बोर्ड रिजल्ट्स: अधिक नम्बर पर आपत्ति, आपकी हताशा तो नही!
'सोशल साइंस और हिन्दी में पूरे नम्बर कैसे आ सकते हैं? क्या इन विषयों में इससे अधिक कुछ नही लिखा जा सकता!' परीक्षा परिणामों के बाद ऐसे आकलन बड़े आम हो जाते हैं। मुझे इस बात से बड़ी खुशी होती है कि कम से कम इस दौरान ही, लेकिन हम अपने भविष्य के पौध को लेकर चिंतित तो होते हैं। बोर्ड की निंदा करते हुए हम 'प्रेमचन्द' से लेकर 'कार्ल मार्क्स' और 'चाणक्य' से लेकर 'रूसो' तक के उदाहरण हम ढूंढ लाते हैं। उनपर सन्देश और मीम बनाने लगते हैं!
अभिभावकों से लेकर पूरा समाज यदि शिक्षा व्यवस्था के स्थिति को लेकर सजग हो उठता है तो उससे बेहतर क्या हो सकता है? बोर्ड्स से सवाल लाजिमी है। यूँ रेवड़ियों की तरह बंटते नंबर हमारी पीढ़ियों ने कब देखा था? बाबा की पीढ़ी में तो गुड सेकंड हुआ करते थे! फर्स्ट होना दीगर बात होती थी। कोई फर्स्ट डिवीज़न से मैट्रिक(सेकेंडरी) पास हो जाए तो बड़ी बात होती थी। बीस साल पहले तक भी अच्छे विद्यार्थियों को साठ प्रतिशत मुश्किल से मिलते थे! डिस्टिंक्शन वाले अपवाद हुआ करते थे... अब डिस्टिंक्शन का कोई मतलब नही...
ऐसे में 99.8 पर अचम्भा तो लाजिमी है! ये होड़ किधर ले जाएगी? कल आईसीएसई वालों के 100 परसेंट ने उस हताशा को थोड़ा और उबाल दे दिया। हताशा! जी हाँ, हताशा ही है ये। अपने जीवन के उलझनों में नकारात्मक होना हमारी प्रवृत्ति हो जाती है कई मामलों में, कई मामलों में भयानक आक्रामक होना भी... हम अपने नाकामियों को अपने गुस्से में छुपाने लगते हैं। पिछली पीढ़ी ने हमें बहुत कुछ दिया है। साथ ही अपनी नकरात्मकताएँ भी दी हैं।
मानव सभ्यता के वर्तमान चुनौतियों में सबसे महत्वपूर्ण मनुष्य का अस्तित्व व भविष्य हैं। दो सौ सालों के औद्योगीकरण के एक ऐसे पड़ाव पर हम पहुँच चुके हैं जहाँ हम खुद ही उन मशीनों से होते जा रहे हैं। अब हम इससे बहुत आगे नही जा सकते, हमारे मशीन मानव के गुणों वाले होते जा रहे हैं, और मनुष्य खुद से दूर। हम मशीनों से नियंत्रित होने लगे हैं। इसलिए प्रकृति(पर्यावरण) से कहीं चुनौतियां बड़ी प्रवृत्ति(व्यवहार) की हैं। हम लगातार धैर्य खोते जा रहे हैं। तकनीक ने हमें उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है कि एक क्लिक पर हम सबकुछ चाहते हैं!
जो पीढ़ी आज आ रही, वो ये सीखकर आ रही। अब उसे ये पिछले पीढ़ी से सीखने की जरूरत भी नही है। चार साल के बच्चे के आंखों पर +4D का चश्मा लगा देख मुझे बड़ा बुरा लगता है, लेकिन अगले क्षण ही मुझे गुस्सा भी आता है, जब उसकी माँ कहती है, 'हमारा बच्चा तो डेढ़ साल की उम्र से ही मोबाइल का मास्टर है जी!'
