बीएचयू: वंश और विचार!

दिसंबर 22, 2019.
कहानी है, उसी बीएचयू की, महामना मदन मोहन मालवीय तब कुलपति थें। उनके पुत्र का भी नामांकन हुआ, विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए। सामान्य छात्रों की तरह उन्हें भी छात्रावास आवंटित हुआ, मगर उन्हें दो छात्रों के रहने वाला कमरा अकेले रहने के लिए दे दिया गया। इस बात की जानकारी जब मालवीय जी को हुई तो उन्होंने वार्डन से कहा कि उस कमरे में किसी दूसरे छात्र को भी रखा जाए। वार्डन ऐसा नही चाहते थें, उन्होंने कहा कि छात्रावास का संरक्षक होने के नाते इससे संबंधित फैसले लेने का उन्हें अधिकार है।' इसपर मालवीय जी ने जो कहा उसकी आज कल्पना भी मुश्किल है, उन्होंने कहा कि फिर एक पिता की हैसियत से वो अपने पुत्र का नामांकन रद्द करवाकर उसे प्रयाग ले जाएंगे।

बार-बार इस विश्वविद्यालय को देश के अन्य संस्थानों से अलग कहने के मूल में यही होता है कि ये संस्था अपने जड़ो में जितना समृद्ध और विशाल है उतना शायद ही कोई अन्य संस्थान। मगर हमारा स्वभाव है कि हम अपने आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आदर्शों से समझौता करने से नही कतराते। मालवीय जी नही चाहते थे कि उनके बाद उनके परिवार का कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय में कोई पद ग्रहण करे। ये बातें इतनी सामान्य हैं कि वहाँ चाय का ठेला लगाने वाला भी आपको बता देगा। हालांकि बाद में उनके पुत्र कुलपति भी हुए और वर्तमान में उनके पौत्र जस्टिस गिरिधर मालवीय कुलाधिपति हैं। ये नियुक्ति जब हुई थी तो अधिकतर लोगों को आश्चर्य हुआ था। आजादी से पहले सर्वाधिक चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जाने वाले महामना के संस्था में ये कांग्रेस चरित्र कैसे आया? असल मे ये हमारे समाज का चरित्र है कि हम चाहकर भी वंशवाद छोड़ नही पातें। बड़े नामों के सहारे हमें अपने निहित उद्देश्यों को पूर्ति करने में आसानी होती है, इसलिए तमाम बातों के बाद भी वंशवाद का नासूर रह ही जाता है।

ये ऐतिहासिक तथ्य है कि चौरी-चौरा कांड में जब डेढ़ सौ से अधिक लोगों को फांसी की सजा हो गई, तब बैरिस्टरी छोड़ चुके महामना से उनकी पैरवी करने को कहा गया और महामना ने मुकदमे की ऐसी पैरवी की कि उनमें से अधिकतर को बरी कर दिया गया और करीब बीस लोगों की सज़ा उम्रकैद में बदल दी गई। उनके तर्कों को सराहे बिना तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (जो जाहिर तौर पर अंग्रेज थें) भी नही रह सके थें। उनकी विद्वता संदेह से परे थी। अपने आदर्शों को भी उन्होंने अपने लेखन के अलावा आचरण से स्थापित किया था।

पंडित मदन मोहन मालवीय को 'महामना' राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था। गांधी ने उनके संदर्भ में कहा था, 'मेरे चरित्र में दाग हो सकते हैं, लेकिन महामना का चरित्र बेदाग है।' महात्मा गांधी जैसे उच्च मानदंडों वाले व्यक्ति ने इतनी बड़ी बात बेवजह नही कही होगी। मालवीय जी के मूल्य क्या थें, इसपर बहस हो सकती है। लेकिन मालवीय जी के मूल्य जानने या बताने के लिए आपके नाम में 'मालवीय' होना जरूरी नही, ये उनके बताए सबसे बड़े मूल्यों में है। जैसे गोपाल कृष्ण गांधी महात्मा गांधी नही हैं, जैसे राहुल गांधी जवाहरलाल नेहरू नही हैं, वैसे ही जस्टिस मालवीय महामना मालवीय नही हैं। जस्टिस मालवीय विद्वान हैं। उनके विचारों का सम्मान होना चाहिए, उसपर गंभीरता से विचार भी होना चाहिए। लेकिन उनके विचार ही महामना के विचार हैं, ऐसा कहना महामना के मूल्यों और विचारों का असम्मान करना होगा...
#बीएचयू-2

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