साथी ये याद रहे : हमारी आँखों की नमी पर अधिकार उनका है!

...कई दिन बड़े बोझिल से होते हैं, ऐसे ही दिनों में कुछ कहानियाँ होती हैं, आप जानते हैं वो आपको हर बार झकझोरेंगी, रूलाएँगी... आप मगर फिर भी उन्हें पढ़ते हैं... मैं सोने की तैयारी कर रहा हूँ... मेरे टूटे हुए फ़ोन में गाना बज रहा है, 'साथी ये याद रहे, एक साथी और भी था...' न चाहते हुए मैं फिर से उन यादों में लौट गया हूँ...

हम भारतीय अपने याददाश्त के मामले में बड़े कच्चे होते हैं। मगर अपने पिता के पार्थिव शरीर को सलामी देते समय उनके बटालियन का युद्ध-घोष करती हुई वो बच्ची शायद आपको याद हो? नही, 'उरी' फ़िल्म वाली नही... अल्का राय, कर्नल मुनीन्द्र नाथ राय की ग्यारह वर्षीय वो बच्ची, जो ये अच्छे से जानती थी कि 27 जनवरी 2015 का वो दिन उसके लिए क्या लेकर आया था!

अभी एक दिन पहले ही गणतंत्र दिवस के मौके पर 42 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल राय को युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था। कर्नल बड़ा अधिकारी होता है। पूरे बटालियन को कमांड करता है। शिव अरूर और राहुल सिंह अपने किताब में कर्नल संतोष महादिक के बच्चों के लिए लिखते हैं कि उन्हें आश्चर्य होना चाहिए था कि क्यों एक कर्नल होकर भी उनके पिता खुद हर ऑपेरशन के लिए जाते हैं, मगर उन्हें कभी ऐसा महसूस नही हुआ। 41 राष्ट्रीय राइफल्स के 38 वर्षीय कर्नल महादिक उस वर्ष शहीद होने वाले दूसरे कमांडिंग ऑफिसर थे।

17 नवम्बर 2015 की तारीख थी। एकबार फिर कर्नल महादिक अपने टीम के साथ निकल पड़े थे। भारतीय सेना अक्सर कश्मीर में मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों को लेकर कटघरे में खड़ी की जाती है। कर्नल महादिक उसी सेना के एक अधिकारी थे, वो चाहते थे कि कश्मीरी पढ़ें... आगे बढ़ें... दुनिया से जुड़ें... वो जानते थे कि अगर इस समस्या का समाधान कहीं है तो शिक्षा और विकास में है। उन्होंने इसके लिए कुपवाड़ा में 'ऑपेरशन सद्भावना' नाम से एक मुहिम की शुरुआत की थी। वहाँ के बच्चों को वो योग जैसी चीजें सिखलाते थे। उनके ऐसे कदमों से कश्मीर के 'हितैषी' चिंतित रहते थे। 

खैर, उस दिन का कुपवाड़ा के दुर्गम पहाड़ियों में कर्नल महादिक का वो आपरेशन आखिरी ऑपेरशन रहा। सीने पर गोली खाकर कर्नल शहीद हो गए थे। उनके बलिदान के बाद उनकी पत्नी स्वाति महादिक ने तय किया था कि वो फौज में जाएंगी। एसएसबी के मेरिट लिस्ट में आने के बाद स्वाति महादिक ने इंडिया टुडे से कहा था, 'मेरे दिमाग मे अब कुछ नही है, न खुशी, न ग़म, मुझे याद है, संतोष कहा करते थे तुम में हमेशा 'तृप्ति' का भाव होना चाहिए... अब मुझे जीने का कारण मिल गया है, मेरे दर्द अब कम हो रहे हैं.' कैसा रहा होगा वो व्यक्ति! एक सैनिक के विषय मे कहा जाता है कि वो बहुत सोचता नही है, सैनिक सच्चे अर्थों में कर्मयोगी होता है, फिर कर्नल ऐसी बातें क्यों करते होंगे?

और क्या मनोदशा रही होगी उस महिला की, पति की शहादत जिस फौज में हुई हो, वहीं वापस जाना चाहती है... कहती भी क्या है! उन्होंने अपने पति को खोया था, बच्चों ने पिता को, मगर उन्हें इस बात की चिंता अधिक थी कि देश की सेना ने अपने एक बहादुर अधिकारी को खो दिया। वो आईने के सामने खड़ी होकर खुद में कर्नल संतोष को देखा करती थीं!

