वैदिक विज्ञान, कानून और समाज: उपराष्ट्रपति महोदय की क्लास!
'सवाल पूछने वाले बच्चे शिक्षकों को याद रह जाते हैं। अच्छे शिक्षक को तमाम प्रशंसाओं के बीच उन प्रश्नों की दरकार होती है।' सूरीनाम के उपराष्ट्रपति महामहिम माइकल अश्विन सत्येन्द्र अधीन जब अपना व्याख्यान समाप्त कर कैमरों से घिरे थे तब मेरे मन में यही अनुभवजन्य ख्याल थें। दक्षिण अमेरिकी राष्ट्र सूरीनाम में करीब तीस प्रतिशत आबादी भारतवंशियों(पूर्वी भारत) की है, जिन्हें करीब डेढ़-सदी पूर्व उस डच कॉलोनी में अफ्रीकी दासों की जगह मजदूरी करने ले जाया गया था।
पलायन का दंश पीढ़ियों के सबब होता है। अपने देश मे भी पलायित होने का अहसास जब व्यक्ति को वक़्त-बेवक़्त हो ही जाता है, वैसे में सात-समंदर पार दशकों तक अपनों से कट जाने का दर्द कैसा होता होगा उसकी कल्पना भी मुश्किल है। वो दर्द और बड़ा हो जाता होगा जब कोई सदियों में लौट पाकर भी अपने और अपनों से हमेशा के लिए दूर जा चुका होता है! उसके हिस्से यहाँ कुछ नही होता! बस धुंधली हो चुकी स्मृतियां होती हैं, स्मृतियों का क्या महत्व? 'We, as dispora are proud ..... We feel obliged to protect the culture of our forefathers and we will continue to do that.' उपराष्ट्रपति महोदय ने अपने व्याख्यान की शुरुआत जब इन शब्दों से की होगी, तो जाने उनके मनोभाव क्या रहे होंगे।
अपने हिस्से बची स्मृतियों को अपना बना लेना हमारे लोग बखूबी जानते हैं। हाँ, दूर देश के उस व्यक्ति को मैं अपना ही मानता हूँ, जो खुद को और मुझे, मुझसे बेहतर जानता है। क्योंकि उसने उसे जानने की कोशिश की है जिसे हमने बेकार समझ कर कोने में डाल दिया। हिन्दी-भोजपुरी-मैथिली-अवधी-उर् दू-ब्रजभाषा को मिलाकर जिन्होंने सरनामी-हिंदुस्तानी बना लिया, जिनके लिए हिन्दी आज भी उनकी मुख्य भाषा है। होली को जिन्होंने आज भी 'फगुआ' के नाम से संजोकर रखा है। जो हर साल अनवरत दीवाली मनाते हैं... और जिन्होंने वक़्त से समझौता नही किया, बल्कि अपने सम्बल और पुरुषार्थ से सर्वोच्च पदों तक पहुंचे।
यहाँ ये जानना जरूरी है कि करीब साढ़े छह लाख के आबादी वाले सूरीनाम में उपराष्ट्रपति का पद भारतीय प्रधानमंत्री के समकक्ष होता है, जो सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। अपने व्याख्यान में आदि शंकराचार्य का नाम तीन बार लेने वाले श्री अधीन के लिए राजा का अर्थ 'राज्ञऋषि' होना है, 'Raja refers to a person who shines, whose power lies in बुद्धियोग, who ensures welfare through righteousness in his policy and conduct.' दिलचस्प है कि श्री अधीन मंत्री बनने से पूर्व इलेक्ट्रिकल इंजीनियर एवं लेक्चरर थे, जिन्हें उनके काम को देखते हुए राष्ट्रपति ने शिक्षा मंत्री का दायित्व दिया और दो वर्ष बाद 2015 में वो देश के सबसे युवा उपराष्ट्रपति हुए। अभियांत्रिकी के विशेषज्ञ का दर्शन एवं राजनीति में महारथी होना मुझे अचंभित कर रहा था, करे भी क्यों न, किसी राजनेता के मुंह से एक भाषण में कब हम बीस बार से भी अधिक 'रिसर्च' शब्द सुनते हैं? ऐसे राजनेताओं के हम आदी ही कहाँ रहे हैं?
