डायरी: गाँव से दूर होते गाँव.

इसबार चौक से घर की ओर जाने वाली सड़क चौड़ी हो गई थी, पत्थर बिछा दिए गए थे, बस पिचिंग बाकी थी... यादों का एक और हिस्सा दूर जा रहा था। गाँव हर बार, हर छुट्टी में, कुछ नयापन लिए होता है। इसमें कुछ अनूठा नही है, मगर यादों का परत दर परत धुंधलाना द्वंद्वों को जन्म देता है। ये बदलाव स्वयं भी तो द्वंद्वों से खाली नही हैं। 

जिस सड़क के बनने में मैं अपने जाते हुए यादों को देख रहा था, वही गाँव के सैकड़ो लोगों के लिए राहत लिए थी कि अब वो बरसात में भी अपनी गाड़ी लेकर निकल पाएँगे, फिसलन का डर नही होगा... दूसरी तरफ से आती हुई गाड़ी को देख सौ मीटर पहले ही नही रुक जाना होगा... मगर मेरा क्या! मैं तो देख पा रहा था, उस सोलिंग को जिसे मैं आज बाइस वर्षों से अधिक से देख रहा था, उसे जिसे इस गाँव के लोगों ने और कितने वर्षों पहले से देखा होगा... जिसके साथ गाँव की दो पीढ़ियाँ खप गई... दो नई पौध जवान हो गई... 

पीढ़ियों के इस सफर में जाने कितना कुछ बदल गया... पैदल और बैलगाड़ी पर जाने वाली बारातें गाड़ियों के संख्या में सिमट कर रह गईं, साइकिल पर ससुराल से चमकता हुआ लौटकर आने वाला दूल्हा चमक-दमक में न जाने कहाँ खो गया! कुछ चीजें नही बदली हैं मगर, गांव आज भी जल्दी सो जाता है...उसके बाद किसी रात एक बजे के बाद अश्लील भोजपुरी गानों के बजाए किसी शादी से आती हुई चारों भाइयों(दशरथ पुत्रों) को गाली(उलाहना) देती कोई गीत कानों में घुलती है तो मानो एक ढांढस सा मिलता है मन को... नही, कम से कम इस पीढ़ी भर गाँव की आत्मा उनमें ज़िंदा है...

वर्ना इनके बाद कौन जानेगा कांख में बस्ता दबाए सात किलोमीटर दूर स्कूल जाना क्या होता था! लौटते हुए चैत के धूप भरी दुपहरी में किसी पेड़ का टिकोला लूटना क्या होता था! उन यादों की तो स्मृतियाँ भी शायद नही होंगी। गाँव का स्कूल इसबार से हाई-स्कूल हो जाएगा। उस दो मंजिले भवन के नीचे टूटे खपरैल कमरों को मैं मिस करने लगा हूँ। हालांकि कभी वहाँ पढ़ने का मौका नही लगा फिर भी... तब के हेडमास्टर मुझ से बड़ा स्नेह रखते थे, तीन साल का था मैं, लगा कि मुझे भी स्कूल जाना चाहिए, मम्मी ने एक बस्ता सिल दिया... घर से ही एक बोरा उठा लिया... एक स्लेट, एकाध टूटी पेंसिलें, चिथरी सी एक कॉपी, मनोहर पोथी और अक्षर वाली कुछ किताबें; इससे ज्यादा कुछ चाहिए था क्या? उनके साथ ही स्कूल जाने लगा... कभी बोरे पर बैठता, कभी उनके मेज के सामने लगी कुर्सी पर... दस दिन बीते होंगे कि मेरा नाम एक नए पब्लिक स्कूल में लिखवा दिया गया! हो गई ये कहानी खत्म... वहाँ के लोग वहीं छूट गए...

अब अधिकतर वो लोग रिटायर हो गए हैं... उनके स्थान पर नए वाले मास्टर आ गए हैं, नियोजित वाले... वो लोग कर्मठ निश्चित थे, लेकिन पढ़ाते कैसा थे मुझे नही पता, लेकिन इसका ये अर्थ कत्तई नही कि और लोगों की तरह मुझे ये कहने का हक़ नही कि अबके मास्टरों में पहले वाली बात नही रही... ये एक ऐसी पंक्ति है जिसे आप अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए कहीं भी चिपका सकते हैं!

