'जय जवान, जय किसान, जय नौजवान !'

बाकी मुद्दे क्षणभंगुर हो सकते हैं, जो एक झोंके की तरह आते हैं और सबकुछ उठा कर लेते चले जाते से लगते हैं। लेकिन ये तीनों हमेशा ही डिस्कोर्स के आखिरी समय मे भी उतने ही प्रभावशाली रहे हैं जितना कि पहले दिन, और अगर अगली बार फिर से किसी बहाने से उठा दिए जाएं तो भी हमारी सम्वेदनाएँ इनसे जुड़ ही जाती हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के 'जय जवान, जय किसान' वाले नारे में नौजवान नहीं थे। लेकिन उस समय के परिस्थितियों पर ध्यान दें तो यही लगता है कि तब नौजवान 'किसानों और जवानों' के इतर थे ही कहाँ ? देश एक जंग से निकल कर दूसरे के खतरे को झेल रहा था और आबादी का एक बड़ा हिस्सा दाने-दाने को मोहताज था। ऐसे में नौजवान इस नारे से अलग कहाँ थें ?

जब अटल जी ने इस नारे में 'विज्ञान' जोड़ा होगा तो निश्चित ही उनके दिमाग मे नौजवान ही रहे होंगे। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ये शब्द युवाओं के इर्द-गिर्द ही तो घूमता है। अगर हम तत्कालीन परिस्थितियों को देखें तो लगता है कि उनका ये नारा जवान और किसान से चलकर नौजवान तक पहुंचता है, विज्ञान भले उसका माध्यम बन जाए।

कमोबेस यही बातें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करते हैं। किसान, जवान और नौजवान, गाहे-बगाहे इन तीनों का ही जिक्र अक्सर कर ही देते हैं। हाँ ये है कि उनका अंदाज उनके पूर्ववर्तियों से जुदा है, जो उन्हें औरों से एकदम अलग कर देता है।

लेकिन तमाम चर्चाओं के बाद इन तीनों के हालात में कोई फर्क आया है ऐसा लगता नहीं है। वक़्त के साथ इनकी समस्याएं बदली हैं ओर हर बार पहले से अधिक गंभीर हो कर उभरी हैं। हम अधिकतर सुनहरे अतीत और एक आदर्श भविष्य के बीच अपने वर्तमान को कोसते हुए जीते हैं। मुझे नहीं पता कि आदर्श स्थिति क्या हो सकती है। जब हम स्वर्णिम युग की बात कर रहे होते हैं तो मुझे बिल्कुल अंदाजा नही होता कि ये कैसा होता होगा। होता भी होगा या नहीं ? सही गलत का भी मुझे बहुत अंदाजा नहीं है। लेकिन इतना तो समझ ही पाता हूँ कि इनकी जो स्थिति है, वो कैसी भी हो, ठीक तो निश्चित ही नही है।

कल फिर किसी किसान ने आत्महत्या कर लिया। जाहिर है, उपज हो नहीं रही है ढंग से, जो कुछ हो रहा उसका उचित कीमत देने को कोई तैयार नहीं है। जो कीमत मिलती है उसमें परिवार चलाना तो दूर साहूकार का कर्जा(किसानों के एक बड़े वर्ग को बैंक या को-ऑपरेटिव से कर्ज नहीं मिलता, ऐसे में उनके पास साहूकार ही एक विकल्प होता है) भी नही खत्म हो पाता। ऐसे में करे क्या वो ?
कल उत्तर प्रदेश की सरकार ने किसानों का कर्ज माफ कर दिया। फैसले का स्वागत करते हुए मैं दूसरे पक्ष की तरफ रुख करना चाहूंगा। किसान को फसल की कीमत मिल जाती तो उसका लोन माफ करने की नौबत ही कहाँ आती ? जब हम बाकी सभी उत्पादों को मार्किट के हवाले कर सकते हैं तो अनाजों का दाम सरकार क्यों तय करे ? महंगाई रोज बढ़ रही लेकिन किसान तक उसका हिस्सा नहीं पहुँच रहा। दाल ₹40 से बढ़कर औसतन ₹100 पर पहुंच गई, बच्चे के स्कूल की फीस ₹400 से बढ़कर ₹2200 हो गई। लेकिन उसका गेहूं 10 रुपए से सरककर ₹13-14 तक ही पहुंच पाया। ऐसे में क्या करे किसान बेचारा ?
एक तर्क ये भी है कि अनाजों का दाम बढ़ेगा तो गरीब को खाना कैसे मिलेगा ? लेकिन तब हम ये क्यों भूल जाते हैं कि आज भी FCI के गोदामों में हज़ारों टन अनाज सड़ जाते हैं। हम उन्हें उचित दाम पर खरीद कर PDS जैसे योजनाओं के माध्यम से बेच तो सकते हैं ना ? फिर 13 रुपए बिकने वाले धान का चावल बाजार में पहुंच कर औसतन 45 रुपए का हो ही जाता है। इसमें किसान का क्या फायदा? फिर महंगाई का सवाल रह ही जाता है, साथ में एक और सवाल फिर जुड़ जाता है कि आखिर गरीब खाए तो खाए कैसे ?