राजनेताओं और शिक्षाविदों के परिवार से ताल्लुक रखने वाले श्री अधीन ने जब बचपन में अपने आजाs(दादाओं) और आजीs(दादियों, उन्होंने यही मूल शब्द प्रयोग किए) को क्षेत्रीय समस्याओं के लिए भारतीय(वैदिक) समाधानों पर बात करते सुना तब इस विषय में उनकी दिलचस्पी हुई। 'Twenty-one years of my learning started as an adventure, when my mother gifted me Bhagwadgita at 17, it turned into a conviction soon. I don't know from where did such an old copy of Bhagwadgita came to that part of the world.'
कल्पना करिए एक देश की जहाँ अफ्रीकी दास हों, चीनी हों, जापानी हों, भारतीय हों, और उन सबके पास अगर कुछ हो तो बस अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत! ऐसे लोग जब एक साथ रहें और उनके नस्लीय संघर्षों के संभावना का समाधान अगर प्राचीन भारतीय विज्ञान में ढूंढने बैठा जाए तो एक बच्चे के लिए ये मजेदार तो होगा ही...
उन्होंने सप्तऋषियों का जिक्र किया... 'यत् ब्रह्माण्डे, तत् पिण्डे' का जिक्र किया... गागर में सागर का जिक्र किया... अणु और परमाणु का जिक्र किया... 'Microcosm-Macrocosm' का जिक्र किया... 'Body is universe', अद्वैत दर्शन के इन सिद्धांतों में उन्हें अपना समाधान दिख रहा था। समूचे विश्व को परिवार, सबमें खुद को और खुद में सबको मानना ही उनकी कुंजी थी। यहीं से वो सूरीनाम के सांस्कृतिक राष्ट्र का आरम्भ भी मानते हैं। सच ही है, दूसरों को भी खुद का अंग मान लेने से झगड़ा ही कहाँ बचेगा?
उनका कहना था कि अनादिकाल से भारतवर्ष जीवन के प्रश्नों का उत्तर देता रहा है, भारतवर्ष खुद में ही जीवन है जो मानव के सम्मान और वैश्विक बंधुत्व का प्रतीक है। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयः' की बात करते हुए वो भावुक से लग रहे थे। उनका कहना था कि पश्चिम की तरह हम 'Greatest good of greatest number' में न मानकर 'Total good of total number' में विश्वास रखते हैं। 'India has been a beacon of light since ages, and my conviction continued to become stronger.'
उन्होंने कहा, 'Spiral of research and circle of planning and action. This was a deliberate choice of research model. I was in politics for change and (due to the) love for nation .... East and west has said a lot about nation building, but what Late Pandit Deendayal, all sources of vedic literature told were unparalleled, when a group of people work with higher aim and look at (piece of) land as mother nation, nation building starts.'
बकौल महामहिम, 'हर राष्ट्र का अपना एक लक्ष्य होता है। अपने इतिहास, भूगोल, भाषा और साहित्य का संवर्धन नितांत आवश्यक है, मगर ये दूसरों के हितों के कीमत पर नही होने चाहिए। विराट-पुरुष(उनके ही शब्द) के लिए स्वहित से ऊपर परहित है। मेरे शोध के मुताबिक राष्ट्रनिर्माण के नीति के तीन साधन हैं: मातृभाव, वृहद लक्ष्य, एक-दूसरे पर विश्वास और उनके हितों का संरक्षण।'
ऋग्वेद के हवाले से उन्होंने समाज को जीवित प्राणी कहा। समाज विराट पुरुष है। उसके अपने बाहु-बुद्धि-शरीर-मन और आत्मा हैं, जो समाज के लोगों के मन-बुद्धि-शरीर से भिन्न उसका अपना है। यहां उन्होंने एकात्म मानवदर्शन के अनुसार एक 'क्यूब' की कल्पना की। व्यक्ति के ही तरह समाज के चार पुरुषार्थों का जिक्र किया, i) शरीर- विराट पुरुष, ii) मन- लोगों से भिन्न, परंपरा, पसन्द-नापसन्द आदि, iii) बुद्धि- संविधान व अन्य कानून, iv) आत्मा- सहअस्तित्व की सतत प्रक्रिया।
