चुनाव: टिकट बंटवारा और बिक्री ।
September 24, को लिखा गया
बिहार चुनाव में अब बमुश्किल 20 दिन बचे हैं पर हर तरफ और सभी पार्टियों से टिकट बंटवारा में हुई अनियमितताएं सामने आ रही हैं । हालाँकि ये पहली बार नहीं हो रहा कि आखिरी मौके पर योग्य व्यक्ति का टिकट काटकर बाहरी या पैराशूट कैंडिडेट को टिकट दे दिया गया हो । हर चुनाव में कमोबेश यही चीजें होती आई हैं और बिहार की राजनीती ने पिछले एक साल में जैसे रंग दिखाए हैं उस लिहाज से इसपर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए ।
पिछले विधान सभा चुनावो में ही हमारे जिले के एक नेता, जो संगठन में ठीक-ठाक पद पर थे और पार्टी सुप्रीमो के स्वजातीय भी थे, उन्होंने टिकट खरीदने के लिए 20 लाख रुपये से अधिक दिया था । समय के साथ महंगाई भी तेजी से बढ़ा है, उस हिसाब से ये आंकड़ा 50 तो पार कर ही गया होगा । गठबंधन में छोटी पार्टियो के लिए 2-4 सीटें इसलिए ही और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं । अपेक्षाकृत नई व छोटी पार्टियों के नेता बड़े गठबंधन का सिंबल बेचकर अच्छी-खासी कमाई कर लेते हैं । गैर सुप्रिमो कल्चर वाली पार्टियों की स्थिति इस मामले में थोड़ी अच्छी होती हैं क्योंकि तब निर्णय कई स्तरों पर होता है और ऐसे मामलो में स्थानीय सांसद की भूमिका अहम हो जाती है । बेनी प्रसाद वर्मा ने अगर महंगाई के हिसाब से खुद को अपडेट किया होगा तो जरूर बता देंगे कि किसी संसद सदस्य के लिए 50 लाख रुपए की रकम बड़ी नहीं होती । अतः अमूमन सांसद अपने करीबियों,कार्यकर्ताओ,परिजनों,परजीवियों को टिकट दिलवा देते हैं । हालाँकि फिर भी इन पार्टियो में टिकट बिक्री अपवाद नहीं होती ।
वंशवाद लगभग हर पार्टी में हावी है । इसलिए क्षेत्रीय पार्टियो के सुप्रीमो, मुख्य नेता तथा राष्ट्रीय पार्टियो के दूसरे दर्जे के नेता इसका खुल कर विरोध नहीं करते । कई मामलो में योग्य लोगो का टिकट इसलिए भी काटा जाता क्योंकि वर्तमान में सक्रिय लोग नहीं चाहते कि नए लोग राजनीत में आये । भविष्य तथा परिजनों को ध्यान में रखकर भी कई सीटो पर कमजोर या हार जाने वाले प्रत्याशी दिए जाते हैं । अक्सर उम्र काट चुके नेता दबाव बनाकर तथा मोल भाव करके बेटे-बेटियों के लिए जुगाड़ कर ही लेते हैं। दलबदलू नेताओ, मंत्रियो, विधायको की भी कई मामलो में यही शर्त होती है कि टिकट उनके बजाय उनके परिजनों को मिले ।
वैसे अगर आपको मांझी, नरेंद्र सिंह, अश्विनी चौबे, सीपी ठाकुर जैसे दर्जनों नेताओ के बेटो, लालू, कुशवाहा जैसो के परिजनों और पासवान जैसे नेता के पुरे खानदान के चुनाव लड़ने पर आप्पति तथा आश्चर्य नहीं होता तो समझ लीजिये कि हम इसके आदी हो चुके । धीरे-धीरे ही सही लेकिन परिवारवाद अब लोकशाही और राजसत्ता में सामान्य तथा सहज स्वीकार्य हो गई है !
बिहार चुनाव में अब बमुश्किल 20 दिन बचे हैं पर हर तरफ और सभी पार्टियों से टिकट बंटवारा में हुई अनियमितताएं सामने आ रही हैं । हालाँकि ये पहली बार नहीं हो रहा कि आखिरी मौके पर योग्य व्यक्ति का टिकट काटकर बाहरी या पैराशूट कैंडिडेट को टिकट दे दिया गया हो । हर चुनाव में कमोबेश यही चीजें होती आई हैं और बिहार की राजनीती ने पिछले एक साल में जैसे रंग दिखाए हैं उस लिहाज से इसपर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए ।
पिछले विधान सभा चुनावो में ही हमारे जिले के एक नेता, जो संगठन में ठीक-ठाक पद पर थे और पार्टी सुप्रीमो के स्वजातीय भी थे, उन्होंने टिकट खरीदने के लिए 20 लाख रुपये से अधिक दिया था । समय के साथ महंगाई भी तेजी से बढ़ा है, उस हिसाब से ये आंकड़ा 50 तो पार कर ही गया होगा । गठबंधन में छोटी पार्टियो के लिए 2-4 सीटें इसलिए ही और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं । अपेक्षाकृत नई व छोटी पार्टियों के नेता बड़े गठबंधन का सिंबल बेचकर अच्छी-खासी कमाई कर लेते हैं । गैर सुप्रिमो कल्चर वाली पार्टियों की स्थिति इस मामले में थोड़ी अच्छी होती हैं क्योंकि तब निर्णय कई स्तरों पर होता है और ऐसे मामलो में स्थानीय सांसद की भूमिका अहम हो जाती है । बेनी प्रसाद वर्मा ने अगर महंगाई के हिसाब से खुद को अपडेट किया होगा तो जरूर बता देंगे कि किसी संसद सदस्य के लिए 50 लाख रुपए की रकम बड़ी नहीं होती । अतः अमूमन सांसद अपने करीबियों,कार्यकर्ताओ,परिजनों,परजीवियों को टिकट दिलवा देते हैं । हालाँकि फिर भी इन पार्टियो में टिकट बिक्री अपवाद नहीं होती ।
वंशवाद लगभग हर पार्टी में हावी है । इसलिए क्षेत्रीय पार्टियो के सुप्रीमो, मुख्य नेता तथा राष्ट्रीय पार्टियो के दूसरे दर्जे के नेता इसका खुल कर विरोध नहीं करते । कई मामलो में योग्य लोगो का टिकट इसलिए भी काटा जाता क्योंकि वर्तमान में सक्रिय लोग नहीं चाहते कि नए लोग राजनीत में आये । भविष्य तथा परिजनों को ध्यान में रखकर भी कई सीटो पर कमजोर या हार जाने वाले प्रत्याशी दिए जाते हैं । अक्सर उम्र काट चुके नेता दबाव बनाकर तथा मोल भाव करके बेटे-बेटियों के लिए जुगाड़ कर ही लेते हैं। दलबदलू नेताओ, मंत्रियो, विधायको की भी कई मामलो में यही शर्त होती है कि टिकट उनके बजाय उनके परिजनों को मिले ।
वैसे अगर आपको मांझी, नरेंद्र सिंह, अश्विनी चौबे, सीपी ठाकुर जैसे दर्जनों नेताओ के बेटो, लालू, कुशवाहा जैसो के परिजनों और पासवान जैसे नेता के पुरे खानदान के चुनाव लड़ने पर आप्पति तथा आश्चर्य नहीं होता तो समझ लीजिये कि हम इसके आदी हो चुके । धीरे-धीरे ही सही लेकिन परिवारवाद अब लोकशाही और राजसत्ता में सामान्य तथा सहज स्वीकार्य हो गई है !
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