अग्निपथ योजना को लेकर युवा सड़क पर क्यों हैं: समस्या और समाधान

युवा सड़क पर क्यों हैं?
1. लगभग तीन वर्षों से सेना में भर्तियां बंद थी। कारण था कोरोना, ध्यान देने योग्य है कि इसी दौरान कई बार राज्यों में चुनाव हो गए।
2. जिन नियुक्तियां की प्रक्रिया चल रही थी और कुछ चरण हो चुके थे उन्हें तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है। सभी चरण पार कर चुके अभ्यर्थियों (जिन्हें प्रशिक्षण के लिए जाना था) के परिणामों को भी रद्द कर दिया गया है। ये संसाधनों की बर्बादी नही है?
3. सरकार को क्यों लगता है कि इन गरीब बच्चों (गरीब इसलिए कि सेना में शामिल होने वाले अधिकतर जवान इसी पृष्ठभूमि के होते हैं) का कोई अस्तित्व नहीं है? अन्यथा एक झटके में उन नियुक्तियों को रद्द नही किया जाता जिसके परिणाम के प्रतीक्षा में वो दो-तीन वर्षों से बैठे थे।
4. जब नियुक्तियां बंद हुई थी तब उनमें से काफी बच्चें 18 वर्ष के थे, आज 21 के हो चुके। इसलिए वो चाहकर भी 'अग्निवीर' नही बन सकते। क्या उनके देशसेवा के जज्बे में कोई कमी थी? कोई सरकार इतनी असंवेदनशील कैसे हो सकती है अपने ही युवाओं के भविष्य को लेकर?
5. सरकार इतनी गंभीर थी कि बच्चे तीन वर्षों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थें, विरोध हो रहा था, संसद से लेकर हर मंच से प्रश्न उठ रहे थे और सरकार सुन नही रही थी। कम से कम सुने जाने का अधिकार तो था/है उन्हें!
योजना में समस्या क्या है?
1. कोई भी प्रयोग छोटे स्तर पर होता है पहले। फिर उसके गुण-दोष का विचार करके उसे बड़े स्तर पर लागू किया जाता है। इस योजना को ऐच्छिक बताया जा रहा। जबकि सच्चाई ये है कि सेनाओं में शत प्रतिशत नियुक्तियां अब इसी आधार पर होंगी।
2. यह भी कहा जा रहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन सेना में पहले से था तो इसपर इतना हायतौबा क्यों है! सच यह है कि शॉर्ट सर्विस कमीशन सिर्फ सैन्य अधिकारियों के लिए था और वो परमानेंट कमीशन के लिए होने वाले नियुक्तियों के अतिरिक्त था। शॉर्ट सर्विस कमीशन के अधिकतर अधिकारी भी परमानेंट कमीशन चुन लेते हैं बाद में। कई कोर्ट में भी जाते हैं इसके लिए।
3. यह योजना सेनाओं में आमूलचूल संरचनात्मक बदलाव लाने वाली है। इस योजना के कारण कुछ वर्षों में देश के 75% से अधिक सैनिक अस्थाई हो जाएंगे। क्या इतने अस्थाई सैनिकों के भरोसे भारत जैसे राष्ट्र की सुरक्षा छोड़ सकते हैं?
4. जिन सैनिकों को पता होगा कि वो अधिकतम चार वर्षों के लिए इस संगठन में हैं उनमें भ्रातृत्व की भावना भी पूर्व की तरह भरना एक चुनौती होगी।
5. अभी सैनिकों का प्रशिक्षण एक साल से डेढ़ साल का होता है, उसके बाद भी सैनिक लगातार युद्धाभ्यास करते हैं। दो-तीन वर्षों के अनुभव और 10 हफ्ते के प्रशिक्षण वाले सैनिक उतने सक्षम हो पाएंगे क्या?
6. देश-सेवा और समर्पण जैसी बातें भी हो रही हैं, लेकिन वो समर्पण एकतरफा हो सकता है क्या? पहले बलिदानी सैनिकों के परिवार के आर्थिक सुरक्षा का ख्याल सेना रखती थी। इस योजना के बाद उनके परिवार को एकमुश्त राशि देने भर का प्रावधान है।
7. सेना इनमे से 25% को चार वर्षों के बाद अपने साथ रखेगी ऐसा कहा जा रहा। जबकि वास्तविकता ये है कि आवश्यकता के हिसाब से अधिकतम 25% प्रतिशत को लिया जा सकता है।
8. सुरक्षा संबंधी समस्याएं भी अवश्यंभावी हैं। अबतक गोपनीय जानकारियां पूर्णकालिक सैनिकों तक ही सीमित होती थीं।
9. प्रथमदृष्टया सरकार का हित इसमें इतना ही दिखता है कि वो पेंशन व अन्य भत्तों के मद में बड़ी बचत कर पाएगी।
समाधान क्या है?
सैन्य सुधार जरूरी हैं। लेकिन सभी पक्षों को सुनकर ऐसा किया जाए तो बेहतर। पूर्व की नियुक्तियां जारी रहें और इस योजना को वैकल्पिक बनाकर छोटे स्तर पर लागू किया जाए। फिर उसके परिणामों का आकलन करने के बाद इसके दायरे को बढ़ाया जाए।

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