्रेंस में तबतक वो दुर्भाग्य से शामिल नही हो सका था, मगर उसने एनसीआर के एक नामी यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया था और आज वो उस क्षेत्र में काफी आगे बढ़ चुका है। जब बच्चे अपने अभिभावकों को दोष देते हुए उनके न मानने की बात करते हैं, तो मुझे उसकी याद आ जाती है। उससे ज्यादा निराश मैंने किसी को नही देखा था, और अगर वो अपने बड़े-पापा से बात कर सकता है, तो शायद कोई भी कर सकता है!
मगर हमारी पीढ़ी तो फ़ास्ट-फॉरवर्ड वाली पीढ़ी है। अपने फैसलों, अपने जिम्मेदारियों से बच निकलना इसे बखूबी आता है। चुपके से दोष दूसरों पर सरका देने से बेहतर शायद ही कुछ हो सकता है। जो बच्चा बचपन से इंजीनियरिंग, मेडिकल और यूपीएससी की बातें किया करता है, उसका अभिभावक तो ऐसे ही किसी चीज को उसकी पसंद समझेगा न! लेकिन एक दिन अचानक बाबू कहते हैं कि वो तो परिवार और समाज के डर से इधर आ गए, वर्ना उनकी पहली मुहब्बत तो आज भी क्रिकेट है! जाने कब उन्होंने टीवी देखते हुए चुपके से उसमें अपनी जिम्मेदारियों का निर्वासन ढूंढ लिया!
किया क्या था आपने उस मुहब्बत के लिए? चार गेंद ठीक से खेल भी न पाए तो वो किसी मुहब्बत! परिवार को दोष देते हुए आप ये बताना भूल जाते हैं कि ये नही करते तो आप क्या करते। विकल्प तो दीजिए! तब आप अपना शत-प्रतिशत देकर असफल भी होंगे तो आप सोच सकने लायक होंगे... मगर जब आप विकल्प ही नही दे सकते, एक ठोस निर्णय ही नही ले सकते; तो थोपे हुए फैसले का दोष थोपते ही चलेंगे न... जिम्मेदारियों से भागने पर और क्या अपेक्षा है आपकी?
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