खैर, बात तो पहले वाली सचमुच नही रही... इन्हीं दिनों एक दोपहर घर के पीछे जाकर बैठ गया था... रिटायर होने के बाद बाबा अक्सर गर्मियों में वहीं बैठा करते थे, पेड़ों के बीच...खेतों से होकर आने वाली वो हवाएँ जानी-पहचानी सी  खुशबू लिए थीं... मैं अपने स्मृतियों में पंद्रह साल पीछे लौट गया था... अप्रैल का ये महीना अमूमन कटनी-दौनी का होता है... दस अप्रैल के आस-पास ही कोई तारीख रही होगी, स्कूल खुलने में अभी एक-दो दिन बचे थे। उस साल बाबा के साथ पहली बार मैं खेतों में दौनी(फसल कटने के बाद अनाज निकालने की प्रक्रिया) कराने चला गया था। यकीन मानिए खाली हो चुके खेतों में जब भूसे के ढेर और अनाज के बोरों के बीच एक किसान ढलते सूरज की पीली रोशनी में खड़ा होता है, तब वो दृश्य चाहे खूबसूरत हो न हो, उससे संतोषजनक शायद कुछ नही हो सकता!

मगर इस दोपहर में महज यादें थी, चैत्र का महीना तो था, कोयली भी गाती थी। मगर बाबा नही थें, तो न उन खेतों के पीलेपन में कोई रस था... न नई-नई आई गर्मी में। अभी बाबा होते तो तरह-तरह के जुगत करवाते... सोलर से जोड़कर पंखे चलवाते, गर्मी से परेशान हो बार-बार जेनरेटर चलाने को कहतें... काश कि मैं उनको बता सकता उनके जाने के बाद हमारा गाँव कितना बदल गया है... अब इतनी बिजली आती है कि दोनों ही जेनरेटर; और जो दो सोलर प्लेट उनके पंखों के लिए थें, आज घर और छत के कोनों में पड़े भर रहते हैं। सच है कि जो जड़ हैं वो चेतन से ही हैं। गाँव इसे बखूबी समझता है...

सिर्फ बिजली ही नही, कई चीजें हैं जो गाँव मे बदल गई है। इस गाँव पर पिछले वर्षों में शहर हावी हो चला है... गाँव उसमें खोता चला जा रहा हो जैसे। जाने मुझे ये कहने का अधिकार है कि नही, क्योंकि इस गाँव से मैं वर्षों पहले पलायन कर चुका; और जिसे मैं गाँव पर शहर का हावी होना कह रहा हूँ, वो गाँव के लोगों को आधुनिक सुविधाएं मिलने जैसा है! अब यहाँ पाइपलाइन से नल का पानी भी आता है। जब पहली बार इस पर काम हो रहा था तो ये फिजूल लगा था... कल और कुएं वाले गांवों को नलों से क्या मतलब... मगर कल कम हो गए, कुएं गायब हो गए; और नल ने अपनी जगह बना ली है... तकनीक से लेकर संसाधन तक अब इनके पहुँच में हैं... होना भी चाहिए, एक जोड़ी अच्छे कपड़ों के लिए चालीस किलोमीटर जाना ठीक भी तो नही। इन सबपर गाँवों का भी उतना ही अधिकार होना चाहिए जितना किसी और का... मगर इतने के बाद ये गाँव नही रह जाएंगे, और चाहे जो हो जाएं!

इस बार की ये छुट्टी चार-छः-आठ दिनों की होनी थी, जो बिना किसी ठोस योजना के बढ़ती ही जा रही है... गाँव-घर में कैद होने का ऐसा मौका बड़े दिनों बाद लगा है, तो गाँव की ही तरह घर मे भी बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे... बच्चे होली के बाद चले गए... बड़े से परिवार के बस गिनती के लोग यहाँ रह गए... मगर घर के कबूतरों को मानो उनकी कमी से फ़र्क़ नही पड़ता... घर के पीछे उनके लिए जो घर बना है, वो अब उसमें नही जाते... लेकिन बढ़ते-बढ़ते घर के ही बीस से अधिक वेन्टीलेटर्स पर उन्होंने अपना अधिकार जमा लिया है...

