परीक्षा परिणाम: प्रिय अनुज! तुमसे संवाद का मोह...

प्रिय अनुज,
आज के दिन तुम से मुखातिब होना मुझे बड़ा अच्छा लगता है। तुम्हारे वर्तमान से पांच साल आगे खड़े होकर जब तुम्हे देखता हूँ तो तब के कई पैमाने टूटते से नजर आते हैं, कई बातें झूठी लगती हैं, कई ढकोसला साबित होती हैं, तो कई ऐसी जो समझ से परे होती हैं। खैर, आज के दिन तुम्हारे लिए स्वयं से साक्षात्कार का होता है, इसलिए तुम मेरी बात के प्रति अधिक गंभीर होते हो, ऐसे में तुमसे सीधा संवाद कहीं बेहतर होता है!

तुम्हारे परीक्षा परिणाम आईने की तरह आज तुम्हारे सामने होते हैं। दुनिया जो कहे, तुम अपना सच जानते हो। जो बेहतर कर जाते हैं, उनकी चर्चा तो होती है... लेकिन सफल होने वालों से कहीं अधिक आज का दिन उनका होता है, जो थोड़े कम सफल हो पाते हैं... जो उलझनों में रह जाते हैं... जाहिर है, जिन्हें 100 में से लगभग उतने ही नम्बर मिले होंगे, उनके लिए कोई बहाना नही होगा... ये उनके परिश्रम और पुरुषार्थ का नतीजा होगा। उनके पास आगे बढ़ने का एक शानदार मौका होगा और अगर आज के अपने ऊर्जा को वो सकारात्मक दिशा दे सकें, तो निश्चित ही बहुत आगे जाएंगे।

इस एक दिन के पीछे उनका वर्षों का प्रयत्न होगा, इसलिए आज उनके हिस्से प्रशस्तियाँ होंगी। वो भी तुम्हारे साथी हैं, तुम्हे उनकी सफलता से खुश होना चाहिए। मेरे एक शिक्षक हैं, कश्मीर से विस्थापन की अपनी कहानी में अपने सफलता की कहानी को जब वो समाहित करते हैं, तो हम जैसे लोग बस मुग्ध हो सुनते चले जाते हैं, बताते-बताते वो 'रश्क़' का जिक्र करते हैं... कहते हैं, 'जीवन में प्रेरणा होने के लिए 'रशक़' का होना बड़ा जरूरी है', कश्मीरी जुबान के इस शब्द का अर्थ हमारी भाषा में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (हेल्दी कम्पटीशन) जैसा कुछ होगा। दूसरों के हिस्से की खुशी से खुश होना सामान्य नही है, कोई साधारण इंसान ऐसा नही कर सकता... लेकिन ये आपके व्यक्तित्व में नए आयाम जोड़ता है।

खैर, आज से कुछ साल पहले मैं भी बड़े आराम से ये कह देता कि एक कागज़ का टुकड़ा मेरे भविष्य को निर्धारित नही कर सकता। लेकिन आज मैं ऐसा नही कह सकता, वो जो कागज़ का टुकड़ा है वो तुमसे हमेशा जुड़ा रहेगा... तुम चाह कर भी हाई-स्कूल के अपने मार्क्स नही बदल सकते। साथ ही ऐसा कहकर हम आने वाली पीढ़ियों को भागने का एक बहाना भी दे रहे होते हैं, वो समझने लगते हैं कि परीक्षाओं और उनके परिणामों का सचमुच कोई महत्व नही होता।

लेकिन अनुज, तुम तो आज समझ पा रहे होंगे कि तुम किस मोड़ पर खड़े हो। रोबर्ट फ्रॉस्ट की वो कविता पढ़े तुम्हें अधिक दिन नही बीता है... फ्रॉस्ट के उस कविता और तुम्हारे स्थिति में अंतर बस इतना है कि तुम दोराहे के बजाय चौराहे पर खड़े हो। एक कागज का टुकड़ा तुम्हारा भविष्य सचमुच निर्धारित नही कर सकती... तुम्हारे सामने का आसमान आज भी उतना ही खुला है। लेकिन तुम्हारी गति कैसी होगी वो इस बात पर भी निर्भर करेगी कि तुम चौराहे पर किधर बढ़ोगे.... तुम उस कागज के टुकड़े से कितना प्रेरणा ले सकोगे... तुम्हारे अधिक सफल मित्रों में और तुम्हारे स्थिति एक सामान्य सा अंतर है, तुम्हारे पास एक मौका है जो उनके पास नही है और अगर तुमने उस मौके को भुना लिया तो निश्चित ही खुद को उनसे कहीं आगे खड़े पाओगे। सफलता अपने साथ अहंकार और आत्ममुग्धता लेकर आती है, जबकि असफलता का दामन खाली होता है। ये असफल व्यक्ति की जिम्मेवारी होती है कि वो उसे कैसे भरे।

आज तुम्हारे पास खोने को कुछ नही है, और बढ़ जाने को पूरा संसार है। असफलता का स्वाद लिए जब सफलता दस्तक देती है ना, तो वो कहीं मीठी होती है। अपेक्षाओं का बोझ जब खाली हो जाता है, और तब जब तुम कुछ बड़ा करते हो तो उसकी बात अलग होती है। जो टॉप कर गए होंगे, उन्हें खुद से संवाद करने का वक़्त नही मिलेगा... और यही वक़्त तुम्हारा है... तुम जानते हो कि वो कागज़ का तुम्हारा हासिल है... ये उस चौराहे के पहला रास्ता है जो तुम छोड़ आए हो... जरा ठहरो, उस अनुभव को समेटो, ढूँढो कि तुम कहाँ चूक गए, खुद में खो जाओ कुछ दिनों, कुछ घण्टों के लिए, मगर ये सुनिश्चित करो कि जब तुम लौटो तो तुम्हारे पास तुम्हारा जवाब हो।