उनके अनुसार हर राष्ट्र(समाज) की अपनी आत्मा होती है। भारत के लिए ये आत्मा 'धर्म'(सत्मार्ग) रही है। यही आत्मा राष्ट्र के व्यक्ति(लोगों) में भी होती है। वह इसे अपने भीतर सशक्त करता है और वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। 'आत्मा-परमात्मा-अंतरात्मा' का संदर्भ भी वो बारीकी से ले आए। धर्म मोक्ष का मार्ग है। राष्ट्र के आत्मा के खोज में वो 'Decolonisation' की बात ले आए। उनका प्रश्न था कि क्या भारत इस प्रक्रिया से गुजरा है? बिना इस प्रक्रिया से गुजरे कोई राष्ट्र पूर्ण स्वतंत्र कैसे हो सकता है? उन्होंने बताया कि कैसे बोलिविया और वेनेजुएला के बाद सूरीनाम ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। विश्व जब साम्यवाद और पूंजीवाद के बीच उलझा था, तब नेहरू के भूमिका की भी चर्चा उन्होंने की। नए वर्ल्ड-आर्डर हमेशा बनते रहते हैं, 1650 में अमेरिकी स्पेन को साम्राज्यवादी मानते थे, 2019 में स्पेन के लिए ऐसा कोई सोचता है क्या? आज अमेरिका की छवि कैसी है? नए वैश्विक-परिदृश्य के लिए 'नव-बुद्धि' की आवश्यकता होती है। ये सतत चलता रहता है। यूरोप में ही आज उपनिवेशवाद कितना बचा है? भारत की तरह हमने(सूरीनाम) भी आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दिया।
'मेरा नागरिक-समाज ही इक्कीस वर्षों से मेरे प्रयोगशाला के रूप में रहा है' किसी राष्ट्रप्रमुख(वास्तविक) का ऐसा कहना रोचक और साहसिक था। 'शिक्षा, राजनीति और फिर सात सालों से नीति निर्धारण में मैंने राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में चार(तीन) चीजों को प्रधानता दी, i)लोग(इंटरनेट ने इसको ओपन वर्ल्ड बना दिया); ii)वैदिक साहित्य, वेदांत आदि से आने वाली चुनौतियां और विरोधाभास; iii)एक्शन/इंस्टिट्यूशन: Testing, fact finding and amending policies. इस प्रक्रिया में मैने कभी पश्चिम के सिद्धांतों को नही माना बल्कि वैदिक दर्शन के सहारे ही चला।'
उनके पास उन कानूनों की पूरी सूची थी जो वैदिक दर्शन के आधार पर बने हैं। समाज में लगातार शोध के बाद बने इन कानूनों के मूल में भारतीय ज्ञान ही है। मुख्यतः डच पद्धति के इस देश में राष्ट्र की आत्मा, 'चरित्र-निर्माण के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण' (जब वो ये बात कह रहे थे तब मुझे महामना मालवीय याद आ रहे थे) में बसती है। डच व्यवस्था में सामाजिक मन को सदाचार की सीख दी जाती है। उनका कहना था कि जैसे कानून में एक के ऊपर दूसरे की प्रधानता होती है, जैसे एक कानून, दूसरे के ऊपर लागू होता है, वैसे ही सत्य के ऊपर परोपकार की प्रधानता होती है, 'Like the law of higher order, there is a truth of higher order.' इसके लिए उन्होंने मनु के दस धर्म लक्षणों और 'अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयं, परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम का उद्धरण दिया, कि किसी का उपकार करने के लिए सच बोलने से परहेज कर लेना भी पाप नही है!
1987 में जब सूरीनाम का संविधान आया तब दूसरी नीति जो थी, वो शांतिपूर्ण-सहअस्तित्व की थी, सबके त्योहारों को महत्व दिया गया। भारतीय त्योहारों में होली-फगुआ, दीपावली के साथ ईद और बकरीद की भी छुट्टी होती है। अपने संस्कृति से दूर सब में 'समभाव' की भावना आए, इसलिए ये महत्वपूर्ण था।
कुछ लोगों को बाहर जाता देख माहौल को हल्का करने के लिए अपने शैक्षणिक अनुभवों का जिक्र करते हुए वो मजाकिया लहजे में कहने लगे, 'एक लेक्चरर के रूप में अपने अनुभव से मैं जानता हूँ कि जब छात्र बोर होता है, तब फोन हाथ मे लेकर निकल जाता है!'
