परंपरा न खत्म होने पाए !
झारखण्ड में एक जिला है, पूर्वी सिंहभूम। जी, उसी राज्य में जो बिहार से आदिवासी, खनिज संपदा, शोषण और विकास जैसे कुछ मुद्दों को लेकर बिहार से अलग हुआ था। पता नहीं कितना विकास किया है उस क्षेत्र ने अलग होने के बाद 15-17 सालों में, पता नहीं कितने विकसित हुए हैं वहां के आदिवासी ! पर हाँ, इन चंद सालों में कई सरकारों को आते-जाते देख लिया है उस राज्य ने। कई ऐसे मुख्यमंत्री भी देख लिए हैं, जो कुछ ही महीनों में भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो गए। मधु कोड़ा जैसे लोगों को भी देखा है, जो एक टांग के कुर्सी पर बैठकर 4000 करोड़ डकार जाते हैं !
खैर, हम बात कर रहे थे पूर्वी सिंहभूम की, वही जिसे आप जमशेदपुर भी कहते हैं। अब मुझे नहीं पता कि क्या स्थिति है खनिज की, कोयले की या लोहे की। लेकिन आदिवासी की स्थिति तो ठीक नहीं है। सिर्फ जमशेदपुर शहर में आदिवासियों की आबादी लगभग 30% के करीब है। ग्रामीण इलाकों में वो निश्चित ही अधिक होंगे।
जब बात आदिवासियों की होती है तो अक्सर हम मूल बहस से भटककर उलूल-जुलूल बातों पर ध्यान अधिक देते हैं। चाहे वो उनको हिन्दू मानने, न मानने की बात हो या फिर उनके परंपराओं की। उनके परंपराओं को बचाने की, या कभी-कभार उनके विलुप्त होते परंपराओं पर बात करने के नाम पर ऐसे कृत्यों का बचाव करने का जो शायद ही किसी का भला करते हों ! कई बार तो वो खुद उनके लिए नुकसानदेह होते हैं। लेकिन आदत से लाचार, हम पहुँच जाते हैं खोखले तर्क देने।
वैसी ही एक परंपरा है जमशेदपुर के करनडीह इलाके की, चिड़ीदाग। जी, इस परंपरा के अनुसार आदिवासी समाज के लोग मकर संक्रांति के उपरांत के दिनों में छोटे बच्चों के पेट को गर्म सलाखे से दागते हैं। एक बार नहीं, कई बार दागते हैं। सलाखे का गर्म हिस्सा चिड़िया की तरह होता है, इसलिए इसे चिड़ीदाग कहते हैं। उसका वीडियो मैंने देखा है तो मुझे थोड़ा अंदाजा है कि क्या बीतती होगी उन बच्चों पर। हालाँकि जो महसूस करते होंगे, वो तो वही करते होंगे। पता नहीं कितने दिन लगते होंगे उस घाव को भरने में।
करनडीह के लोग मानते हैं कि ऐसा करने से बच्चे को जीवन में कभी कोई पेट संबंधी समस्या नहीं होती। पता नहीं ये कैसे संभव है ये भला। लेकिन उन्हें बताए कौन ! प्रशासन भी लगभग अनजान है इससे। विकास और शिक्षा का क्या आलम है वो हम देख ही रहें। वहां सोशल मीडिया की पहुँच भी नहीं ही होगी, वर्ना बात अबतक मेनस्ट्रीम में आ चुकी होती। बाकी के लोगों को भी वहां जाना लाभकारी नहीं ही लगता होगा। मीडिया की नजर भी उनपर नहीं पड़ी। अब सुदूर गाँव में कौन जाए भला, दिल्ली-एनसीआर के आसपास होता तो वो सोचते। वो पहुँचने की भी क्यों सोचें, कौन प्राइमटाइम में रात के डिनर में आदिवासियों की परंपरा देखेगा भला। वो वक़्त तो बहस का होता है। किसी ब्रेकिंग से मुद्दे पर कभी परिणाम तक न पहुँचने वाली किसी बहस का।
और हाँ, शिक्षा और जागरूकता हो ही जाए तो क्या? कौन सा वो आदिवासी मान ही जाएंगे अपनी परंपरा को छोड़ने को। कहती होगी आपकी शिक्षा कुछ, पर हमारे यहाँ तो ये सदियों से होता आया है। ये हमारे परंपरा को खत्म करने की साजिश है। कह देंगे वो भी ऐसा कुछ। नहीं मानेंगे आपके शिक्षा को। भई, परंपरा है उनकी मरते हैं कुछ बच्चे तो मरने दीजिए। कुछ लोग मरते हैं तो मरें, कुछ सांढ़ भी मरें, कुछ सौ लोग मर ही जाएं तो क्या? इसके लिए परंपरा खत्म कर दोगे हमारी ?
बस तलाक ही तो होता है? फिर हलाला के बाद हम स्वीकार भी तो कर लेते हैं। बस इतने भर के लिए तुम हमारे शरिया में खलल डालोगे ? हमारी परंपरा है आखिर ? कुछ महिलाओं की ज़िंदगी ही तो बरबाद होती है, परंपरा के लिए इतना भी नहीं कर सकते हम भला ?
इनसब के बाद एक दूसरा दौर चलेगा अच्छी परम्परा और बुरी परम्परा के निर्धारण का। वो जल्लीकट्टू में करते हैं तो हम बकरीद में क्यों न करें ? दूसरी तरफ वाले कहते हैं कि आप बकरीद में करो तो कोई बात नहीं, हमारे जल्लीकट्टू पर दिक्कत क्यों ?
कहीं से तीन तलाक और हलाला के लिए भी ऐसे ही तर्क निकल के आएँगे। फिर आदिवासी भी क्यों न बोले कि उनकी भी परंपरा है, और वो तो आखिर अपने ही बच्चे को दाग रहे।
इससे भी बढ़कर कोई राजीव गांधी या कोई नरेंद्र मोदी कानून बना देंगे, अध्यादेश ले आएँगे, फिर शाहबानो वाले तीन तलाक और जल्लीकट्टू की तरह भी चिड़ीदाग भी हमारे महान परंपरा का हिस्सा बन जाएगा। देर बस उस आदिवासी समाज के भी एक बार उठ के जोर से चिल्ला देने भर की है !
और ये ऐसे ही चलता जाएगा। आप-हम एक-दूसरे के परंपराओं पर दोष मढ़ कर अपने परंपरा को पाक साफ करते जाएंगे। ग़र उससे भी न हुआ तो क़ानून बना लेंगे। फिर ज़िन्दगी भी कितने दिन की है कट जाएगी यूँ ही रात को प्राइम टाइम डिबेट देखते-देखते !
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