ऐसे कि तुम उस चौराहे के दूसरे रास्ते पर हो, ये रास्ता घूमकर वहीं पहुंचती है जहाँ से तुम चले थे... इस रास्ते मे पश्चाताप है, बीते का दुख है, एक ख्याल है कि काश ऐसा हो गया होता! इसे छोड़ दो, ये रास्ता तुम्हारा नही है।

तीसरे की ओर मुड़ो, ये रास्ता तुम्हारे दाहिने ओर है, ये वो रास्ता है जिधर लोग तुम्हें बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं। कई बार ये राह भी जाकर चौथे में मिल जाती है। ये वो रास्ता है जिधर से तुम्हारे बड़े, तुम्हारे अपने, पहले सफर कर चुके हैं। वो अपने अनुभवों को बताते हुए तुम्हें इस राह भेजना चाहते हैं। ये हर बार गलत नही होता। लेकिन फिर भी अगर तुम्हें लगता है कि ये रास्ता तुम्हारे लिए ठीक नही है तो एकबार उनके साथ बैठो, उन्हें बताओ कि तुम इस रास्ते नही जाना चाहते... अब वक़्त बदल चला है, अभिभावक अपने जिद उतना नही थोपते... तुम उन्हें समझाओ तो... तुम्हारे भले कि फिक्र उनसे अधिक किसे होगी... उन्हें आश्वस्त तो करो कि जिधर तुम जाना चाहते हो वो रास्ता ठीक है।

अब तुम्हारे पास आखिरी विकल्प है, और इस एक विकल्प में अपार संभावनाएं और आजादी है। सामने के इस राह पर बढ़ने से पहले एक बार 'द रोड नॉट टेकेन' को ध्यान में लाना, उससे सीखना कि बाकी के तीन रास्तों को तुम भूल चुके हो, तुम वर्तमान में हो, और जो रास्ता तुमने चुना है वो तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ है, जो तुम्हारे चित्त को आनंदित करता है।

ऐसा नही है कि इस राह पर तुम्हे सफलता मिलेगी ही! पता है! जो टॉपर्स हैं, वो विशेष हैं। झूठ बोलते हैं वो लोग जो कहते हैं कि टॉपर्स में कुछ खास नही होता। उनमें ऐसी कई चीजें हैं जो तुम में नही है। तुम्हें उनसे जरूर सीखना चाहिए। लेकिन तुमने खुद में कुछ ऐसा देखा जो उनमें नही है? याद रखो, अपना अनुभव व्यक्ति का सबसे बड़ा शिक्षक होता है। आज के दौर में बेवजह के सूचनाओं और जानकारियों का इतना प्रभाव है कि असल सूचनाएं दब जाती हैं। इंसान मशीनों का आदी हो चला है और ये मशीनें उसके गति को निर्धारित करने लगी हैं। हमने खुद से मिलना छोड़ दिया है। कभी खुद को तलाशने की कोशिश तो करो, इन मशीनों को किनारे रखकर...

पता है तुम्हें, वक़्त के साथ वो तमाम चीजें बेकार लगने लगती हैं, जो कभी हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हुआ करती थी। तुम्हारी रोज की आदतें, पढ़ाई, मेडल्स, तुम्हारी चाहतें, तुम्हारे ख्वाब, तुम्हारा मंजिल और यहां तक कि तुम्हारा पहला प्यार। तुम्हारे ट्वेल्फ़्थ के मार्क्स भी! एक वक्त के बाद इनका कोई महत्व नही होता। ये परीक्षाएं भी हमेशा आती जाती रहती हैं।

हाँ, इन सबका थोड़े-थोड़े हिस्से तुम्हारे व्यक्तित्व में जरूर होते हैं। यही तुम्हे इंसान बनाते हैं। जब तुम मुड़कर देखते हो तो ये चीजें बचकानी लगती हैं... तुम हँसते हो, उन चीजों पर जो कभी तुम्हारे लिए सबसे जरूरी होते थे। मगर तुम्हारा इंसान होना ही सबसे जरूरी है। जीवन के निर्णय इनसे कहीं बड़े इम्तेहान होते हैं। जरूरी होता है तुम्हारा टिके रहना... जब तुम पीछे मुड़कर देखते हो, अगर उस वक़्त तुम्हारे आंखों में संतोष का भाव होता है, तो यकीन मानो तुम सफल हो...

मैं कभी बहुत विशिष्ठ विद्यार्थी नही रहा हूँ। हाँ, मेरे शिक्षकों का प्यार हमेशा मिला है मुझे। सफलता का कोई पैमाना नही होता, उसकी कोई परिभाषा नही होती। तुम कहाँ पहुँचे या कितना पैसा कमा पाए ये कभी महत्वपूर्ण नही होगा... लेकिन जिस दिन तुम इस सफलता-असफलता से ऊपर उठ जाओगे... गुस्से और दुख के बजाय प्रसन्नता को ढूंढने लगोगे... हारने के बाद भी सामने वाले से मुस्कुरा कर मिलोगे, उस दिन तुम सच में बड़े हो जाओगे... सफल भी! टॉपर भी...

शुभकामनाएं!
तुम्हारा अग्रज,
अभिषेक!

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