हमारी समस्या है कि हम समस्या के जड़ पर वार करना भूल गए हैं। दसवीं में मुझे 10 सीजीपीए मिला था। ये अधिकतम ग्रेड होता था। तब भी उसका विरोधी था मैं मगर। उस व्यवस्था के स्याह पक्ष थे, आपको अपनी वास्तविक स्थिति पता नही होती थी... छोटा सा सिलेबस होता था और अगर स्कूल का सहयोग मिल जाए तो बोर्ड में किसी विषय में आप 60-65 नम्बर लाकर भी आप 10 वाली ग्रेड में पहुँच जाते थे।
बारवीं में मुझे 73 प्रतिशत अंक आए थे, 2015 में। दसवीं में उतना बेहतर करने के बाद भी, तब असल में स्कूल के पहले दिन ही मुझे मेरे सीनियर्स ने ऐसा हताश किया था कि उसके प्रभाव से मैं दो साल नही निकल सका। रिजल्ट के बाद जो मनोवैज्ञानिक बढ़त मेरे साथ था, उसे भी उन्होंने मेरे खिलाफ कर दिया था।
कोचिंग लेने की मेरी आदत नही थी। चाहकर भी नही जा सका। हमारा स्कूल तब देश के सर्वश्रेष्ठ स्कूलों में गिना जाता था, और मुझे उस बैच के दो लड़के याद हैं। एक मैं, जिसने हवा के साथ जाने से मना तो किया था, मगर कोई उदाहरण नही स्थापित कर सका था। कनिष्क मेरे साथ का ही था मगर, वो भी दूसरे चंपारण से पटना गया था। उसने बिना कोचिंग के न सिर्फ 94% अंक लाए, बल्कि अगले साल एनआईटी तक भी गया। मैंने उसका संघर्ष देखा था इसलिए मुझे इन बातों से कोई फर्क नही पड़ता कि अगर उसने कोचिंग लिया होता तो और बेहतर करता!
हम सकारात्मक पक्ष को एकदम से दरकिनार कर देने को आदी हो चले हैं, ये हमारा स्वभाव नही रहा है मगर। हमारी सभ्यता सतत विकास की रही है। संवाद हमारे परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा हैं। हम दूसरों के सफलता पर हर्षित होने वाले लोग रहे हैं। हम से एक बैच पहले 499 अंक लाने वाला सार्थक अग्रवाल हो या किसी परिचित को मिलने वाले 98 प्रतिशत अंक... अकारण ही ये मन में अलग उल्लास भर देते हैं। ऐसे में अगर हमारा बच्चा उतना बेहतर नही कर सका तो हमें उसके कारणों को ढूँढना चाहिए, बजाय व्यवस्था को कोसने के। अगली बार वो भी शीर्ष के नामों में हो सकता है!
वक़्त बदलता है, इंसान वक़्त के साथ सीखता है। मैं आज जितना जानता हूँ, जाहिर है दसवीं में इससे कम जानता था। मैं आज भी पूर्ण नही हूँ। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मुझे अच्छे अंक आते रहे, हालांकि मैं टॉपर नही था फिर भी। लेकिन जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में आया तो एक बार फिर सीनियर्स का सामना हुआ, डराने वालों से, 'यहाँ नंबर नही मिलता' कहने वालों से! लेकिन इसबार मेरे साथ पीछे के पांच-सात वर्षों का अनुभव था। मुझे उनके बातों से कोई फर्क नही पड़ा। पहले सेमेस्टर में मैंने कोशिश की कि मुझे कम से कम 60% आ जाए, एक परसेंट से रह गया... आगे बेहतर कर लूंगा... ये वक़्त की ही सीख है कि इंसान 100 से 59 तक आकर भी खुश रहता है, और अंत में जानता है कि दूसरी चीजें हैं, जो इससे अधिक महत्वपूर्ण हैं।
किसी लॉ कॉलेज के टॉपर को 95 प्रतिशत भी मिलते हैं, हमारे यहां 67-68 भी मुश्किल से मिलते हैं। जाहिर है कि दोनों का आकलन भी उसके अनुसार ही होगा!
हमारी परंपरा में व्यक्ति की यात्रा अपूर्णता से पूर्णता की ओर होती है। जब हम कहते हैं, 'सोशल साइंस में 100 नम्बर कैसे आ सकते हैं, क्या कोई शोध बाकी नही रहा!' तब असल में हम अपने पैमाने पर उसे तोल रहे होते हैं! ये हास्यास्पद है... वक़्त बदल गया है। बदले वक़्त की अपनी हक़ीक़त होती है। मगर दूसरे तरफ हम अतीत को पीछे नही छोड़ पा रहे। दसवीं के एक छात्र से पीएचडी वाले के बराबर जवाब की अपेक्षा तो आप नही कर सकते न... उसे शोध नही करना होता... पहले से बताए गए उत्तर को लिखना होता है... मेरे आज और पाँच साल पहले के समझ में फर्क है, आपके बीस साल पहले वाले में भी होगा। एक शिक्षक को छात्र के अवस्था और सीमाओं के हिसाब से उसे अंक देना होता है। छः नम्बर के किसी प्रश्न में अगर अपने स्तर के मुताबिक उसने पूरा जवाब लिखा है तो उसे पूरे अंक क्यों न मिलें? वो पूर्ण होगा, धीरे-धीरे, मगर आज जहां आप हैं, वैसी अपेक्षा दस साल कम अनुभव वाले व्यक्ति से आप कैसे कर सकते हैं। वो अपनी स्थिति में सबसे बेहतर है, तो उसे 100 अंक क्यों न मिलें?
