क्योंकि फिर कोई फ़िरोज़ कभी संस्कृत नही पढ़ेगा!
(दो विश्वविद्यालय है. दो मसले हैं. दोनों पर बात होनी चाहिए. मैं दोनों पर एकसाथ ही बात करना चाहता था. लेकिन बात लंबी चली जाती. हो सकता है मेरे ये विचार पॉलिटिकली करेक्ट न हों. मगर वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से मेरी यही समझ बनी है।)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के नाम में हिन्दू क्यों है? इसके पीछे कई कहानियाँ है, कितने ही पक्ष हैं, बहुत सारे तथ्य भी हैं, जाहिर है इसका एक भावुक पक्ष भी है। अलग-अलग मौकों पर इन्हें अपने सहूलियत के हिसाब से उसी भावुकता के चासनी में लपेट कर परोस दिया जाता है। तथ्यात्मक बातें मगर इस संदर्भ में कम ही होती है।
इस विश्वविद्यालय की संकल्पना क्यों की गई होगी, उसके मूल में क्या रहा होगा? उच्च शिक्षा का एक केंद्र बनाते समय उसे किसी सम्प्रदाय विशेष के नाम से जोड़ने का मकसद क्या रहा होगा? महामना मालवीय के प्रयासों, संघर्षों और सपनों के इस संस्था में उनके योगदानों के विषय मे आप जानते होंगे। मगर क्या आपको पता है कि महामना अपने सपनों का विश्वविद्यालय काशी में नही बल्कि अपने गृह नगर प्रयाग में बनवाना चाहते थे।
दरअसल मालवीय जी के अलावा कुछ और लोग थें जिनका उद्देश्य उनके जैसा ही था। काशी नरेश, दरभंगा महाराज के अलावा बसंती देवी भी इस दिशा में काम करना चाहती थीं। मालवीय जी से भी पहले उन्होंने 1898 में ही सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना भी कर दी थी। उसी सेंट्रल हिन्दू कॉलेज के परिसर से बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई। कला संकाय के उस भवन में एक हॉल स्वर्गीय बसन्ती देवी के नाम से भी है। समान लक्ष्य को लिए हुए कई लोगों के साथ आने से उस प्रतिकूल दौर में कार्य सुलभ होता, प्रयाग के स्थान पर काशी के चुनाव के पीछे कई कारणों में एक यह भी था।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मातृ-संस्था की संस्थापक बसन्ती देवी हिन्दू नही थीं, वो भारतीय भी नही थीं... जी, वो महिला थीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष एनी बेसेंट। वो भारतीय विद्याओं व ज्ञान को आगे लाना चाहती थीं और इसके लिए एक विश्वस्तरीय संस्थान बनवाना चाहती थीं। जिस विश्वविद्यालय के मूल में ही एक ऐसा व्यक्ति हो जिसका हिन्दू मत से दूर-दूर तक कोई संबंध नही था, क्या उसके पीछे कोई साम्प्रदायिक उद्देश्य हो सकता है?
महामना ने तब कहा था कि भारत सिर्फ हिंदुओं का देश नही है, यह मुस्लिमों, पारसियों और ईसाइयों के भी उतना ही है। वो मानते थे कि अलग-अलग सम्प्रदायों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में ही भारत की प्रगति निहित है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों से वो शैक्षणिक रूप से सर्वश्रेष्ठ होने के अलावा एक अच्छा व्यक्ति, राष्ट्रभक्त व परमात्मा(सत्य) के प्रति ईमानदार होने की अपेक्षा करते थे। यहां राष्ट्रभक्ति को अब की तरह संकुचित नही बल्कि तब के पैमानों पर देखा जाना चाहिए, जब देश पर विदेशी शासन था।
मगर फिर क्यों ऐसे आदर्शों वाले एक संस्था में एक मुस्लिम शिक्षक के नियुक्ति का विरोध हो रहा? क्या मालवीय जी इस स्थिति से खुश होते? (मालवीय जी का ही संदर्भ इसलिए क्योंकि उस संस्था को आप इस एक व्यक्ति से इतर नही देख सकते हैं।) क्यों जब ये विश्वविद्यालय सबके लिए होने की बात करता है तो उसमें एक मुस्लिम प्राध्यापक संस्कृत नही पढ़ा सकता? क्या वहाँ मुस्लिमों की नियुक्ति नही होती?
