खुशियों के ब्रॉडकास्ट से ब्रॉड-कास्ट होते रिश्तें !
गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा रेडियो पर राष्ट्र के नाम संबोधन की परंपरा पुरानी रही है। रेडियो मैंने इसलिए लिखा क्योंकि जब से ये परंपरा चली आ रही, तब टीवी शायद ही प्रचलन में था ! इसके साथ ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय उनका सन्देश और उनकी शुभकामनाएं अख़बारों में भी छपवाता आया है। अलग-अलग राज्यों में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के नाम से भी ऐसे सन्देश जारी करने की परंपरा रही है।
राष्ट्रीय पर्वों के अलावा विभिन्न धर्मों के बड़े पर्वों से पहले भी इन शुभकामना संदेशों की परंपरा आम रही है। ये सन्देश अक्सर औपचारिक होते हैं, जो जारी करने वाले पदाधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होते हैं। हालाँकि अब डिजिटल सिग्नेचर के ज़माने में उसकी जरुरत भी कम ही पड़ती है !
नव वर्ष, राष्ट्रीय पर्व या विभिन्न पर्वों पर बड़े से लेकर छोटे तक, हर स्तर के नेता भी शुभकामना संदेश ब्रॉडकास्ट करते रहे हैं। कुछ व्यापारी और अलग-अलग क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा रखने वाले लोग भी ऐसा करते हैं। ये सामान्यतः पेड होता है और क्लासिफाइड सेक्शन में आता है। इन संदेशों पर ध्यान देने वाला वर्ग काफी छोटा है। ये बात इन्हें छपवाने वालों को भी पता होता है। लेकिन उनकी भी कुछ अपनी बंदिशें होती हैं, अपनी सीमाएं होती हैं ! इससे ज्यादा कुछ कर पाने में वो शायद ही सक्षम होते हैं !
व्हाट्सएप्प का एक फ़ीचर है संदेशो को ब्रॉडकास्ट करने का। इसमें आप एक ही मैसेज, एक बार में चाहे जितने लोगो को भेज सकते हैं, शर्त यही होगा कि मैसेज उन्हीं लोगों तक पहुंचेगा जिनके फोन में आपका नम्बर सेव्ड हो। मैंने भी 238 लोगों की एक ब्रॉडकास्ट लिस्ट बना रखा है। पर्सनल मैसेजेज के अलावा मैं सारे व्हाट्सएप्प सन्देश इसी लिस्ट में भेज देता हूँ। लगभग सभी लोगों को पहुँच जाता है। लेकिन ये जाता पर्सनल मैसेज की तरह ही है, जैसे मैंने बस उन्हीं को भेजा हो। बिलकुल उसी तरह जैसे सुनने वाले सोचते हैं कि राष्ट्रपति उनके रेडियो में ही बोल रहे हों, या जैसे ये पढ़ते हुए आप सोच रहे हैं कि मैंने ये बस आपके लिए ही लिखा है। ब्रॉडकास्ट कई मामलों में काफी कारगर है। क्योंकि ये लोगों को भूल गए, याद ही नहीं करते, बड़े लोग हो गए जैसे शिकायत करने के मौके नहीं देता।
खैर इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। आम मेसैजों या चुटकुलों तक तो ये ठीक लगता हैं। लेकिन त्योहारों की शुभकामनाएं इस तरह थोक में प्रेषित होने लगती हैं तो समस्या होती ही हैं। अखबार के क्लासिफाइड की तरह फिर लोग इसे भी औपचारिकता समझने लगते हैं। तकनीक यहाँ विलेन बन जाता हैं। मैं प्रतीकों में नहीं मानता। फिर सबको हम शुभकामना दें ये जरुरी भी तो नहीं ! लेकिन कुछ वो लोग भी हैं जो आपके संदेशों का इंतजार करते हैं। कुछ वो लोग भी हैं जिनके लिए आप एक और मैसेज भर नहीं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ! आप उन्हें सहेज लीजिए न ! फिर जरूरत नहीं किसी ब्रॉडकास्ट की !
याद रखिएगा, जो सन्देश आपके रेडियो तक पहुँचते हैं, वो कई रिपीटर और एम्पलीफायर से होकर गुजरते हैं। लेकिन व्यक्तिगत संदेशों में कोई रिपीटर नहीं होता, जो रिश्तों में खाई का काम कर जाता है और खुशियों को ब्रॉडकास्ट करने में हम कहीं न कहीं रिश्तों को ब्रॉड-कास्ट करते चले जाते हैं !
बहरहाल, आपको थोक में मकर-संक्रांति की शुभकामनाएं ! सिर्फ मकर-संक्रांति ही नहीं आने वाले चार और पर्वों की शुभकामनाएं, थोक में !
सही लिख रहे हो गुरू ।
ReplyDeleteचपे रहो