उन्होंने कहा, 'सबकी अपनी विश्व-दृष्टि होती है। सही दिशा में आध्यात्मिक मन से सोचकर ही हम इसे बेहतर बना सकते हैं। इसके चार आयाम है: मन को आध्यात्मिक बनाने के लिए शोध। अपने निकृष्ट व स्वार्थी प्रवृत्तियों को दूर करना, आज के मानव में सद्भाव, करुणा, दया आदि की कमी है, वह स्वयं में व्यस्त रहता है। जिससे वो दूसरे के मन और हृदय को नही समझ पाता। आहार .. निंद्रा .. भय .. पशु .. धर्मेणहीणा पशु समाना.(ये श्लोक मुझे नही पता इसलिए पूरा नही लिख सका, पता चले तो सुधार दूंगा!) 'Vivekananda's philosophy of renunciation and manifestation of larger self, for service(सेवार्थ), Spiritual world view, frame of excellence'
आदि शंकर के दर्शन को याद करते हुए उन्होंने आंतरिक और बाह्य धर्म की चर्चा की। 'धर्म प्रजा को धारण करने वाला होना चाहिए। 'यतो अभुदयः, निष्त्रेय सिद्धि:' धर्म के दो आयाम चेतना को सिद्धि की ओर ले जाते हैं। धर्म की अवधारणा राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण है और राष्ट्र को राज्य के साथ नही मिलाया जाना चाहिए। राष्ट्र-राज्य का सिद्धांत गलत है। दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांत में राष्ट्र जीवित प्राणी है, लोक संग्रह है, स्वहित से ऊपर जाकर है। ये राष्ट्रहित के लिए होना चाहिए, राजनैतिक साधन के रूप में नही।'
आखिर में उन्होंने कहा भारत माँ के संतानों को संबोधित करना उनका सौभाग्य है। विवेकानन्द के 'उत्तिष्ठत, जाग्रत...' के साथ उन्होंने अपने संदेश को पूरा किया।
भारत के भारतीय दर्शन के और राजनीतिक विज्ञान के उनके समझ से मैं मुग्ध था, और इतना प्रभावित था जैसे मैं इंडोलॉजी के किसी विशेषज्ञ को सुन रहा होऊँ! अपने संस्कृति से दूर होकर भी उनकी समझ अद्भुत थी। उसके कई आयामों को मैं अब भी समझने की कोशिश कर रहा हूँ। इस लेख में वो अस्पष्टता दिख भी रही होगी। उनसे एक चीज सीखने वाली थी कि अपने संस्कृति को सहेजना हमारी जिम्मेवारी है, और षड्यंत्रों के बीच इसे बचा लेना ही हमारी असली प्रतिभा। जिसके लिए उसका समझ होना सबसे आवश्यक है। हमें जो मिला होता है उसका महत्व हम नही समझ पाते, ऐसे मव कई बार ये 'संवाद' आईने का काम कर जाते हैं!
इसीलिए उनके व्याख्यान के बाद मौका मिलते ही मैंने अपने सवाल के साथ उनका धन्यवाद भी कह दिया। लगा कि वापस अपने बीएचयू पहुंच गया हूँ मैं। एक मलाल भी रह गया, जाने कैसे हमेशा साथ रहने वाले डायरी को पिछले एक साल में मैंने खुद से दूर कर दिया। एक वक्त था जब मेरी एक शिक्षिका ने उसके कंटेंट को देखकर कहा था कि उनका मन उसे चुरा लेने को करता है। बहरहाल मुझे आज नोट्स लेने के लिए पन्ने उधार लेने पड़े। एक आदर्श छात्र की तरह मगर मैने सबकुछ नोट किया। जब सब कैमरे चमका रहे थे तब उन्हीं पन्नों में एक छोटे से कोने पर उपराष्ट्रपति महोदय का हस्ताक्षर मैंने ले लिया। उसी बहाने से हमारी थोड़ी हल्की-फुल्की बातें भी हो गईं। हम जैसों का हासिल तो वही होता है, तस्वीरें कौन देखता है!
(एक शानदार कार्यक्रम के लिए लॉ सेन्टर-II, फैकल्टी ऑफ लॉ को बधाई। ये लेख काफी हद तक रिपोर्ट के फॉर्मेट में है इसलिए मैंने भाषाई अशुद्धियों को छोड़ दिया है और जहाँ आवश्यक लगा वहाँ हिन्दी अनुवाद के बजाय मूल अंग्रेजी ही प्रयोग किया है।)

Comments
Post a Comment