जबकि ऐसा नही है, स्थापना से अबतक इस विश्वविद्यालय में सैकड़ो मुस्लिम प्राध्यापक हुए होंगे, फिर क्यों मंदिर में शहनाई बजाने वाले बिस्मिल्लाह खान और रहीम व तुलसी के मित्रता के परम्परा वाले शहर के एक विश्वविद्यालय में एक मुस्लिम के नियुक्ति पर इतना बवाल मचा हुआ है? सब छोड़ भी दें तो राज्य(केंद्र सरकार) के पैसे पर चलने वाले एक संस्था में किसी को काम करने से कैसे रोका जा सकता है? तब, जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 खंड 2 में साफ प्रावधान है कि राज्य के अंतर्गत आने वाले किसी भी नियुक्ति में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नही होनी चाहिए।
डॉ० फ़िरोज़ खान की नियुक्ति विश्वविद्यालय के संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय में साहित्य विभाग में हुई है। इस विषय के अनेकों मूर्धन्य विद्वान जहाँ छात्र व प्राध्यापक रहे हैं, जाहिर है वहाँ नियुक्त होने वाले व्यक्ति के प्रतिभा और योग्यता पर कोई सवाल नही हो सकता। संस्कृत में जेआरएफ फ़िरोज़ पर ऐसी कोई बंदिश भी नही रही होगी कि वो संस्कृत ही पढ़ें, ऐसे में इस विषय का चुनाव निश्चित ही उन्होंने स्वतंत्र रूप से व अपने रुचि के आधार पर किया होगा। इसलिए उनकी अभिरुचि व निष्ठा का सवाल भी नही उठता। बगैर निष्ठा के किसी विषय मे बेहतर कर पाना जरा मुश्किल भी होता है।
लेकिन इन सबके बावजूद भी ये विरोध क्यों है? शंका नही कि ये विरोध निहित स्वार्थों व राजनीति से प्रेरित भी हो सकता है। मगर इसके पीछे तर्क क्या हैं? मुख्य बात ये है कि जिस संकाय में उनकी नियुक्ति हुई है वो हिन्दू विश्वविद्यालय के 'हिन्दू' के उदार व्याख्या पर फिट नही बैठता। विश्वविद्यालय का 'हिन्दू' जहां हिन्दू परंपरा, संस्कृति, विद्याओं और शिक्षा पद्धति से जुड़ा हुआ है, वहीं ये संकाय हिन्दू मत या पंथ से जुड़ा है। यहाँ जाने पर द्वार पर झुककर दंडवत प्रणाम करते हुए भवन में प्रवेश करने वाले लोग आपको दिख जाएंगे। चरण-स्पर्श का जो देशव्यापी अर्थ अब बना दिया गया है, उससे दूर ये संकाय आज भी चरण-स्पर्श को उसके पुराने अर्थों में ही लेता है। अपने हर कार्यक्रम में सरस्वती वंदना और मंगलाचरण करने वाले इस संकाय में जगह-जगह हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमा दीवार पर बनाई गई है। ये संकाय संस्कृत भाषा या विद्या तक सीमित नही है, अपितु उसके आगे हिन्दू मतों के कर्मकांड वाले पक्ष से भी सम्बद्ध है। हिन्दू पूजा पद्धति एवं आचरण से संबंधी तमाम शंकाओं का समाधान यहां से होता है। यहाँ से प्रकाशित बनारस पंचांग आज भी मानक है। इन सब बातों के कारण इस संस्था की स्थिति किसी धार्मिक पीठ जैसी हो जाती है। ऐसे में कल को वो मुस्लिम प्रोफेसर विभागाध्यक्ष, संकाय प्रमुख होंगे जैसे किसी तर्क को छोड़ भी दें तो क्या किसी गैर हिन्दू से इन तमाम चीजों के पालन की उम्मीद की जा सकती है?