तमाम बदलावों के बीच बहुत कुछ ऐसे भी हैं जो जस के तस हैं... दरवाजे पर खड़े आंवले का वो पेड़, जिसकी उम्र मुझ से दोगुनी हो चली है, हर पतझड़ के बाद लगता है कि इस बार तो ये वापस नही आएगा... मगर दस दिन भी नही लगते उसे वापिस हरा होने में! जीवन की उम्मीद कूट-कूट कर भरी है उसमें... इस लॉकडाउन ने तकनीक को काफी बढ़ाया है, मगर कुछ भी कहाँ बदला है। दस साल पहले ब्रॉडबैंड के 600 एमबी इंटरनेट में ही मैं महीने भर मेरिटनेशन जैसे कुछ प्लेटफॉर्म्स यूज किया करता था, आज अनलिमिटेड इंटरनेट के कारण विकल्प बस बढ़ गए हैं। गर्मी की छुट्टियों में सोशल नेटवर्किंग बढ़ ही जाती है, तब के ऑरकुट के सीमित स्पेस को आज व्हाट्सएप वगैरह ने रिप्लेस भर कर लिया है!

मगर तमाम बातों में सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि अब गाँव में शोर तो है, मगर इसके लोग नही हैं... लोगों में प्रेम व सामूहिकता भी कम हो गई है... ये ऐसा मौका था कि जो आने वाले थे, सब आ गए... जो अब भी नही आएं, वो शायद अब कभी नही आएंगे... पलायन कई स्तरों को पार कर अब स्थाई हो चला है... परिवार सारे अधूरे हो गए हैं; और अब हम ये मान सकते हैं कि कम से कम एक पूरी पीढ़ी तो ऐसी हो ही गई जो गाँव से पूरी तरह कट गई है!

शायद गाँव चाहकर भी उन्हें वापस नही बुला पाएगा... स्याह पक्षों को देखें तो उनके आने का कोई कारण भी नही... भला क्यों लौटकर आएं वो यहाँ? मगर गाँव के ये आदर्श हैं कि पंजाब बंद होने के कारण मजदूर अगर वहाँ नही जा सकें इस कटनी में तो उन्हें यहाँ भी काम मिल रहा है... फिर क्यों जाते हैं वो पंजाब?

खैर छोड़िए, कितनी ही बातें हैं, सबका सार ये कि गाँव अब गाँव नही हैं... यकीन न हो तो सोचिए कि किसी शाम कोई भटका हुआ राही आपके यहाँ आए, आप उसे घर मे रखेंगे? अगर नही तो...! क्योंकि हमने बचपन मे ऐसे कितने ही अनजानों को अतिथि बनते देखा है!

Comments

  1. लुई विर्थ की एक अवधारणा है, नगरवाद की, urbanism is a way of life नामक पुस्तक में।।
    आज उसका व्यवहारिक रूप आपके इस लेख के रूप में पढ़ा मैंने।
    आत्मीयता ही गांव का प्राण है, ऐसी आत्मीयता जो जान पहचान की मोहताज न हो,,,,,, यह आत्मीयता बनी रहे तो लाख बदलावों के बाद भी गांव बनें रहेंगे 🙏👌

    महेंद्र पांडेय

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  2. बहुत बढ़िया लिखा गया है। आंखों देखी स्थिति को हूबहू उकेर दिया गया हो जैसे। शिक्षा, समाज, समर्थता पर प्रकाश पठनीय है। परिवारजन को उल्लेखित करना भावुक बनाया है इसे। शिक्षकों पर आपकी बात आपके विस्थापन की अवस्था को स्पष्ट करता है। लिखते रहें। शब्दों पर आपकी पकड़ सराहने योग्य है।

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