लेकिन शासन और सत्ता इन्ही हालातों में मस्त रह सकती हैं। शायद इसलिए उन्हें इन स्थितियों की परवाह नहीं !

जवानों की हालत ऐसी है कि जब उसे कोई नहीं सुनता तो उसको सोशल मीडिया का रुख करना पड़ता है। स्थिति निराशाजनक तब हो जाती है जब हम उनके समस्याओं को दूर करने के बजाए, ये सोचने लगते हैं कि वो यहां तक पहुंचे कैसे ? समस्या से कोई सरोकार नहीं रहता और उनके आवाज को दबाना ही हमारी प्राथमिकता हो जाती है। जबकि ये सब मानते हैं कि हमारी सैन्य संस्थाएं आज भी अंग्रेजों के बनाए ढर्रे पर ही चल रही हैं।

बात जब नौजवानों की आती है तो पहली नजर शिक्षा और रोजगार पर जाती है। सरकारी स्कूलों पर तो बात करना ही व्यर्थ है। ट्रस्ट के रूप में चलने वाले प्राइवेट स्कूलों की प्राथमिकता शिक्षा है, इसपर सन्देह है। जब कॉपी से लेकर मोजे तक स्कूल ही बेचने लगें तो ऐसा होना लाजिमी ही है। पढ़ाई कितनी है वो दिख ही जाता है। गरीब अपने बच्चे को स्कूल भेजे तो कैसे ? जो भेज भी लेते हैं वो इसी का रोना रोते रह जाते हैं। अभी अप्रैल के महीना है तो ये और बेहतर समझ आता है !

उच्च शिक्षा के नाम पर स्टेट यूनिवर्सिटीज में शायद ही कुछ बचा है। केंद्रीय विश्वविद्यालय कुछ हद तक आशान्वित करते हैं। लेकिन वहां भी समस्याएं गम्भीर हैं।
सरकार रैंकिंग जैसा नया लॉलीपॉप भी ढूंढ लाई है। ये रैंकिंग एकदम से सारे पाप धोती सी लगती है। जबरदस्ती 'आल इज वेल' लगने लगता है। और तब कहीं अपने जिम्मेदारियों को समझने से भागता प्रशासन भी राहत की सांस लेता है। ये चीजें(रैंकिंग) कितना मायने रखता आपके लिए, ये आपको तय करना है !

कमी कहीं न कहीं हमारी भी है। समाज के रूप में हम कितने संवेदनशील हैं ये भी बड़ा सवाल हैं। जब आप इंजीनियरों पर चुटकुले बना रहे होते हैं तो कहीं कोई अपने भीतर ही घूंट रहा होता है। जब हम उसे पढ़ रहे होते हैं तब कोई खुद की जान लेने की तैयारी कर रहा होता है और जब हम उस चुटकुले को अपने दोस्तों को सुना कर हँस रहे होते हैं, तो हमारे बीच का हो कोई दारा जे भीम राजू खुद को आग लगा रहा होता है।

कोटा से अक्सर ही आत्महत्याओं की खबरे आती रहती हैं। ऐसी क्या हताशा है कि हमारे छात्र खुद की जान लेने जैसा फैसला इतनी आसानी से कर ले रहे हैं ?

सोचने की जरूरत तो हैं ही ? आखिर जिंदा हैं तो दिखना तो होगा ही न ? या 'जय जवान, जय किसान, जय नौजवान' कह लेने भर से सब ठीक हो जाएगा ?

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