खैर सवाल अब भी वही है, राज्य के पैसों पर चलने वाले एक संस्था में नियुक्ति में धर्म के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है? यहाँ एक चीज और समझना जरूरी है, वो संकाय राज्य से संचालित होने वाली कोई सामान्य संस्था नही है। भारतीय संविधान के द्वारा प्रदत्त मूलभूत अधिकारों में ही एक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी है। संविधान के अनुच्छेद 28 खंड 1 एवं 2 के अनुसार राज्य द्वारा संचालित किसी भी संस्था में धार्मिक शिक्षा नही दी जा सकती, मगर ऐसी संस्था अगर किसी न्यास द्वारा किसी ऐसे शिक्षा देने के लक्ष्य से ही स्थापित किया गया है, उसपर ये प्रावधान लागू नही होता। अनुच्छेद 26 खंड (a) में हर पंथ को अपने धार्मिक और पूण्य(चैरिटी) के उद्देश्य से संस्थाओं के स्थापना का अधिकार देता है।
अगला सवाल यह है कि क्या ये संस्था इन दो प्रावधानों के अनुसार एक धार्मिक संस्था है? केंद्र के एक कानून से स्थापित कोई संस्था धार्मिक संस्था कैसे हो सकती है? हिन्दू धर्म की ही तरह हिन्दू मत भी उदार रहे हैं। वो दीवारों पर लिखकर, ढिंढोरा पिटवाकर और पर्चे बंटवा कर अपना प्रचार नही करते. न वो दीन के कल्याण के नाम पर उनका परिवर्तन कराते हैं। जाहिर है, वो किसी पर कोई निषेध, प्रतिबंध भी अन्य मजहबों की तरह नही लगाते। मगर उदारता में भी एक न्यूनतम होता है, जिससे परहेज की अपेक्षा की जाती है। लेकिन इस मामले में वो न्यूनतम की दीवार भी नही है। पता नही किसलिए मगर इस संस्थान में ऐसे ही किसी दिन की कल्पना कर के दीवार पर लिखवा दिया गया था कि ये संस्था सिर्फ हिन्दू मत या उससे जुड़े अन्य मतावलंबियों, मसलन बौद्ध जैन, सिख, आर्यसमाजी आदि के लिए ही है। किसी अन्य मत को मानने वाले को वहाँ निषेध माना गया है।
स्थापना में उद्देश्यों में जब ये बातें थी, तब ऐसे में आज उस संस्था से जुड़े लोगों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किया जा सकता है क्या? क्या राज्य किसी संस्था को उसके उद्देश्यों के विपरीत उसे सेक्युलर बना सकता है? नही, क्योंकि यह उसके मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन होगा। हो सकता है कि विश्वविद्यालय आज राज्य के बनाए कानूनों से संचालित होता हो। लेकिन ये कानून स्थापना के उद्देश्यों के विपरीत नही हो सकते। क्योंकि कानून का सबसे बड़े पैमाने 'Justice, equity and good conscience' पर वो खड़े नही उतरेंगे। क्योंकि आज भले वो राज्य द्वारा स्थापित दिखता है, उसकी असल स्थापना मगर दूसरे कारणों से हुई थी।
एक तर्क यह भी हो सकता है कि अगर बीएचयू में ऐसे किसी चीज को सही ठहराया जा सकता है तो एएमयू में गैर-मुस्लिमों के नियुक्ति न होने व उनसे होने वाले भेदभाव का विरोध क्यों? लेकिन दोनों के आधार व कारण अलग हैं। वो यहाँ विषय भी नही।
मगर फिर ऐसे दौर में जब संस्कृत हर तरफ से परिष्कृत है, जब हिंदुओं ने ही संस्कृत को छोड़ दिया है, तब अगर किसी गैर-हिन्दू ने संस्कृत के लिए अपना जीवन तपा और खपा दिया, उसका सिला क्या उसे इस तरह मिलना चाहिए? उसे नियुक्त न किया जाता तो भी ठीक था, मगर अब यदि उसे बाहर किया जाएगा, या उससे दवाब दिलवा कर इस्तीफा ले लिया जाएगा तो ये कैसा न्याय होगा? तब तो उसके परिजनों का ये कहना ठीक ही होगा कि उन्होंने उसे संस्कृत पढाने के बजाए कोई छोटा कार्य भी कराया होता तो बेहतर होता!
