क्या बिना कानून आदर्शों और अपीलों के सहारे खत्म होगा तीन तलाक ?

हमारे एक दूर के रिश्तेदार थे, जिन्हें अपने बेटे की शादी करनी थी। लेकिन समस्या ये थी कि मनचाही डील नही मिल पा रही थी। लड़कियां तो कई मिलीं। अच्छी, सभ्य, सुशील, शिक्षित भी और तमाम बुराइयों में लड़कों से दो कदम आगे चलने वाली भी। लेकिन समस्या बस एक थी, डील नहीं मिल पा रही थी ! पंडितजी ने गुण भी कइयों से मिला दिए, 36 के 36 मिला दिए... लेकिन डील मिल नही पा रही थी, मजबूरी में उन्हें भी मुकरना पड़ता था। लड़की वालों से कहना पड़ता था कि कुंडली ही नहीं मिली।

हालांकि बाद में उन्हें एक अच्छा सा पैकेज मिल गया उनके लड़के के बदले। लड़की भी अच्छी ही थी। लेकिन असल समस्या तब शुरू हुआ जब शादी के बाद लड़की ने बात-बात में उस 'डील' का उलाहना देना शुरू किया। हालात ऐसे हो गए कि शादी के 7 महीने बाद लड़का अपनी पत्नी के साथ परिवार से अलग रहने लगा।

शादी दो लोगों के अलावा दो परिवारों का भी मिलन होता है इससे इनकार नही किया जा सकता। लेकिन वो मिलन रिश्तों से आगे बढ़कर पैसों और सामानों से तय होने लगे तब दिक्कत होने लगती है। मैं अगर अपेक्षा करता हूँ कि मेरे परिवार में जो लड़की आए वो मेरे जैसे संस्कारों में पली हो, मेरे रिवाजों को समझे और मेरे बड़े से परिवार को साथ लेकर चल सके, तो इसमें मुझे कुछ गलत नही लगता। रिश्तों में अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं। पर जहां पैसा बीच में आएगा वहां इन अपेक्षाओं से तो समझौता करना ही होगा आपको। फिर उन रिश्तेदार जैसा हश्र तो कोई नही चाहता।

चाहे-अनचाहे दहेज प्रथा हिन्दू समाज के सबसे बड़े बुराइयों में है। कई लोग इसे लड़के के शादी पर होने वाले खर्च का भरपाई कह सही ठहराने की कोशिश करते हैं। हालांकि मैं इससे बिल्कुल सहमति नहीं रखता। हाँ एक स्थिति हो सकती है, अगर आप आर्थिक रूप से कमजोर हैं और सामने वाला रिश्तेदार अपने सामाजिक स्थिति के बराबर लाने के लिए कुछ मदद कर रहा है तो !

जब ये प्रथा अपने चरम पर थी तब इससे संबंधित कानून लाकर इसे बंद करने की कोशिश की गई थी। ये कानून इतना सख्त है कि अक्सर इसके दुष्प्रभावों पर चर्चा होती है। कई बार निर्दोष भी फंसते हैं। इसके पीछे कारण ये है कि इन मामलों में 'बर्डेन-ऑफ-प्रूफ' एक्यूज्ड(आरोपी) पर होता है। आप खुद को निर्दोष साबित करिए वर्ना आप दोषी हैं। लेकिन उस समय वक़्त की मांग कुछ ऐसी ही थी।

हाल ही में किसी इस्लामिक मौलाना या संस्था ने कहा है कि वो धीरे-धीरे तीन तलाक को खुद ही खत्म कर देंगे, इसके लिए कानून न लाया जाए। लेकिन क्या ये काफी होगा ? जो कुप्रथा इतने सालों से चली आ रही वो एक अपील से खत्म हो जाएगी क्या ? मैं सामाजिक और व्यक्तिगत व्यवहार में राज्य या शासन के हस्तक्षेप का पक्षधर नही हूँ। लेकिन एकदम से खुला छोड़ देना भी तो समाधान नही है।

लाख आदर्शवादी समाज की कल्पना हम काहे न कर लें, दहेज को अपील या आदर्शों से खत्म किया जा सकता था क्या ? इतने सख्त कानून के बावजूद भी वो अबतक पूरी तरह से खत्म नही हुआ है। फिर तीन तलाक-हलाला की परंपरा के सामने तो वो कुछ नहीं। इसे मानने वाला समाज भी उसके वाले के तुलना में कहीं कट्टर है अपने परंपराओं को लेकर। फिर ये कैसे मान लिया जाए कि बिना कानून लाए, बिना सख्त से सख्त कानून लाए ये खत्म हो जाएगा ?
और आपके अपील का क्या है, आप कुछ अपील करेंगे, आपके कोई समकक्ष उसके उलट कुछ और कर देंगे !

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