अक्टूबर: प्रेम पलायन का गीत नही, जीवन-संगीत है।

कला को सौंदर्य के समानार्थी समझने की प्रवृत्ति आजकल बेतहाशा बढ़ गई है। लोग सौंदर्य मात्र को कला समझते हैं, या यूं कहें कि कला को इसमें समेट सा दिया गया है। जबकि रस और आनन्द इसके कहीं अधिक महत्वपूर्ण आयाम हैं। बाह्य सुख से कहीं अधिक आंतरिक आनन्द कला का उद्देश्य है। यूँ ही नही इसे अमूर्त भावों के मूर्त होने, और फिर उसे मूर्त से मन में अमूर्त आनन्द होना मानते हैं। प्रेम शायद इसीलिए कला है।

प्रेम जीवन के लिए ऐसा 'स्टिमुली' है जो बाहर होता हुआ प्रतीत होकर आपके भीतर चलता है। ये 'पॉजिटिव-कैटेलिस्ट है, पॉजिटिव क्योंकि हमेशा ये आपके जीवन को सही दिशा ही प्रदान करता है। प्रेम मगर, कला की ही तरह आजकल बेहद संकुचित अर्थों में लिया जाता है। हमने मिलकर प्रेम के दायरे और पैमानों को इतना सीमित कर दिया है कि अक्सर इन बातों पर बात करने से भी बचते नज़र आते हैं। स्वार्थोन्मुख होने के कारण प्रेम करने वाले भी इसे 'कैलक्यूलेट कर' करते हैं। अक्सर प्रेम सुनकर हमारे ध्यान में स्वाभाविक तौर पर दो लोग आते हैं, यही वो क्षेत्र है जहां हम बात करते हुए हम हिचकिचाते हैं, वर्ना दूसरे अन्य रिश्तों के प्रेम के लिए न जाने कैसे-कैसे मिसाल देते हैं।

जब दो लोग प्रेम में होते हैं तब वो महज खुद भर नही होते हैं, बल्कि वो खुद के साथ पूरे इंसानियत के एम्बेसडर होते हैं। इंसानियत से हमारा मतलब इंसानों के अलावा सम्पूर्ण प्रकृति एवं अन्य जीवों से भी है। राह चलते हुए जब आप मुस्कुराने लगते हैं, किसी अनजान द्वारा देखे जाने के भाव भर से जब आप ऊर्जा से भर जाते हैं तब आप प्रेम में होते हैं।

ऐसा नही है कि जब आप किसी से प्रेम में हों तो उसी के होकर रह जाते हैं। बल्कि इसके बाद आप अन्य रिश्तों में भी निखरकर सामने आते हैं। आप समूची दुनिया को उसी नजरिये से देखते हैं और आपका अमूर्त रूप जब उसमें डूबता है तो इस मूर्त संसार को कहीं बेहतर बनाता हैं।

हाँ, अगर आप इसे हर दूसरे दिन शुरू होने वाले और दो-चार महीनों में खत्म हो जाने वाले रिश्तों में ढूंढ रहे हैं तो शायद आपको निराशा हो! मैं मानता हूँ प्रेम शास्वत है जो इंसान के बाद भी जीवित रहता है और जो आप उसे समझ रहे हैं वो इस परिभाषा से पूर्णतः अलग है। प्रेम में स्वार्थ का कोई स्थान नही है।

शुजीत सरकार ने इसे अपने फ़िल्म 'अक्टूबर' में बखूबी दर्शाया है। प्रेम चांस देखकर नही होता। डैन और शिवली की कहानी प्रभावित करती है। डैन, जिसका शिवली के जीवन में शायद ही कोई स्थान था, न केवल उसके कोमा में जाने के बाद उसके दर्द को महसूस कर उसके साथ मजबूती से खड़ा होता है बल्कि अपना सबकुछ खोकर भी कुछ पाने की इच्छा किए बगैर वहाँ डटा रहता है। प्रेम सचमुच अक्टूबर के हरसिंगार की तरह खुद गिरकर औरों के जीवन को सुगंधित कर जाना है। ये सचमुच मोमबत्ती की तरह अपना स्वरूप और अस्तित्व खोने की चिंता किए बिना जमाने को रोशन कर जाने जैसा है!

फिर वास्तविक जीवन में हमेशा आप फिल्मों के हीरो की तरह सबके चहेते नही हो जाते। लेकिन गर आप चन्द लोगों को भी खुशी दे खुद में संतुष्टि का भाव ला पाते हैं तो सच मानिए हीरो हैं आप! यूँ ही खुशियाँ बिखेरते चलिए... आपके छोटे प्रयासों से ही ये संसार बेहतर होगा!

ऐसे दौर में जब बुरे वक्त में भी हमारे अपने भी हमारा साथ नही दे पाते, फ़िल्म का डैन हमें सिखाता है कि हर किसी के जीवन मे ऐसे लोग होने चाहिए। ऐसी फिल्में बनती रहनी चाहिए। यही कल का समाज गढ़ेंगे। आपको ये फ़िल्म देखनी चाहिए। हाँ जीवन से भागकर फ़िल्म देखते हैं, उन दो घण्टों में जीवन से कट जाना चाहते हैं तो आपके लिए 'बागी' जैसे विकल्प ही ठीक हैं, क्योंकि ऐसी फिल्में आपको कई रातों तक सोने नही देंगी!

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