आज हम जिस दौर में हैं उसमें हर राजनीतिक दल के पास अपना चाणक्य है, जिन्हें चाणक्य का पूरा नाम तक नही पता, उन्हें भी ये उपाधि दे दी गई है। आज के दौर में असल चाणक्य भी होते मगर तो उन्हें भी शत प्रतिशत अंक देने से समस्या होती! समस्या समस्या होने से नही है, बल्कि उसके वाजिब न होने से है। हमारा तर्क है कि मनोविज्ञान में शत प्रतिशत अंक आने से मनोविज्ञान में नए विकास की संभावना खत्म हो जाती है। निहायत ही खोखला तर्क है ये, बारवीं के बच्चे को नए खोज नही करना होता है, उसे अबतक हुए विकास का अध्ययन ही करना होता है बस। चाणक्य अपने सीमाओं और समय में शत प्रतिशत अंक ही डिज़र्व करते थे...
समस्या 499 अंक में नही है, समस्या 499 के बाद भी एक अंक छूट जाने के अफसोस में है! उस प्रवृत्ति को पकड़िए... आपका प्रश्न इस बात को लेकर होना चाहिए कि हम सर्वश्रेष्ठ अंक लाने वाले छात्रों में भी वो मूल्य क्यों नही भर पा रहें, न कि इस बात पर कि उन्हें उतने अंक क्यों मिल रहे हैं। सीमित सिलेबस है, गिने हुए विषय हैं... वो अपने सीमाओं में सर्वश्रेष्ठ हैं तो उन्हें जो मिला है, वो उसके हकदार हैं, वो वाजिब है।
सौ नम्बर वाली कॉपी तीन बार जंचती है, आपके सवाल उन दो-तीन शिक्षकों को भी कटघरे में ले जाते हैं। 500 की परीक्षा में जहाँ अट्ठारह लाख बच्चें बैठते हैं, वहाँ हर किसी को अलग कर पाना सम्भव नही है, वैसी व्यवस्था भी नही हो सकती, एक अंक पर छह हजार बच्चे हैं। तो जाहिर है 90% से ऊपर भी हज़ारों होंगे। ये अंत नही है... वो बच्चे भी जानते हैं। इसमें 99.8 वाले भी हैं ,और 48 वाले भी, फैल करने वाले भी हैं।
आईपीएल के कमेंट्रेटर आखिरी ओवर के मोमेंटम की बात करते हैं, ये अंक बस बच्चों के लिए आगे के लिए मोमेंटम जैसा है, वो आगे सकारात्मक ऊर्जा लेकर जाएंगे। इतनी समझ उनमे हो जाती है कि आगे की चुनौतियां वो समझ सकें। फिर फ़र्क़ नही पड़ता कि टॉपर 60% पर है या 100% पर! बस सैम्पल साइज बदल जाता है। महत्वपूर्ण है कि सबको समान मौका मिला या नही।
टॉपर गाज़ियाबाद-नोएडा के बच्चे होते हैं, तो वो न्यूज़ बनता है, लेकिन मुझे अच्छा लगता है जब वो टॉपर दक्षिण के किसी ऐसे शहर से आता है, जिसका नाम भी हम उस टॉपर के कारण सुनते हैं। मुझे अच्छा लगता है जब पटना को छोड़कर मुजफ्फरपुर के जीडी मदर स्कूल से, गया के किसी बेनाम से स्कूल से, बोकारो से बिहार-झारखण्ड का टॉपर निकलता है... लखनऊ वालों से ऊपर किसी जौनपुर वाले का नाम होता है... ये सबआने वाले पीढ़ियों को बताते है कि अभाव का बहाना छोड़कर तुम भी सर्वश्रेष्ठ हो सकते हो!
ये सच में महत्वपूर्ण नही कि पहले कितने अंक आते थे और अब कितने आते हैं। आपका ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि आपके बच्चों को जो शिक्षा दी जा रही वो कारगर है क्या? उनके शिक्षक श्रेष्ठ हैं क्या? उन्हें उनकी सुविधाएं मिल रही या नही? वो देस-दुनिया के दूसरे हिस्सों के लोगों के सामने कहाँ खड़े हैं!
आपका सवाल इस बात को लेकर होना चाहिए कि बिना कोई मूलभूत बदलाव किए, बिना योग्य शिक्षक रखे बिहार बोर्ड में 45% के बजाए 86% बच्चे कैसे पास कर गए! आपका सवाल मूल्यांकन प्रणाली पर न होकर, परीक्षा प्रणाली पर होना चाहिए! हमारे प्रश्न गुणात्मक होने चाहिए! अंक का क्या है, वो सबसे कम महत्वपूर्ण है... 99% वाले का अपना महत्व है और 68% वाले का अपना पक्ष! ये वृहद विषय है, मगर कम से कम बोर्ड और व्यवस्था को कोसने का कारण तो नही बन सकता... खासकर तब जब हमारे पास बेहतर विकल्प उपलब्ध हैं!
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