कितने अजीब लोग होते हैं ये, पूछिये उस ग्यारह वर्ष की बच्ची से कि इतने कम उम्र में उसने इतना सब कैसे सीख लिया था। तभी कह रही थी कि उसके पिता चाहते थे कि वो अपने जीवन मे जो मन हो वो करे... डॉक्टर बनना जरूरी नही है... जो मन हो वो बने... यू आर द फ्यूचर ऑफ नेशन... तीन भाइयों में सबसे छोटे कर्नल राय के बड़े भाई भी उसी 9 गोरखा राइफल्स में अधिकारी हैं, दूसरे भाई सीआरपीएफ में! 

उनकी वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए कर्नल राय और कर्नल महादिक दोनों को ही शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया, यह शांति काल में दिया जाने वाला तीसरा सर्वोच्च सम्मान है। यहाँ मुझे न चाहते हुए भी बिहार के तब के मंत्री भीम सिंह की याद आ रही। एक शहीद के घर जब बिहार सरकार के तरफ से कोई नही गया था और उनसे इसपर सवाल किया गया तो उनका जवाब था, 'सेना में तो लोग मरने के लिए ही जाते हैं।' ऐसी बातें भी होती हैं कि गरीब घरों के बच्चे जल्दी रोजगार के लिए और आर्थिक मजबूरी सेना में भर्ती हो जाते है! ठीक भी कह रहे थे मंत्री जी, सेना में लोग मरने के लिए ही जाते हैं... और मरने के इस जुनून में न उन्हें कोई सम्मान दिखता है, न मेडल। कुछ होता है तो सर्वोच्च बलिदान का वो जज्बा और मातृभूमि और इसके लोगों के लिए उनकी भक्ति। वर्ना क्या पड़ी थी 44 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर मुकुन्द वर्दराजन को कि जब उन्हें पता चला कि उनके सीओ कर्नल डबास 2013 में उनके वीरता के लिए सम्मान की सिफारिश करने वाले थे, उन्होंने जाकर अपने बदले अपने दो सिपाहियों के लिए सम्मान की अनुशंसा कराई, 'सर बहुत बढ़िया काम किया दोनों ने, वो अवार्ड के हकदार हैं' दोनों को सेना मेडल मिला था।

मगर शायद ही खुद कर्नल डबास ने भी ये सोचा होगा कि अगली बार ऐसे किसी अनुशंसा को रोकने के लिए उनका 'मैडी' नही होगा! कर्नल डबास ने मेजर के शहादत के बाद उनकी पत्नी को लिखा था, 'जब भी उसका जिक्र आएगा, मैं शान से कहूंगा वो मेरा सर्वश्रेष्ठ सैनिक था....हम सब इस ग़म से बाहर आएंगे, और जब ये खत्म होगा तब सिर्फ एक चीज बचेगा-गर्व!' हो भी क्यों न, पंद्रह दिन पहले अपना 31वां जन्मदिन मनाने वाले उस नौजवान को तीन गोली लगने के बाद भी चिंता थी तो अपने साथी सिपाही विक्रम की, उसने इतने के बाद भी अल्ताफ वानी को खत्म किया। 'वी गॉट हिम, बट वी लॉस्ट विक्रम!' उसे अपने घावों की फिक्र नही थी, एक अधिकारी और एक सिपाही का ऐसा सम्बन्ध सेनाओं में ही हो सकता है। हाँ, एक बात तब मेजर ने कही थी, 'आई कैन नॉट बिलीव, दिस हैपेन्ड टू मी!' कितना भरोसा रहा होगा उन्हें खुद पर! मरणोपरांत उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया, उनके साथी सिपाही विक्रम को शौर्य चक्र से!

आज फिर 21 राष्ट्रीय राइफल्स ने अपने चार सैनिकों को खोया है। कर्नल एमएन राय जब एनकाउंटर में थे तब एक स्थानीय परिवार ने उनसे कहा था कि आतंकी समर्पण करना चाहते हैं। भारतीय सेना हर किसी को आखिरी वक्त तक मौका देती है। फायरिंग रोक दी गई थी, और बातचीत के आड़ में मौका पाकर आतंकियों ने कर्नल और उनके साथ गए जम्मू कश्मीर पुलिस के एक जवान की जान ले ली। 