ये बात उसके मूल अधिकारों की तो है ही, उससे भी आगे बढ़कर इसकी है कि आज उस व्यक्ति को चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने संदेह के नजरों से देखा जा रहा। सब छोड़कर उसने जिसे चुना, उसके प्रति ही उसके निष्ठा पर संदेह किया जा रहा। यह हिन्दू समाज के सहिष्णुता की परीक्षा तो है ही, उसके अलावा एक व्यक्ति के हौसले का, एक कौम के भरोसे का सवाल है। एक गलती, और फिर कभी कोई फ़िरोज़ संस्कृत नही पढ़ेगा, वो टूट जाएगा। ये गैर-हिंदुओं के हिंदुओं पर भरोसे की भी परीक्षा है। ये मसला उसे और कमजोर कर सकता है।
एक तरफ परंपराओं, आस्थाओं और पूजा पद्धति का सवाल है, (क्योंकि ये तय है कि वो संस्थान सिर्फ शैक्षणिक संस्था नही है) तो दूसरी तरफ एक व्यक्ति के जीवन का, उसके सम्मान का और उससे जुड़े एक बड़े संदेश का, आज वो व्यक्ति अगर चला गया तो कई डोर एकसाथ टूट जाएंगे। विश्वास का, प्रेम का, भरोसे का, विद्वता का, अधिकारों का.. कितना लिखा जाए, उसे चुनने वाले उन विशेषज्ञों का भी और अबतक के उसके श्रम का भी!
ये परिस्थिति विशेष है। जाहिर है, इसका समाधान भी सामान्य नही हो सकता। मालवीय जी का उद्देश्य उच्च शिक्षा के साथ मूल्यों के समावेश से छात्रों का चरित्र निर्माण था। जाहिर है उस विश्वविद्यालय में पूजा पद्धत्ति मात्र के कारण किसी को उसके अधिकारों से वंचित कर देना उनके मूल्यों के अनुरूप नही होगा। ये आधुनिक उच्च शिक्षा के किसी संस्थान में अपेक्षा भी नही की जा सकती। 'जस्टिस, इक्विटी एंड गुड कॉन्साइंस' का भी यही तकाजा है कि हर पक्ष के साथ न्याय हो। हो सकता है कि कुलपति बाहर से होने के कारण संस्था के आदर्शों से अनजान रहे हों। ऐसे में जब डॉ० फ़िरोज़ भी कह रहे कि उनकी नियुक्ति संस्कृत साहित्य पढाने के लिए हुई है, धर्मविज्ञान के लिए नही। क्यों न इसी विश्वविद्यालय के इसी परिसर के कला संकाय में जो संस्कृत विभाग है, जो सिर्फ संस्कृत के लिए है, उसमे एक रिक्ति लाकर उस स्थान पर उन्हें नियुक्त किया जाए? मैं नही जानता ये विचार कितना सही है, मगर इस परिस्थिति का इससे उचित समाधान मुझे नही दिखता...

बात आपकी सही है मित्र। लेकिन बात जोड़ना चाहूँगा मैं। इस विवादास्पद नियुक्ति पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। जिस कमेटी ने इस नियुक्ति पर मुहर लगाई है उस पर दूरदर्शिता की कमी और इसके सम्भावित कारण के आधर पर कड़ी कार्यवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में फिर कोई भी पदासीन किसी भी कारणवश अपने पद का क्षुद्र उपयोग करने से कतराए।
ReplyDeleteसुलझा हुआ मत 👌👌
ReplyDeleteस्पष्ट राय रखने हेतु कुमार भाई आपका धन्यवाद🙏