कुछ सूक्ष्म प्रश्न।
शिव और शिव की शक्ति स्थापित व निर्विवाद हैं। मगर शिव से शक्ति हैं, या शक्ति से शिव; इसपर कल्पनाएँ और चर्चाएँ महज हो सकती है... शास्वत सत्य तो बस यही है कि शिव और शक्ति कभी पृथक हो ही नही सकते... न शिव अपनी शक्ति से; न शक्ति शिव से... मगर ये संसार 'शिव और उनकी शक्ति' जैसे उक्ति ही क्यों प्रयोग करता है, कभी 'शक्ति और उनके शिव' क्यों नही कहता... शायद इसलिए क्योंकि शिव को ही हर बार अपने शक्ति की जरूरत होती है, उनकी शक्ति; शक्ति तो स्वयं में ही पूर्ण हैं...
मगर तब जबकि प्रत्यक्ष यही है कि तेंतीस कोटि देवताओं, दानवों या चौरासी लाख योनियों में सदा शक्ति से ही शिव का तत्व है! फिर क्यों हर युग में शक्ति ही सीता या द्रौपदी बनती है? सत्य है कि माता कैकेयी भी शक्ति की ही छवि थी, परन्तु ये क्यों होता है कि इस जीवन में शक्ति भी शक्ति के विरुद्ध ही दृष्टिगोचर होती है। यह भी सत्य है कि भले राम और युधिष्ठिर का दुःख अपने शक्तियों से कम न हो, परन्तु क्यों हर बार शिव के घुटन में शक्ति का ही वन-गमन होता है... क्यों कभी शिव की अग्नि परीक्षा नही होती?
शायद इसलिए क्योंकि ये प्रकृति भी भली-भांति जानती है कि सृजन का प्रस्फुटन शक्ति से ही ही सकता है... प्रकृति क्षमता से अधिक किसी को कुछ नही देती, कष्ट भी नही... शायद इसलिए सहनशक्ति के अवधारणा में भी 'शक्ति' ही हैं, शिव नही... ये स्थापित है परम-स्नेह और परम-प्रलय का सम कहीं है तो शक्ति में है... वो काली भी हैं, दुर्गा भी, पार्वती भी, कौशल्या भी और त्रिजटा भी... चाहे वो जिस रूप में हों, ममत्व और सत्य का सागर होती हैं... जो जितना योग्य होता है, उसके मापदण्ड भी उतने उच्च होते है... छल हो, बल हो, पाखण्ड हो या मोह हो; हर पैमाने पर उन्हें अधिक परखा जाता है... क्योंकि वो खुद जब तपकर कुंदन होंगी; तभी शायद परम्-सत्व का सृजन एवं स्थापना कर पाएंगी!
और हो न हो ये तमाम लीला उन्होंने खुद ही खुद के लिए रची हो, क्योंकि वो जानती हैं कि विजय श्री उसी के माथे बंधेंगी, जिसे वो चाहेंगी... वर्ना, वो ये भली-भांति जानती हैं कि जबतक उनकी इच्छा नही होगी, स्वयं परमशिव भी अपने चिर-निद्रा से नही जाग सकते! फिर उन्हें भला कौन कुछ बताएगा?
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