आज के घटना में भी ऐसी बात आ रही है कि स्थानीयों का संरक्षण आतंकियों को प्राप्त था। फिर भी हमारे सेना ने उनके द्वारा बंधक बनाए गए लोगों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। एक तारीख को ही अपनी बेटी का बारहवां जन्मदिन मनाने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा कश्मीर में सेवा के दौरान दो बार सेना मेडल से सम्मानित होने वाले इकलौते अधिकारी थे। उनके साथ शहीद होने वाले मेजर अनुज सूद, नाइक राकेश कुमार, लांस नाइक दिनेश सिंह और जम्मू कश्मीर पुलिस के सब इंस्पेक्टर शकील काज़ी भी थे! स्वाति महादिक ने सच कहा था। हर सैनिक के साथ सेना अपने जांबाज खोती है... कर्नल शर्मा से 20 साल पहले भी 21 राष्ट्रीय राइफल्स ने अपने कमांडिंग ऑफिसर कर्नल राजेन्द्र चौहान को खोया था!

मेजर सूद के पिताजी जो खुद भी ब्रिगेडियर थे, कह रहे थे, 'उसने सर्वोच्च बलिदान किया है, ये उसके ट्रेनिंग और ड्यूटी का हिस्सा है, उनकी शादी तीन-चार महीने पहले ही हुई थी और मुझे उनके लिए बुरा लग रहा!' ये लोग इतने कठोर कैसे हो सकते हैं? ये इंसान नही होते क्या? सैनिकों की ट्रेनिंग होती है, उनके परिवार वालों की भी साथ मे हो जाती है क्या?

युद्ध और द्वंद्व किसी भी समाज के लिए बुरे हैं। लेकिन जब युद्ध सतत और अपरिहार्य हो जाए तो एक सैनिक के पास विकल्प नही बचता। आधुनिक शिक्षा के तर्क हमें वैचारिक स्तर पर प्रभावित तो करते हैं, मगर व्यवहारिक समाधान नही देते। हमारे युवा युद्ध को बुरा तो मानते हैं मगर इसका समाधान नही जानते। इसलिए भी वो कई बार समस्या को ही जायज ठहराते हुए उसके खेमे में जा खड़े होते हैं।

ऐसे समय में हमें जरूरत है कर्नल महादिक जैसे युवाओं की, जो जीवन का गूढ़ तत्व को भी जानता है, मगर वास्तविक समस्याओं से भी नही भागता। जो कश्मीरियों को शिक्षित करने की पहल भी करता है, मगर आतंकियों को सबक भी सिखाता है, और इतना सब वो करता है 38 वर्ष के उम्र में! 

कर्नल एमएन राय का आखिरी व्हाट्सएप्प स्टेटस था, 'ज़िंदगी में बड़ी शिद्दत से निभाओ अपना किरदार, कि पर्दा गिरने के बाद भी तालियाँ बजती रहें...' कई बार इन सब पर सोचते हुए लगता है कि हम स्थितप्रज्ञ हो गए... बिल्कुल कर्नल राय के उस छोटे बेटे की तरह, जो न अपनी बड़ी बहन की तरह रो रहा था, न चिल्ला रहा था... बस खामोश था, 6 साल के उस बच्चे की वो तस्वीर जिसमें वो अपने पिता को सलामी दे रहा होता है, देखकर कलेजा निकल आता है... फिर कहने-सुनने को कुछ नही बचता, उसे ये समझ भी नही थी कि क्या हुआ है, अपने चेहरे की चंचलता ओढ़े वो बूत बना खड़ा था बस!

...और इन सब के बाद मुझे लगता है कि जो ये सोचते हैं कि हम अपने शहीदों को उनके हिस्से का श्रेय नही देते, उन्हें शायद ये आभास नही कि जाने वाला हर सैनिक अपने आगे हज़ारों ऐसे लोगों की भीड़ छोड़ जाता है जो अगला कर्नल महादिक, कर्नल राय, मेजर वर्द्रराजन बनने को तैयार होती है, कोई कैप्टन बत्रा बनना चाहता है, कोई कैप्टन मनोज पांडेय तो कोई शहीद अब्दुल हमीद... ऐसी अभिलाषा लिए जबतक ऐसे लाखों पुष्प रहेंगे, हमारे जेहन में हमारा हर बलिदानी होगा, उनकी कहानियाँ होंगी... जो जब चाहे हमारी आंखें नम कर जाएंगे, और हम उन्हें शायद ही रोक पाएँ! आखिर हमारी आंखों के इस नमी पर पहला अधिकार जो उनका है!

Colonel Munindra Nath Rai's son paying last tributes to his martyred father.

Comments

  1. रोते हुए गर्व भाव से पढ़ा हूं,,,,,,और चकित भी हूं कि हम इतना जागरुक क्यों नहीं है अपनी सेना के बारे में,,,,

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